तृणमूल में बड़ी फूट: 58 विधायकों की बगावत, ऋतब्रत बनर्जी बने नए गुट के नेता प्रतिपक्ष
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के ठीक एक महीने बाद तृणमूल कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान बुधवार को खुलकर सामने आ गई, जब पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने बगावत कर एक नया गुट खड़ा कर लिया। निष्कासित विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा के नेतृत्व में पेश इस प्रस्ताव में खुद को ‘असली तृणमूल’ बताते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) नामित किया गया है, हालाँकि ममता बनर्जी को पार्टी की ‘सुप्रीमो’ के रूप में बरकरार रखा गया है।
मुख्य घटनाक्रम
बुधवार सुबह से ही बागी विधायक एक-एक कर विधानसभा परिसर पहुँचने लगे। एक आपात बैठक के बाद विपक्ष के लिए आरक्षित पाँच पदों पर नामों का अनुमोदन हुआ और 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव स्पीकर के कक्ष में सौंपा गया, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
प्रस्ताव में हावड़ा ज़िले की उलुबेरिया (पूर्व) सीट से विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष, उत्तरी कोलकाता की एंटाली सीट से संदीपान साहा, पश्चिम मेदिनीपुर के केशपुर से शिउली साहा और दक्षिण 24 परगना के कस्बा से जावेद अहमद खान को विपक्ष का उप नेता बनाया गया है। रघुनाथगंज से वरिष्ठ विधायक अखरुज़्ज़मान को मुख्य सचेतक की ज़िम्मेदारी दी गई है।
विवाद की जड़: दो प्रस्ताव, हस्ताक्षरों पर सवाल
पिछले महीने तृणमूल महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर कार्यालय को पत्र भेजकर शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, नैना बंदोपाध्याय व असीमा पात्रा को उप नेता और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक नामित किया था। स्पीकर ने ज़ोर देकर कहा था कि विधायकों के हस्ताक्षर वाला कोई भी प्रस्ताव अभिषेक बनर्जी के पत्र के साथ ही जमा किया जाए।
स्थिति ने तब नाटकीय मोड़ लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने पार्टी के कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित गड़बड़ी की ओर इशारा किया। इन दोनों को इसी हफ्ते की शुरुआत में पार्टी से निष्कासित किया गया था। इसके तुरंत बाद विधानसभा सचिवालय ने मामला CID को सौंप दिया, जिसने अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए दो बार तलब किया।
ममता को ‘सुप्रीमो’, पर सत्ता का संतुलन डगमगाया
दिलचस्प यह है कि बागी गुट ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुनौती नहीं दी है; प्रस्ताव में उन्हें ‘सुप्रीमो’ ही दर्शाया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह रणनीतिक कदम ममता के जनाधार को छेड़े बिना अभिषेक बनर्जी की संगठनात्मक पकड़ को सीधी चुनौती है — यानी विद्रोह व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि उत्तराधिकार-रेखा के विरुद्ध है।
आगे क्या
रिपोर्ट दाख़िल होने तक ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी या तृणमूल के किसी अन्य नेता की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। CID जाँच का अगला चरण, हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक पुष्टि और स्पीकर की अंतिम मान्यता — ये तीन कारक तय करेंगे कि बंगाल विधानसभा में ‘असली तृणमूल’ कौन कहलाएगा। आने वाले दिनों में संभावित अदालती लड़ाई और दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या भी निर्णायक साबित हो सकती है।