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ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मानने का विवाद: सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती

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ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मानने का विवाद: सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती

सारांश

पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर का विभाजन अब अदालत तक पहुँच गया है। ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मानने के सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती दी गई है, जबकि 60 बागी विधायकों के मुकाबले ममता खेमे के पास सिर्फ 20 विधायक बचे हैं और सीआईडी हस्ताक्षर विवाद की जांच कर रही है।

मुख्य बातें

सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने 19 जून 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती दी।
सिंगल बेंच ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसमें ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष माना गया था।
TMC के 80 में से 60 विधायक विद्रोही गुट के साथ; ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि उनके पास 64 विधायकों का समर्थन है।
ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार मूल TMC गुट के पास केवल 20 विधायक बताए जा रहे हैं।
विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए प्रस्ताव पर हस्ताक्षरों में कथित गड़बड़ी की जांच सीआईडी कर रही है।
अगली सुनवाई 28 जुलाई को सिंगल बेंच में निर्धारित थी, लेकिन उससे पहले ही डिवीजन बेंच में अपील दायर हो गई।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) के पद को लेकर छिड़ा सियासी और कानूनी संग्राम 19 जून 2026 को और गहरा गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने सिंगल बेंच के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के उस फैसले को बरकरार रखा गया था, जिसमें निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को सदन में बहुमत गुट का नेता और आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी।

मुख्य घटनाक्रम

इससे एक दिन पहले, गुरुवार को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने इस मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। एकल पीठ ने दोनों पक्षों को 28 जुलाई तक अपने-अपने हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया था और अगली सुनवाई की तारीख भी उसी दिन तय की थी। परंतु अगली सुनवाई का इंतजार किए बिना ही सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने डिवीजन बेंच में अपील दायर कर दी।

विधानसभा में संख्या-बल का समीकरण

294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायक हैं। इनमें से 60 विधायक विद्रोही बहुमत गुट के साथ बताए जा रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने इस सप्ताह दावा किया कि उनके समर्थन में 64 विधायक हैं। वहीं, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार मूल TMC गुट के साथ फिलहाल केवल 20 विधायक बचे बताए जा रहे हैं। यह संख्या-बल का असंतुलन दर्शाता है कि पार्टी के भीतर विभाजन कितना गहरा हो चुका है।

हस्ताक्षर विवाद और सीआईडी जांच

इस पूरे मामले की जड़ में वह प्रस्ताव है, जो विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा गया था और जिसमें सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा और नैना बंद्योपाध्याय को उपनेता प्रतिपक्ष, तथा फिरहाद हकीम को तृणमूल विधायक दल का मुख्य सचेतक नामित किया गया था। उस प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित गड़बड़ी की जांच सीआईडी कर रही है।

ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा द्वारा हस्ताक्षरों में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाने के बाद सीआईडी ने जांच शुरू की। इसके तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को निलंबित कर दिया। निलंबन के जवाब में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने बगावत करते हुए खुद को बहुमत वाला गुट बताते हुए नया प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। विधानसभा अध्यक्ष ने इस नए प्रस्ताव को स्वीकार कर ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।

कानूनी लड़ाई का क्रम

विधानसभा अध्यक्ष के इसी फैसले को पहले सिंगल बेंच में चुनौती दी गई थी, जहाँ अंतरिम राहत नहीं मिली। अब सिंगल बेंच के आदेश के विरुद्ध डिवीजन बेंच में अपील दायर होने से यह विवाद एक नए कानूनी पड़ाव पर पहुँच गया है। गौरतलब है कि यह मामला न केवल एक पद की वैधानिकता का प्रश्न है, बल्कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल के भीतर उभरे गहरे अंतर्विरोध का भी प्रतिबिंब है।

आगे क्या होगा

अब सभी की निगाहें डिवीजन बेंच पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि सिंगल बेंच का आदेश कायम रहेगा या नहीं। सीआईडी की जांच और अदालती सुनवाई एक साथ चलने से यह विवाद आने वाले हफ्तों में और उलझ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो लंबे समय से एकजुट दिखता आया था। 80 में से 60 विधायकों का बागी होना दर्शाता है कि नेतृत्व की पकड़ कितनी कमजोर हो चुकी है। सीआईडी जांच और समानांतर अदालती लड़ाई मिलकर एक ऐसी स्थिति बना रहे हैं जहाँ संस्थागत तंत्र स्वयं दलीय राजनीति का अखाड़ा बन गया है। असली सवाल यह है कि क्या डिवीजन बेंच का फैसला इस विवाद को सुलझाएगा, या पार्टी के भीतर का यह टकराव अगले चुनाव तक और लंबा खिंचेगा।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष क्यों माना गया?
विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों द्वारा सौंपे गए नए प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए उन्हें आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी, क्योंकि यह गुट TMC के 80 विधायकों में बहुमत का प्रतिनिधित्व करता था।
कलकत्ता हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने क्या फैसला दिया था?
न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को बरकरार रखा। अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित की गई थी और दोनों पक्षों को हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया गया था।
TMC में विभाजन का कारण क्या है?
विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षरों में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाने के बाद TMC ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निलंबित कर दिया। इसके जवाब में 60 विधायकों ने बगावत कर नया प्रस्ताव सौंपा, जिससे पार्टी दो धड़ों में बंट गई।
सीआईडी इस मामले में क्या जांच कर रही है?
सीआईडी उस प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित विसंगतियों की जांच कर रही है, जो विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा गया था और जिसमें सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष तथा अन्य नेताओं को पदनामित किया गया था।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
डिवीजन बेंच यह तय करेगी कि सिंगल बेंच का आदेश कायम रहेगा या नहीं। सीआईडी की जांच भी समानांतर जारी है। सिंगल बेंच में 28 जुलाई को अगली सुनवाई पहले से निर्धारित है, लेकिन डिवीजन बेंच की सुनवाई का क्रम अब इस विवाद की दिशा तय करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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