ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मानने का विवाद: सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) के पद को लेकर छिड़ा सियासी और कानूनी संग्राम 19 जून 2026 को और गहरा गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने सिंगल बेंच के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के उस फैसले को बरकरार रखा गया था, जिसमें निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को सदन में बहुमत गुट का नेता और आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी।
मुख्य घटनाक्रम
इससे एक दिन पहले, गुरुवार को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने इस मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। एकल पीठ ने दोनों पक्षों को 28 जुलाई तक अपने-अपने हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया था और अगली सुनवाई की तारीख भी उसी दिन तय की थी। परंतु अगली सुनवाई का इंतजार किए बिना ही सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने डिवीजन बेंच में अपील दायर कर दी।
विधानसभा में संख्या-बल का समीकरण
294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायक हैं। इनमें से 60 विधायक विद्रोही बहुमत गुट के साथ बताए जा रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने इस सप्ताह दावा किया कि उनके समर्थन में 64 विधायक हैं। वहीं, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार मूल TMC गुट के साथ फिलहाल केवल 20 विधायक बचे बताए जा रहे हैं। यह संख्या-बल का असंतुलन दर्शाता है कि पार्टी के भीतर विभाजन कितना गहरा हो चुका है।
हस्ताक्षर विवाद और सीआईडी जांच
इस पूरे मामले की जड़ में वह प्रस्ताव है, जो विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा गया था और जिसमें सोवंदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा और नैना बंद्योपाध्याय को उपनेता प्रतिपक्ष, तथा फिरहाद हकीम को तृणमूल विधायक दल का मुख्य सचेतक नामित किया गया था। उस प्रस्ताव पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित गड़बड़ी की जांच सीआईडी कर रही है।
ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा द्वारा हस्ताक्षरों में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाने के बाद सीआईडी ने जांच शुरू की। इसके तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को निलंबित कर दिया। निलंबन के जवाब में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने बगावत करते हुए खुद को बहुमत वाला गुट बताते हुए नया प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। विधानसभा अध्यक्ष ने इस नए प्रस्ताव को स्वीकार कर ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।
कानूनी लड़ाई का क्रम
विधानसभा अध्यक्ष के इसी फैसले को पहले सिंगल बेंच में चुनौती दी गई थी, जहाँ अंतरिम राहत नहीं मिली। अब सिंगल बेंच के आदेश के विरुद्ध डिवीजन बेंच में अपील दायर होने से यह विवाद एक नए कानूनी पड़ाव पर पहुँच गया है। गौरतलब है कि यह मामला न केवल एक पद की वैधानिकता का प्रश्न है, बल्कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल के भीतर उभरे गहरे अंतर्विरोध का भी प्रतिबिंब है।
आगे क्या होगा
अब सभी की निगाहें डिवीजन बेंच पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि सिंगल बेंच का आदेश कायम रहेगा या नहीं। सीआईडी की जांच और अदालती सुनवाई एक साथ चलने से यह विवाद आने वाले हफ्तों में और उलझ सकता है।