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सावन के अंतिम सोमवार पर वसई-विरार के तुंगारेश्वर व काशीविश्वेश्वर मंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब

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सावन के अंतिम सोमवार पर वसई-विरार के तुंगारेश्वर व काशीविश्वेश्वर मंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब

सारांश

सावन का अंतिम सोमवार वसई-विरार में आस्था के महापर्व में बदल गया — तुंगारेश्वर से काशीविश्वेश्वर तक हज़ारों शिवभक्तों ने रात से ही डेरा डाल दिया। ५०० वर्ष पुराने शिवलिंग का पंचामृत अभिषेक, शिव मुकुट श्रृंगार और 'हर-हर महादेव' के जयकारों ने पूरे शहर को भक्तिमय बना दिया।

मुख्य बातें

24 अगस्त 2025 को सावन के अंतिम सोमवार पर वसई-विरार के शिव मंदिरों में हज़ारों श्रद्धालु उमड़े।
श्री तुंगारेश्वर महादेव मंदिर और श्री काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर में रात से ही भक्तों का आगमन शुरू हो गया था।
काशीविश्वेश्वर मंदिर का शिवलिंग करीब 500 वर्ष पुराना माना जाता है; मंदिर सुबह 4 बजे खुलता है और 5 बजे रुद्राभिषेक होता है।
बोरीवली , अंधेरी और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।
भारी भीड़ को देखते हुए तुंगारेश्वर गेट से मंदिर परिसर तक पुलिस प्रशासन ने कड़ा सुरक्षा बंदोबस्त किया।
पुजारी सचिन गुरव ने बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से लिंगायत परंपरा में भगवान शिव की सेवा करता आ रहा है।

वसई-विरार में 24 अगस्त 2025 को सावन के अंतिम सोमवार पर हज़ारों शिवभक्तों ने श्री तुंगारेश्वर महादेव मंदिर और श्री काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर में उमड़कर भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक किए। 'हर-हर महादेव' और 'बम-बम भोले' के जयकारों से मंदिर परिसर गूंजता रहा, और लंबी कतारों में खड़े श्रद्धालुओं की भक्ति ने पूरे शहर का वातावरण भक्तिमय बना दिया।

रात से ही शुरू हुआ श्रद्धालुओं का आगमन

सावन के अंतिम सोमवार की विशेष महत्ता को देखते हुए रात से ही बड़ी संख्या में शिवभक्त तुंगारेश्वर और काशीविश्वेश्वर मंदिरों की ओर रवाना हो गए थे। वसई-विरार के स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ बोरीवली, अंधेरी और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी भक्त दर्शन के लिए पहुंचे। सुबह से ही विभिन्न मंदिरों में मंत्रोच्चार, अभिषेक, आरती, भजन और कीर्तन का दौर अनवरत चलता रहा। महिलाएं, पुरुष, युवा और बुजुर्ग — सभी वर्गों के भक्त बड़ी तादाद में उपस्थित रहे।

पुलिस प्रशासन का कड़ा बंदोबस्त

श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ को देखते हुए तुंगारेश्वर गेट के प्रवेश मार्ग से लेकर मंदिर परिसर तक पुलिस प्रशासन ने कड़ा सुरक्षा प्रबंध किया। पुलिसकर्मी भीड़ नियंत्रण, प्रवेश-निकासी व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में तैनात रहे। महत्वपूर्ण स्थानों पर निगरानी रखी गई ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।

काशीविश्वेश्वर मंदिर: ५०० वर्ष पुरानी परंपरा

वसई पूर्व के गोखिवारे स्थित प्राचीन श्री काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर में सावन के अंतिम सोमवार पर विशेष धार्मिक आयोजन हुए। मंदिर के देवस्थान पुजारी सचिन गुरव ने बताया कि मंदिर की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है और सावन माह में यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है।

पुजारी सचिन गुरव के अनुसार मंदिर सुबह 4 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। सुबह 5 बजे भगवान महादेव का अभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है, जिसके बाद सुबह 6 बजे आरती होती है। उन्होंने बताया कि मंदिर में विराजमान प्राचीन शिवलिंग करीब 500 वर्ष पुराना माना जाता है। शिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक के साथ लिंगाष्टक और बिल्वाष्टक पूजा की जाती है, इसके बाद भगवान शिव का विशेष श्रृंगार कर दर्शन की व्यवस्था की जाती है।

गुरव ने यह भी बताया कि मंदिर परिसर में भगवान गणेश, दत्त मंदिर, हनुमान मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिर भी स्थित हैं, जहाँ सुबह-शाम संध्या पाठ, भजन और कीर्तन का आयोजन होता है। सावन के अंतिम सोमवार को दोपहर बाद विशेष शिव आरती और शाम को भगवान शिव को शिव मुकुट धारण कराया गया तथा श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।

पीढ़ियों से जुड़ी सेवा परंपरा

पुजारी सचिन गुरव ने बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से भगवान शिव की सेवा से जुड़ा है और वे बचपन से ही इसी मंदिर में पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। उन्होंने स्वयं को लिंगायत परंपरा का पुजारी बताया। उनके अनुसार वसई क्षेत्र में पापड़ी और तुंगारेश्वर मंदिर की ओर सावन के दौरान बड़ी संख्या में कांवड़ यात्राएं भी आती हैं।

भक्तों की आस्था और आगे का उत्साह

सावन के अंतिम सोमवार पर श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की। बड़ी संख्या में भक्त व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करते भी नज़र आए। श्रद्धालुओं ने मंदिर की सेवा और साफ-सफाई में भी सहयोग किया। वसई-विरार की इस धार्मिक आस्था की झलक ने स्पष्ट किया कि सावन महोत्सव की परंपरा यहाँ वर्ष-दर-वर्ष और अधिक जीवंत होती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि संगठित हुई है। ५०० वर्ष पुराने शिवलिंग वाले काशीविश्वेश्वर जैसे मंदिर केवल पूजास्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के केंद्र बन चुके हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि बोरीवली और अंधेरी जैसे दूरस्थ इलाकों से श्रद्धालुओं का आना दर्शाता है कि इन स्थानीय मंदिरों की पहुँच अब क्षेत्रीय सीमाएं लाँघ रही है। प्रशासन का सक्रिय सुरक्षा प्रबंध इस आयोजन की बढ़ती भीड़ और उसके प्रबंधन की चुनौती दोनों को रेखांकित करता है।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सावन के अंतिम सोमवार पर वसई-विरार के किन मंदिरों में सबसे अधिक भीड़ उमड़ी?
सावन के अंतिम सोमवार पर वसई-विरार में श्री तुंगारेश्वर महादेव मंदिर और श्री काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर में सबसे अधिक भीड़ देखी गई। इन दोनों मंदिरों में रात से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया था।
काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास क्या है?
वसई पूर्व के गोखिवारे स्थित श्री काशीविश्वेश्वर महादेव मंदिर में विराजमान शिवलिंग करीब 500 वर्ष पुराना माना जाता है। मंदिर की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है और पुजारी सचिन गुरव का परिवार पीढ़ियों से यहाँ लिंगायत परंपरा में पूजा-अर्चना करता आ रहा है।
काशीविश्वेश्वर मंदिर में पूजा का समय क्या है?
मंदिर सुबह 4 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। सुबह 5 बजे रुद्राभिषेक और पंचामृत अभिषेक होता है, जिसके बाद सुबह 6 बजे आरती और दर्शन की व्यवस्था होती है।
तुंगारेश्वर मंदिर में भीड़ प्रबंधन कैसे किया गया?
तुंगारेश्वर गेट के प्रवेश मार्ग से लेकर मंदिर परिसर तक पुलिस प्रशासन ने कड़ा बंदोबस्त किया। पुलिसकर्मी भीड़ नियंत्रण, प्रवेश-निकासी व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में तैनात रहे।
सावन में वसई-विरार के मंदिरों में कहाँ-कहाँ से श्रद्धालु आते हैं?
वसई-विरार के स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा बोरीवली , अंधेरी और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सावन के दौरान पापड़ी और तुंगारेश्वर मंदिर की ओर कांवड़ यात्राएं भी आती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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