यूपीआई पर एमडीआर से बड़े शुल्क की आशंका नहीं: विश्व बैंक के नीलकंठ मिश्रा का आकलन
सारांश
मुख्य बातें
विश्व बैंक समूह के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने 3 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित पाँचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान स्पष्ट किया कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की अनुमति देना एक अधिकार प्रदान करने वाला नियामकीय कदम होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भुगतान क्षेत्र में मौजूद कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते इससे शुल्क में बड़े पैमाने पर वृद्धि होने की संभावना काफी कम है।
एमडीआर और प्रतिस्पर्धी बाज़ार
मिश्रा ने कहा कि एमडीआर लागू होने से व्यापक स्तर पर शुल्क बढ़ने की आशंकाएँ एक मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाज़ार में अतिरंजित हो सकती हैं। उनके अनुसार, 'यह एक मुक्त बाज़ार है। जब तक किसी को यह आशंका नहीं है कि वित्तीय कंपनियाँ, बैंक या पेमेंट एग्रीगेटर आपस में मिलीभगत करके एक ही समय पर शुल्क बढ़ाना शुरू कर देंगे, तब तक इससे निपटने के अलग-अलग तरीके मौजूद हैं।'
उन्होंने आगे जोड़ा, 'मुझे नहीं लगता कि इससे बड़े पैमाने पर शुल्क में बढ़ोतरी होगी, क्योंकि यह एक मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाज़ार है।' मिश्रा ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसी कंपनियाँ भी बाज़ार में बनी रहीं जो एमडीआर शुल्क नहीं ले पाने के बावजूद अपना कारोबार चलाने में सफल रहीं।
वैश्विक बाज़ारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम
वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिदृश्य पर बात करते हुए नीलकंठ मिश्रा ने तेज़ी से बढ़ती ब्याज दरों को वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के सामने मौजूद सबसे बड़ा जोखिम बताया। उन्होंने कहा, 'वैश्विक बाज़ारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम तेज़ी से बढ़ती ब्याज दरें हैं, क्योंकि वित्तीय बाज़ारों का पूरा आधार पूँजी की लागत पर टिका होता है।'
मिश्रा के अनुसार, जोखिम-मुक्त ब्याज दरों में बढ़ोतरी से परिसंपत्तियों के मूल्य में गिरावट आ सकती है। इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक कर्ज लेकर किए गए निवेश और संपत्तियाँ गिरवी रखकर दिए गए ऋणों से जुड़ी कमज़ोरियाँ भी उजागर हो सकती हैं।
बॉन्ड यील्ड और परिसंपत्ति मूल्य पर असर
मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'अगर बॉन्ड यील्ड यानी जोखिम-मुक्त ब्याज दर बढ़ती है, तो परिसंपत्तियों का मूल्य नीचे आएगा। इसका मतलब है कि गिरवी रखी गई संपत्तियों के आधार पर दिए गए कई तरह के ऋण और उस समय लिए गए कई प्रकार के लीवरेज अव्यावहारिक हो जाएँगे या उन्हें समाप्त करना पड़ेगा।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक दशकों में सबसे तेज़ दर-वृद्धि चक्र से गुज़र रहे हैं।
भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर
तेल की ऊँची कीमतों, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक दबाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता पर मिश्रा ने माना कि जोखिम महत्त्वपूर्ण हैं। हालाँकि, उन्होंने कहा कि भारत की स्थिति भारी कर्ज से जूझ रही कई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर है।
उन्होंने कहा, 'ऐसे देश भी हैं जिनका कर्ज-जीडीपी अनुपात बहुत अधिक है और जो संभवतः भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा संवेदनशील हैं।' मिश्रा के अनुसार, स्थिति में स्थिरता तभी आ सकती है जब बॉन्ड यील्ड में गिरावट आए या आर्थिक विकास के मोर्चे पर कुछ ऐसे जोखिम सामने आएँ जिनके कारण बाज़ार को अपने आकलन पर दोबारा विचार करना पड़े। उन्होंने अंत में कहा, 'इसलिए हमें बाहरी झटकों के प्रति सतर्क रहना होगा।'
गौरतलब है कि UPI पर MDR को लेकर बहस भारत में लंबे समय से जारी है, जहाँ एक ओर पेमेंट कंपनियाँ राजस्व की माँग कर रही हैं और दूसरी ओर सरकार डिजिटल भुगतान को व्यापक रूप से प्रोत्साहित करने के लिए शुल्क-मुक्त ढाँचे को बनाए रखना चाहती है।