यूपीआई एमडीआर बदलाव: सुरक्षा और पूंजीगत खर्च में संतुलन ज़रूरी — सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि यूपीआई (UPI) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जुड़े हालिया बदलावों में सुरक्षित डिजिटल भुगतान व्यवस्था बनाए रखने और इस प्रणाली को संचालित रखने के लिए आवश्यक बढ़े हुए पूंजीगत खर्च के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। मुकुंदन ने स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे डिजिटल भुगतान का इकोसिस्टम विस्तार पा रहा है, लेनदेन की सुरक्षा से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता।
एमडीआर पर मुकुंदन का रुख
मुकुंदन ने कहा कि वह एमडीआर के तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वित्त विशेषज्ञ आगे का उचित रास्ता तय करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि एक सार्थक और व्यावहारिक समाधान ज़रूर सामने आएगा। उनके अनुसार, मुख्य चुनौती यही है कि लेनदेन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए अतिरिक्त पूंजीगत खर्च की माँग को भी पूरा किया जाए।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर नज़रिया
मुकुंदन ने ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बारे में कहा कि इस बैठक ने सदस्य देशों को एकजुट किया और चर्चाओं में अधिक गर्मजोशी एवं बेहतर तालमेल का माहौल तैयार हुआ। उन्होंने रेखांकित किया कि ब्रिक्स अब अपने मूल सदस्य देशों से काफी आगे विस्तार कर चुका है और ब्रिक्स बिजनेस फोरम में कृषि से लेकर उच्च तकनीक तक चार प्रमुख क्षेत्रों में सकारात्मक भागीदारी देखने को मिली।
व्यापार-निवेश में 'इरादे से नतीजों की ओर'
मुकुंदन के अनुसार, ब्रिक्स बिजनेस फोरम से निकलने वाला केंद्रीय संदेश 'इरादे से नतीजों की ओर बढ़ने' की आवश्यकता थी — विशेष रूप से व्यापार और निवेश के क्षेत्र में। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स देश वैश्विक जीडीपी में करीब 40 प्रतिशत का योगदान देते हैं, लेकिन वैश्विक व्यापार में उनकी हिस्सेदारी अभी केवल लगभग 26 प्रतिशत है। यह अंतर ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़ाने की व्यापक संभावनाओं को रेखांकित करता है।
गैर-टैरिफ बाधाएँ और खनिज संसाधन
सीआईआई अध्यक्ष ने ज़ोर दिया कि गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना, गुणवत्ता मानकों में तालमेल बनाना, मंजूरी प्रक्रियाओं को मानकीकृत करना और सीमाओं के पार वस्तुओं की आवाजाही को सुगम बनाना ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार को नई ऊँचाई देने के लिए अनिवार्य है। उन्होंने भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती माँग और लैटिन अमेरिकी ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं में उपलब्ध खनिज संसाधनों के बीच प्राकृतिक पूरकता का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमा पार निवेश की इस दिशा में अपार संभावनाएँ हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी हरित ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित करने में जुटा है।
आगे की राह
मुकुंदन के बयान से स्पष्ट है कि उद्योग जगत यूपीआई-एमडीआर बहस में किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय एक संतुलित नीतिगत समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है। ब्रिक्स व्यापार के मोर्चे पर, विशेषज्ञों का मानना है कि जीडीपी और व्यापार हिस्सेदारी के बीच की यह खाई अगले कुछ वर्षों में नीतिगत सुधारों की दिशा तय कर सकती है।