यूपीआई पर एमडीआर से सिस्टम होगा सस्टेनेबल, 1 अरब यूज़र्स तक पहुँचाने का लक्ष्य: फिनटेक लीडर्स
सारांश
मुख्य बातें
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) पर लागू करने से यह इकोसिस्टम आर्थिक रूप से टिकाऊ बनेगा और अगले एक दशक में इसे 1 अरब उपयोगकर्ताओं तक विस्तारित करने में मदद मिलेगी। बुधवार, 16 सितंबर 2026 को प्रमुख फिनटेक नेताओं ने यह बात कही। उनका कहना है कि मौजूदा ढाँचे में यूपीआई से आय शून्य है, जिससे इसे चलाने वाले बैंकों और वित्तीय कंपनियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
यूपीआई की मौजूदा स्थिति
मोबिक्विक की सह-संस्थापक, कार्यकारी निदेशक और सीएफओ उपासना टाकू ने कहा कि यूपीआई को भारत में एक दशक से अधिक समय हो चुका है और इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को बुनियादी रूप से बदल दिया है। उन्होंने बताया कि इस प्लेटफॉर्म के ज़रिये वित्तीय उत्पादों को आम लोगों तक पहुँचाना संभव हुआ, परंतु इसका दूसरा पहलू यह है कि इसे चलाने का सारा आर्थिक बोझ बैंकों और वित्तीय कंपनियों को उठाना पड़ रहा है।
टाकू के अनुसार, फिलहाल देश में करीब 50-60 करोड़ लोग यूपीआई का उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इसे अगले एक दशक में 1 अरब उपयोगकर्ताओं तक ले जाना है, तो इससे कुछ स्थिर आय का होना अनिवार्य है।
प्रति लेनदेन की लागत और सब्सिडी का अंतर
उपासना टाकू ने आगे बताया कि एक यूपीआई लेनदेन की सर्वर लागत ही 17-20 पैसे के करीब है। इसके अतिरिक्त, यूपीआई प्लेटफॉर्म को सुचारु रूप से चलाने के लिए बड़ी इंजीनियरिंग टीम, रिस्क मैनेजमेंट और साइबर सुरक्षा में भारी निवेश की ज़रूरत होती है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार की ओर से यूपीआई संचालन के लिए जो सब्सिडी दी जा रही थी, वह कुल परिचालन लागत का मात्र 10 प्रतिशत थी। यह स्थिति दीर्घकालिक रूप से अव्यावहारिक है।
एमडीआर से स्थिरता और विस्तार
मोबिक्विक के सह-संस्थापक, एमडी एवं सीएफओ बिपिन प्रीत सिंह ने कहा कि यूपीआई इकोसिस्टम की बदौलत भारत पिछले एक दशक में दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम बन चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एमडीआर लाने से इस इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता को बल मिलेगा।
बिपिन प्रीत सिंह ने यह भी बताया कि प्रस्तावित एमडीआर ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर ही लागू होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि छोटे कारोबारियों और छोटे मूल्य के लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
व्यापक संदर्भ
यह चर्चा ऐसे समय में आई है जब यूपीआई के ज़रिये होने वाले लेनदेन की संख्या और मूल्य दोनों लगातार रिकॉर्ड स्तर छू रहे हैं। गौरतलब है कि यूपीआई नेटवर्क को बनाए रखने की वित्तीय ज़िम्मेदारी मुख्यतः बैंकों और थर्ड-पार्टी एप्लिकेशन प्रदाताओं पर है। ऐसे में, बिना एमडीआर के इकोसिस्टम का विस्तार करना उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
आने वाले समय में, यदि एमडीआर की नीति लागू होती है, तो यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है या मर्चेंट्स पर — यही सबसे बड़ा नीतिगत प्रश्न होगा।