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यूपीआई पर एमडीआर से सिस्टम होगा सस्टेनेबल, 1 अरब यूज़र्स तक पहुँचाने का लक्ष्य: फिनटेक लीडर्स

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यूपीआई पर एमडीआर से सिस्टम होगा सस्टेनेबल, 1 अरब यूज़र्स तक पहुँचाने का लक्ष्य: फिनटेक लीडर्स

सारांश

यूपीआई पर एमडीआर लागू करना अब केवल राजस्व का सवाल नहीं — यह इकोसिस्टम के अस्तित्व का सवाल है। मोबिक्विक के नेताओं ने साफ कहा: शून्य आय और 10% सब्सिडी के साथ 1 अरब यूज़र्स का सपना अधूरा रहेगा। ₹2,000 से ऊपर के लेनदेन पर एमडीआर इस दिशा में पहला व्यावहारिक कदम हो सकता है।

मुख्य बातें

फिनटेक लीडर्स ने 16 सितंबर 2026 को कहा कि यूपीआई एमडीआर से इकोसिस्टम आर्थिक रूप से टिकाऊ बनेगा।
फिलहाल देश में 50-60 करोड़ लोग यूपीआई इस्तेमाल करते हैं; लक्ष्य अगले एक दशक में 1 अरब उपयोगकर्ता।
एक यूपीआई लेनदेन की सर्वर लागत 17-20 पैसे ; इंजीनियरिंग, साइबर सुरक्षा पर भी बड़ा निवेश जरूरी।
सरकार की मौजूदा यूपीआई सब्सिडी कुल लागत का मात्र 10 प्रतिशत थी।
प्रस्तावित एमडीआर केवल ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर लागू होगा; छोटे कारोबारी और छोटे लेनदेन इससे अप्रभावित।

मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) पर लागू करने से यह इकोसिस्टम आर्थिक रूप से टिकाऊ बनेगा और अगले एक दशक में इसे 1 अरब उपयोगकर्ताओं तक विस्तारित करने में मदद मिलेगी। बुधवार, 16 सितंबर 2026 को प्रमुख फिनटेक नेताओं ने यह बात कही। उनका कहना है कि मौजूदा ढाँचे में यूपीआई से आय शून्य है, जिससे इसे चलाने वाले बैंकों और वित्तीय कंपनियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

यूपीआई की मौजूदा स्थिति

मोबिक्विक की सह-संस्थापक, कार्यकारी निदेशक और सीएफओ उपासना टाकू ने कहा कि यूपीआई को भारत में एक दशक से अधिक समय हो चुका है और इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को बुनियादी रूप से बदल दिया है। उन्होंने बताया कि इस प्लेटफॉर्म के ज़रिये वित्तीय उत्पादों को आम लोगों तक पहुँचाना संभव हुआ, परंतु इसका दूसरा पहलू यह है कि इसे चलाने का सारा आर्थिक बोझ बैंकों और वित्तीय कंपनियों को उठाना पड़ रहा है।

टाकू के अनुसार, फिलहाल देश में करीब 50-60 करोड़ लोग यूपीआई का उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इसे अगले एक दशक में 1 अरब उपयोगकर्ताओं तक ले जाना है, तो इससे कुछ स्थिर आय का होना अनिवार्य है।

प्रति लेनदेन की लागत और सब्सिडी का अंतर

उपासना टाकू ने आगे बताया कि एक यूपीआई लेनदेन की सर्वर लागत ही 17-20 पैसे के करीब है। इसके अतिरिक्त, यूपीआई प्लेटफॉर्म को सुचारु रूप से चलाने के लिए बड़ी इंजीनियरिंग टीम, रिस्क मैनेजमेंट और साइबर सुरक्षा में भारी निवेश की ज़रूरत होती है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार की ओर से यूपीआई संचालन के लिए जो सब्सिडी दी जा रही थी, वह कुल परिचालन लागत का मात्र 10 प्रतिशत थी। यह स्थिति दीर्घकालिक रूप से अव्यावहारिक है।

एमडीआर से स्थिरता और विस्तार

मोबिक्विक के सह-संस्थापक, एमडी एवं सीएफओ बिपिन प्रीत सिंह ने कहा कि यूपीआई इकोसिस्टम की बदौलत भारत पिछले एक दशक में दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम बन चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एमडीआर लाने से इस इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता को बल मिलेगा।

बिपिन प्रीत सिंह ने यह भी बताया कि प्रस्तावित एमडीआर ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर ही लागू होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि छोटे कारोबारियों और छोटे मूल्य के लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

व्यापक संदर्भ

यह चर्चा ऐसे समय में आई है जब यूपीआई के ज़रिये होने वाले लेनदेन की संख्या और मूल्य दोनों लगातार रिकॉर्ड स्तर छू रहे हैं। गौरतलब है कि यूपीआई नेटवर्क को बनाए रखने की वित्तीय ज़िम्मेदारी मुख्यतः बैंकों और थर्ड-पार्टी एप्लिकेशन प्रदाताओं पर है। ऐसे में, बिना एमडीआर के इकोसिस्टम का विस्तार करना उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

आने वाले समय में, यदि एमडीआर की नीति लागू होती है, तो यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है या मर्चेंट्स पर — यही सबसे बड़ा नीतिगत प्रश्न होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन सरकार राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण हिचकिचाती रही। अब जब लेनदेन की मात्रा रिकॉर्ड ऊँचाई पर है और बैंकों की बैलेंसशीट पर दबाव बढ़ रहा है, तो यह बहस अपरिहार्य हो गई है। विडंबना यह है कि जिस प्लेटफॉर्म ने भारत को डिजिटल भुगतान में विश्व-नेता बनाया, वही अपनी सफलता के बोझ तले दब रहा है। ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर एमडीआर की सीमा उचित जान पड़ती है, लेकिन असली सवाल यह है कि इस लागत का बोझ अंततः किस पर पड़ेगा — और क्या इससे छोटे मर्चेंट्स को नकद भुगतान की ओर वापस धकेला जाएगा।
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपीआई पर एमडीआर क्या है और यह क्यों लाया जा रहा है?
एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान प्रसंस्करण की लागत को कवर करने के लिए लगाया जाता है। यूपीआई पर यह इसलिए लाया जा रहा है क्योंकि मौजूदा ढाँचे में यूपीआई से आय शून्य है और बैंकों व फिनटेक कंपनियों को भारी परिचालन लागत उठानी पड़ रही है।
क्या यूपीआई एमडीआर से आम उपभोक्ता प्रभावित होंगे?
फिनटेक नेताओं के अनुसार, प्रस्तावित एमडीआर केवल ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर लागू होगा। छोटे लेनदेन और छोटे कारोबारियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, जिससे आम उपभोक्ता के दैनिक भुगतान अप्रभावित रहेंगे।
यूपीआई को चलाने की वास्तविक लागत कितनी है?
मोबिक्विक की सीएफओ उपासना टाकू के अनुसार, एक यूपीआई लेनदेन की सर्वर लागत अकेले 17-20 पैसे है। इसके अतिरिक्त इंजीनियरिंग टीम, रिस्क मैनेजमेंट और साइबर सुरक्षा पर भी बड़ा निवेश करना पड़ता है। सरकार की सब्सिडी कुल लागत का मात्र 10 प्रतिशत थी।
यूपीआई के 1 अरब यूज़र्स के लक्ष्य के लिए एमडीआर क्यों जरूरी है?
फिलहाल 50-60 करोड़ लोग ही यूपीआई का उपयोग करते हैं। फिनटेक नेताओं का कहना है कि बिना एमडीआर के स्थिर राजस्व के, 1 अरब उपयोगकर्ताओं तक इकोसिस्टम का विस्तार करना आर्थिक रूप से संभव नहीं होगा।
भारत में यूपीआई को दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम का दर्जा कैसे मिला?
मोबिक्विक के सह-संस्थापक बिपिन प्रीत सिंह के अनुसार, पिछले एक दशक में यूपीआई इकोसिस्टम के विस्तार ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम बना दिया है। यह उपलब्धि बैंकों और वित्तीय कंपनियों की भारी आर्थिक कीमत पर हासिल हुई है।
राष्ट्र प्रेस
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