अमेरिका-ईरान समझौता तभी टिकेगा जब दोनों पक्ष जीत महसूस करें: शशि थरूर
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 19 जून 2026 को कहा कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते की स्थायित्व के लिए यह अनिवार्य है कि दोनों पक्ष — वॉशिंगटन और तेहरान — यह महसूस करें कि उन्होंने कुछ हासिल किया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह समझौता केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं है, बल्कि भारत सहित उन तमाम देशों के लिए राहत है जो पश्चिम एशिया संकट के आर्थिक और कूटनीतिक दबाव झेल रहे थे।
शांति समझौते की स्थायित्व पर थरूर का विश्लेषण
थरूर ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा, 'वर्साय की संधि' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि जब एक पक्ष को अपमानित महसूस कराया जाए, तो शांति टिक नहीं पाती और अंततः दूसरा विश्व युद्ध जैसी तबाही होती है। उनके अनुसार, सबसे टिकाऊ शांति समझौता वह होता है जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी जनता को कुछ ठोस दे सकें।
उन्होंने कहा कि अमेरिका यह दावा कर सकता है कि ईरान ने यूरेनियम संवर्धन रोकने और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में संवर्धित यूरेनियम नष्ट करने का वादा एमओयू में किया है। दूसरी ओर, ईरान को प्रतिबंधों से राहत, पश्चिम में फ्रीज की गई संपत्ति की बहाली और युद्ध से हुई क्षति के पुनर्निर्माण में सहायता मिली है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक आपूर्ति पर असर
थरूर ने आगाह किया कि सामान्य स्थिति तुरंत नहीं लौटेगी। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में अभी भी बारूदी सुरंगें बिछी हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि तेल आपूर्ति शुरू हो सकती है, लेकिन इसके लिए ईरान को पहले सभी बारूदी सुरंगें हटानी होंगी। युद्ध के दौरान नष्ट हुई तेल और गैस सुविधाओं की मरम्मत में भी समय लगेगा।
उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि शांति बनी रहती है, तो लगभग एक से डेढ़ साल में स्थिति युद्ध-पूर्व स्तर पर लौट सकती है। तब तक वैश्विक तेल कीमतों, ईंधन संकट और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं से जूझना पड़ सकता है।
850 सांसदों वाली संसद पर सवाल
थरूर ने 'संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2026' पर भी अपनी राय रखी, जिसके तहत लोकसभा में सीटें बढ़ाकर 850 की जा सकती हैं। उन्होंने पूछा कि क्या दुनिया में कहीं भी 850 सदस्यों वाली संसद है? उनके अनुसार, अमेरिका में आबादी तीन गुना बढ़ने के बावजूद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की संख्या 435 पर ही सीमित रखी गई है, क्योंकि अत्यधिक बड़ा सदन अपनी सार्थकता खो देता है।
उन्होंने कहा कि 543 सदस्यों के साथ भी शून्य काल में बोलने और क्षेत्रीय मुद्दे उठाने का अवसर सीमित है; 850 सदस्यों के साथ यह व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा। उन्होंने यूरोपीय संघ के मॉडल का हवाला देते हुए सुझाया कि राज्यों के लिए न्यूनतम और अधिकतम सीट सीमा तय की जाए, ताकि उत्तर प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों के बीच अत्यधिक असंतुलन न हो।
मोदी के कार्यकाल, TMC विभाजन और राम मंदिर विवाद पर टिप्पणी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार सबसे लंबे कार्यकाल के सवाल पर थरूर ने कहा कि मोदी में असाधारण ऊर्जा और एक स्पष्ट विजन है, और वे हिंदी के बेहतरीन वक्ताओं में से एक हैं। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि पिछले 12 वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई है और सांप्रदायिक बंटवारे की प्रवृत्ति बढ़ी है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विभाजन पर थरूर ने कहा कि TMC के 20 सांसदों का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ जुड़ना यह दर्शाता है कि देश की राजनीति सिद्धांत-विहीन हो गई है, क्योंकि ये वही सांसद हैं जो 12 वर्षों तक NDA पर हमले करते रहे।
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित दुरुपयोग पर थरूर ने कहा कि करोड़ों रुपये के संभावित गबन की खबर आस्था के साथ गहरा विश्वासघात है और अधिकांश सच्चे हिंदू भी इसे धोखे के रूप में देखेंगे।
आगे की राह
थरूर के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान समझौते की असली परीक्षा अगले कुछ महीनों में होगी जब होर्मुज जलडमरूमध्य की सफाई और तेल सुविधाओं की बहाली की प्रक्रिया शुरू होगी। घरेलू मोर्चे पर, परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक पर मानसून सत्र में होने वाली बहस भारतीय संसदीय राजनीति की दिशा तय करेगी।