यूएससीआईआरएफ रिपोर्ट पर पूर्व अधिकारियों का कड़ा विरोध, तथ्यात्मक आधार पर उठाए सवाल
सारांश
Key Takeaways
- यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट पर 275 पूर्व अधिकारियों का विरोध
- धार्मिक स्वतंत्रता का मूल्यांकन दीर्घकालिक आंकड़ों पर होना चाहिए
- भारत में अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिरता
- आरएसएस का सामाजिक योगदान
- रिपोर्ट में उठाए गए सवालों की जांच की आवश्यकता
नई दिल्ली, 22 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अमेरिकी संस्था 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' (यूएससीआईआरएफ) की नवीनतम रिपोर्ट पर भारत के 275 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने गहरी आपत्ति व्यक्त की है। इनमें 25 सेवानिवृत्त न्यायाधीश, 119 पूर्व नौकरशाह (जिनमें 10 पूर्व राजदूत शामिल हैं) और 131 पूर्व सैन्य अधिकारी सम्मिलित हैं।
इन हस्ताक्षरकर्ताओं ने संयुक्त तौर पर यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट को भ्रामक और तथ्यों से परे बताया है। उनका तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील मुद्दे का मूल्यांकन कुछ चुनी हुई घटनाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण आवश्यक है।
हस्ताक्षरकर्ताओं के पत्र में 1947 के विभाजन के समय के आंकड़ों का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि उस समय अविभाजित पाकिस्तान (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल था) में हिंदू जनसंख्या लगभग 20.5 प्रतिशत थी। वर्तमान में, पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर करीब 1.5-2 प्रतिशत रह गई है, जबकि बांग्लादेश में यह 7-8 प्रतिशत है। 1951 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदू जनसंख्या 20-22 प्रतिशत के बीच थी, जो अब काफी कम हो चुकी है।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि 1971 में बांग्लादेश के अलग होने के बावजूद, दोनों देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में निरंतर गिरावट एक गहरी चिंता का विषय है, जिसे अकादमिक और नीतिगत स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
भारत की स्थिति को अलग बताते हुए, हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि यहां अल्पसंख्यक समुदायों की जनसंख्या में स्थिरता या वृद्धि देखी गई है। आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मुस्लिम जनसंख्या 1951 में 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, ईसाई समुदाय की जनसंख्या 1951 से 2011 तक लगभग 2.3 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही, जबकि सिख समुदाय की हिस्सेदारी 1.79 प्रतिशत से गिरकर 1.72 प्रतिशत हो गई।
पत्र में कहा गया है कि ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में ऐसा कोई संविधानिक दबाव या उत्पीड़न नहीं है, जिससे अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में निरंतर गिरावट हो।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने यूएससीआईआरएफ पर यह आरोप भी लगाया कि वह बिना उचित और ठोस प्रमाण के भारत की संस्थाओं और सामाजिक संगठनों, विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), को अक्सर नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की आलोचना तथ्यों और संदर्भ के आधार पर होनी चाहिए, न कि सामान्यीकृत धारणाओं पर।
पत्र में भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा गया है कि यहां मजबूत न्यायिक प्रणाली, सक्रिय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संसदीय निगरानी हैं, जिससे किसी भी व्यक्ति या संगठन को धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन पर बच निकलने की संभावना बहुत कम है।
आरएसएस के बारे में कहा गया है कि यह संगठन 1925 में स्थापित हुआ था और पिछले 100 वर्षों से ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निरंतर सेवा कर रहा है। विश्वभर में इसके प्रेरित संगठन आपदा राहत और सामाजिक सेवा में भी सक्रिय हैं।
यूएससीआईआरएफ की उन सिफारिशों की कड़ी आलोचना की गई है, जिनमें भारत के नागरिकों पर प्रतिबंध लगाने और आरएसएस के सदस्यों की संपत्तियों को फ्रीज करने की बात की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे प्रेरित और असंतुलित बताते हुए अमेरिकी सरकार से इस रिपोर्ट में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करने की मांग की है। इस पत्र के समन्वयक पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी और पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एम. मदन गोपाल हैं।
बता दें कि यूएससीआईआरएफ अमेरिकी सरकार की एक स्वतंत्र, द्विदलीय सलाहकार संस्था है, जो विश्वभर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट जारी करती है। यह रिपोर्ट मुख्यतः धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और सरकारी नीतियों की आलोचना करती है।
इस बार की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक उत्पीड़न और हिंसा पर ठोस कदम नहीं उठा रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के मताधिकार को लेकर भी भारत सरकार के नियम भेदभावपूर्ण हैं। रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम और विभिन्न राज्य स्तरीय धर्मांतरण विरोधी और गोहत्या विरोधी कानून का उल्लेख किया गया है।