यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट पर पूर्व अधिकारियों की कड़ी आपत्ति, तथ्यों से दूर और भ्रामक आकलन
सारांश
Key Takeaways
- यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट पर पूर्व अधिकारियों की तीखी प्रतिक्रिया
- भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के आंकड़े स्थिर
- पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू जनसंख्या का गिरना
- आलोचना का स्वागत, लेकिन तथ्यपरक होना चाहिए
- रिपोर्ट में दिए गए सुझावों पर सवाल
नई दिल्ली, 21 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। धार्मिक स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता (यूएससीआईआरएफ) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को लेकर पूर्व अधिकारियों के एक समूह ने तीव्र आपत्ति व्यक्त की है। उन्होंने इस रिपोर्ट को “चिंताजनक” और “पूर्णतः तथ्यों से परे” करार देते हुए इसकी विश्वसनीयता और विश्लेषणात्मक संतुलन पर सवाल उठाए हैं।
इस समूह में पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व सरकारी अधिकारियों, पूर्व राजदूतों और पूर्व सैन्य अधिकारियों शामिल हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने इस पत्र में कहा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का आकलन “चुनिंदा घटनाओं” के बजाय दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय रुझानों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक आंकड़ों को संदर्भित करते हुए कहा कि भारत के विपरीत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू जनसंख्या में तेज गिरावट देखी गई है, जबकि भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति स्थिर या बेहतर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1947 में विभाजन के समय अविभाजित पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या लगभग 20.5 प्रतिशत थी, जो अब घटकर लगभग 1.5–2 प्रतिशत रह गई है। बांग्लादेश में यह आंकड़ा 1951 के 20–22 प्रतिशत से घटकर 7 से 8 प्रतिशत तक आ गया है।
इसके विपरीत, भारत के जनगणना आंकड़ों के अनुसार, देश में मुस्लिम जनसंख्या 1951 के 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गई है, जबकि ईसाई और सिख समुदायों की जनसंख्या इस अवधि में लगभग स्थिर रही है।
हस्ताक्षरकर्ताओं का तर्क है कि ये दीर्घकालिक आंकड़े भारत में एक “समग्र सामाजिक परिवेश” को दर्शाते हैं, जहां अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यवस्थित उत्पीड़न या संस्थागत भेदभाव का कोई संकेत नहीं मिलता।
रिपोर्ट की निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठनों को बिना पर्याप्त साक्ष्यों के नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना यूएससीआईआरएफ की “दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति” है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना का स्वागत है, लेकिन यह तथ्यपरक और संदर्भित होनी चाहिए।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली पर जोर देते हुए कहा कि देश की न्यायपालिका, संसदीय निगरानी और अन्य संस्थागत तंत्र धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, ऐसे तंत्र मौजूद हैं, जो धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं को अनदेखा करना कठिन बनाते हैं।
इसके अलावा, यूएससीआईआरएफ द्वारा सुझाए गए प्रतिबंधों, जैसे आरएसएस से जुड़े व्यक्तियों पर संपत्ति फ्रीज और यात्रा प्रतिबंध को भी “अनुचित” और “बिना आधार” बताया गया।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने यूएससीआईआरएफ की संरचना पर भी प्रश्न उठाए। उनका कहना है कि आयोग के सदस्य अमेरिकी सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं और इसे अमेरिकी करदाताओं द्वारा वित्तपोषित किया जाता है। इसलिए, उन्होंने अमेरिकी प्रशासन से रिपोर्ट तैयार करने में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि की “गंभीर जांच” की मांग की है, यह आरोप लगाते हुए कि इसमें पक्षपात और छिपे एजेंडे हो सकते हैं, जो भारत की वैश्विक छवि को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
अंततः, हस्ताक्षरकर्ताओं ने धार्मिक सद्भाव और मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग में अधिक निष्पक्षता, बौद्धिक ईमानदारी और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता की बहस को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इस पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।