रुद्रप्रयाग: अंडाशय में गर्भ ठहरा, फटा तो पेट में भर गया खून — डॉ. संजीव कटारा ने बचाई जान
सारांश
मुख्य बातें
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिला अस्पताल में डॉ. संजीव कटारा और उनकी चिकित्सकीय टीम ने 28 सितंबर 2026 को एक असामान्य और जानलेवा स्थिति से जूझ रही महिला की सफलतापूर्वक सर्जरी कर उसकी जान बचाई। नेपाल मूल की इस महिला के अंडाशय में गर्भ ठहरा था, जो फट जाने के कारण पेट के भीतर बड़े पैमाने पर रक्तस्राव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। समय पर किए गए ऑपरेशन के बाद अब महिला खतरे से बाहर है।
दस साल की प्रतीक्षा, फिर अनपेक्षित जटिलता
केदारघाटी में अपने पति के साथ मजदूरी करने वाली इस महिला की शादी को करीब दस वर्ष हो चुके थे। इस लंबे अंतराल के बाद जब करीब ढाई महीने पहले गर्भ ठहरने की खबर मिली, तो पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन जाँच में चिकित्सकों ने पाया कि भ्रूण गर्भाशय में नहीं, बल्कि अंडाशय (ओवरी) में विकसित हो रहा था। चिकित्सकों के अनुसार यह एक अत्यंत असामान्य और चिकित्सकीय दृष्टि से गंभीर स्थिति थी।
अंडाशय में भ्रूण के विकास के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता, जिसके कारण महिला को लगातार दर्द बना रहा। चिकित्सकीय भाषा में इसे एक्टोपिक प्रेग्नेंसी की एक दुर्लभ किस्म माना जाता है।
28 सितंबर: जब हालत बनी जानलेवा
28 सितंबर 2026 को अचानक दर्द असहनीय हो गया। महिला के पति ने उसे तत्काल नारायणकोटी स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया, जहाँ स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए चिकित्सकों ने उसे जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग रेफर कर दिया। जिला अस्पताल पहुँचने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव कटारा ने तत्काल जाँच और अल्ट्रासाउंड किया। जाँच में स्पष्ट हुआ कि अंडाशय फट चुका है और पेट के भीतर बड़ी मात्रा में रक्त जमा हो गया है।
डॉ. कटारा ने आकलन किया कि महिला को दूसरे अस्पताल रेफर करने में लगने वाला समय उसकी जान पर भारी पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद तत्काल ऑपरेशन का निर्णय लिया।
सर्जरी: सीमित संसाधन, असीमित हौसला
डॉ. संजीव कटारा और उनकी पूरी टीम ने बिना समय गंवाए आपातकालीन सर्जरी आरंभ की। एक जिला अस्पताल की सीमित सुविधाओं के बीच किए गए इस ऑपरेशन में टीम को सफलता मिली। रक्तस्राव पर नियंत्रण पाया गया और महिला की जान बचाई जा सकी। यह ऐसे समय में आया जब ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में चिकित्सकीय सुविधाओं की पहुँच को लेकर अक्सर चिंताएँ जताई जाती हैं।
आम जनता और चिकित्सा समुदाय पर असर
यह मामला पहाड़ी क्षेत्रों में प्रसव-पूर्व जाँच की अहमियत को रेखांकित करता है। चिकित्सकों के अनुसार, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी — विशेषकर अंडाशय में — अत्यंत दुर्लभ होती है और यदि समय पर पहचान न हो, तो जानलेवा साबित हो सकती है। गौरतलब है कि दूरदराज़ के क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासी मजदूर परिवार अक्सर नियमित चिकित्सकीय जाँच से वंचित रह जाते हैं।
फिलहाल महिला खतरे से बाहर है और उसके स्वास्थ्य में सुधार जारी है। डॉ. कटारा और उनकी टीम के इस त्वरित निर्णय को स्थानीय चिकित्सा जगत में सराहा जा रहा है।
क्या होगा आगे
महिला की आगे की देखभाल रुद्रप्रयाग जिला अस्पताल में जारी है। चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे मामलों में शीघ्र निदान और त्वरित सर्जिकल हस्तक्षेप ही एकमात्र प्रभावी उपचार है। विशेषज्ञ इस घटना को उदाहरण के रूप में रखते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में जागरूकता अभियान और नियमित प्रसव-पूर्व जाँच की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं।