वाघेला के 'मैला उठाओ' बयान पर डॉ. यज्ञेश दवे का पलटवार — 'मेरे घर से शुरुआत करो, ₹5 लाख महीना दूंगा'
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल होने से पहले ही एक विवादास्पद बयान को लेकर सियासी घेराबंदी में आ गए हैं। नर्मदा जिले के सागवाड़ा में आयोजित एक आदिवासी-दलित सम्मेलन में वाघेला ने कहा था कि यदि सवर्ण जातियाँ — पटेल, बनिया और ब्राह्मण — आदिवासी समाज का मैला उठाएं, तो वे उन्हें ₹50,000 प्रति माह वेतन देने को तैयार हैं। इस टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए गुजरात ब्रह्म समाज के नेता डॉ. यज्ञेश दवे ने वाघेला को ही चुनौती दी — वे चाहते हैं कि 'बापू' इसकी शुरुआत खुद अपने हाथों से करें।
सम्मेलन में क्या हुआ
गुजरात प्रदेश कांग्रेस की ओर से आदिवासी बहुल नर्मदा जिले के सागवाड़ा में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें आदिवासी और दलित समाज के नेता शामिल थे। इसमें गुजरात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा, कार्यकारी अध्यक्ष जिग्नेश मेवाणी, कांग्रेस विधायक अनंत पटेल और अन्य आदिवासी व दलित नेता भी उपस्थित थे।
इसी मंच से वाघेला ने कहा कि जो लोग आरक्षण के विरोधी हैं, उन्हें व्यावहारिक रूप से यह समझना चाहिए कि समाज में श्रम की गरिमा क्या होती है। उन्होंने सवर्ण जातियों को संबोधित करते हुए मैला उठाने के एवज में ₹50,000 मासिक वेतन का प्रस्ताव रखा।
डॉ. यज्ञेश दवे का पलटवार
गुजरात ब्रह्म समाज के नेता डॉ. यज्ञेश दवे ने इस बयान को 'पुरानी और निरस्त हो चुकी व्यवस्था को फिर से उकसाने' की कोशिश बताया। उन्होंने कहा, 'शंकर सिंह वाघेला गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और कई पक्षों में वो अपना स्थान ले चुके हैं और अभी कांग्रेस से जुड़ने जा रहे हैं। उन्होंने बनिया, पटेल और ब्राह्मण तीनों को निशाना बनाकर कहा कि वे मैला उठाएं, ₹50 हजार रुपए हर महीने मैं दूंगा।'
डॉ. दवे ने आगे कहा कि ऐसे 'शुभ कार्य' की शुरुआत वाघेला को खुद से करनी चाहिए। उन्होंने सीधे प्रस्ताव दिया — 'मेरे घर का मैल उठाइए, मैं हर महीने आपको ₹5 लाख रुपए दूंगा।' यह राशि वाघेला के प्रस्तावित वेतन से दस गुना अधिक है।
कानूनी और सामाजिक संदर्भ
डॉ. दवे ने यह भी रेखांकित किया कि देश में मैला ढोने की प्रथा कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा, 'बापू को ये पता होना चाहिए कि ऐसी कोई पद्धति इस देश में ही नहीं है। पुराने समय में राजाओं के शासन में ऐसा होता था, लेकिन सरकार ने सत्ता में आने के बाद से पहला काम इस पद्धति को बंद करने का किया।'
गौरतलब है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध अधिनियम, 2013 के तहत भारत में मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस कानून का उल्लंघन दंडनीय अपराध है। इस संदर्भ में वाघेला का बयान कानूनी दृष्टि से भी सवालों के घेरे में है।
राजनीतिक निहितार्थ
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब वाघेला — जिन्हें गुजरात में 'बापू' कहा जाता है — कांग्रेस में शामिल होने की तैयारी में थे। आलोचकों का कहना है कि इस बयान ने कांग्रेस के लिए नई मुश्किल खड़ी कर दी है, खासकर तब जब पार्टी गुजरात में सवर्ण और OBC मतदाताओं तक पहुँचने की कोशिश कर रही है।
यह पहला मौका नहीं है जब वाघेला के किसी बयान ने राजनीतिक हलचल पैदा की हो — उनकी बेबाक शैली अक्सर विवाद का केंद्र बनती रही है। आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करेगा या नहीं, यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा।