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संविधान सभा में हिंदी की लड़ाई: वेंकटेश नारायण तिवारी की पुण्यतिथि पर विशेष

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संविधान सभा में हिंदी की लड़ाई: वेंकटेश नारायण तिवारी की पुण्यतिथि पर विशेष

सारांश

वेंकटेश नारायण तिवारी ने हिंदी की लड़ाई सिर्फ जज्बे से नहीं, सरकारी आँकड़ों और संविधान सभा की बहसों से लड़ी। पत्रकार, किसान-हितैषी और संसदीय योद्धा — उनकी पुण्यतिथि पर एक भूली-बिसरी विरासत को याद करना ज़रूरी है।

मुख्य बातें

वेंकटेश नारायण तिवारी कानपुर में जन्मे और गोपालकृष्ण गोखले की 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' के आजीवन सदस्य थे।
1910 में 'अभ्युदय' संपादक के राजद्रोह मुकदमे में पंडित नेहरू के साथ निर्भीक गवाही दी।
1937 की 'किसान जांच समिति' रिपोर्ट — जिसके अध्यक्ष तिवारी और सचिव लाल बहादुर शास्त्री थे — ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन की नींव रखी।
पुस्तक 'हिन्दी बनाम उर्दू' (1939) ने 1891–1936 के सरकारी आँकड़ों से देवनागरी की स्वाभाविक प्रगति सिद्ध की।
1946 में संविधान सभा सदस्य बने; 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित करवाने में ऐतिहासिक योगदान।
1951-52 में कानपुर-फर्रुखाबाद सीट से देश के प्रथम लोकसभा सदस्यों में शामिल; 20 जून 1964 को निधन।

वेंकटेश नारायण तिवारी — कानपुर में जन्मे और प्रयागराज की बौद्धिक परंपरा में दीक्षित — उन विरले स्वतंत्रता सेनानियों में से थे जिन्होंने पत्रकारिता, राजनीति और भाषा-संघर्ष को एक साथ अपना माध्यम बनाया। गोपालकृष्ण गोखले की प्रतिष्ठित 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' के आजीवन सदस्य रहे तिवारी ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करवाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 20 जून 1964 को उनके निधन के छह दशक बाद भी उनकी विरासत भारतीय संसदीय और भाषाई इतिहास में अमिट है।

निर्भीक पत्रकार और गवाह

वर्ष 1910 में जब ब्रिटिश सरकार ने 'अभ्युदय' पत्र के संपादक कृष्णकांत मालवीय पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, तब औपनिवेशिक अदालत के भारी दबाव की परवाह किए बिना वेंकटेश नारायण तिवारी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्याम मोहन के साथ मालवीय के पक्ष में निर्भीक गवाही दी। यह साहस उनके पूरे जीवन की पहचान बना।

तिवारी ने आगे चलकर 'अभ्युदय', 'भारत' और स्वतंत्रता के बाद 1955 में दिल्ली से प्रकाशित 'जनसत्ता' का संपादन किया। उनकी प्रखर पत्रकारिता ने जनचेतना को जगाए रखने का काम किया।

किसान आंदोलन और जमींदारी उन्मूलन की नींव

लखनऊ कांग्रेस के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के किसानों की दुर्दशा का अध्ययन करने हेतु गठित 'किसान जांच समिति' के अध्यक्ष वेंकटेश नारायण तिवारी थे, जबकि उस समिति के सचिव तत्कालीन युवा नेता और बाद में देश के प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री थे। 1937 में प्रकाशित इस समिति की ऐतिहासिक रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन की वैचारिक और नीतिगत नींव रखी।

गौरतलब है कि यह वह दौर था जब भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की दशा भी चिंता का विषय थी। तिवारी को 'पिल्लई आयोग' का सदस्य सचिव बनाकर गुयाना भेजा गया, जहाँ उन्होंने प्रवासी भारतीय श्रमिकों की स्थिति का प्रत्यक्ष अध्ययन किया।

हिंदी बनाम 'हिन्दुस्तानी' — वैज्ञानिक संघर्ष

वर्ष 1939 में जब राजनीतिक समझौतों की आड़ में हिंदी के स्थान पर कृत्रिम 'हिन्दुस्तानी' भाषा थोपने का प्रयास हुआ, तब वेंकटेश नारायण तिवारी ने इसका पुरजोर विरोध किया। उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने यह लड़ाई केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सांख्यिकीय साक्ष्यों के बल पर लड़ी।

उनकी पुस्तक 'हिन्दी बनाम उर्दू' (1939) ने 1891 से 1936 तक के सरकारी आँकड़ों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि भारतीय समाज स्वाभाविक रूप से देवनागरी लिपि और परिष्कृत हिंदी की ओर अग्रसर है। यह पुस्तक भाषा-विमर्श में एक मील का पत्थर मानी जाती है।

संविधान सभा में राजभाषा की ऐतिहासिक जीत

वर्ष 1946 में वेंकटेश नारायण तिवारी संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। देश के संघीय ढाँचे को सुदृढ़ करने और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करवाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। यह वह क्षण था जब दशकों की वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई संविधान की स्याही में ढल गई।

पहले लोकसभा सदस्य और अमर विरासत

स्वतंत्रता के बाद 1951-1952 के पहले आम चुनाव में वेंकटेश नारायण तिवारी कानपुर-फर्रुखाबाद सीट से देश के प्रथम लोकसभा सदस्यों में शामिल हुए। 20 जून 1964 को उनका निधन हुआ। कानपुर स्थित उनका निवास 'हरिहर नाथ भवन' आज भी भारत के स्वर्णिम स्वतंत्रता-संग्राम और भाषाई इतिहास का मूक साक्षी बना खड़ा है। उनके जीवन-कार्य की प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि राजभाषा हिंदी का संवैधानिक दर्जा उनके जैसे संघर्षशील प्रहरियों की देन है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पत्रकारीय और संसदीय लड़ाई का परिणाम थी। आज जब हिंदी-अहिंदी विवाद नए रूपों में उभरता है, तब यह जानना ज़रूरी है कि 1939 में तिवारी ने यह बहस भावनाओं से नहीं, सरकारी आँकड़ों से जीती थी। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर संविधान सभा की हिंदी-बहस को महज राजनीतिक समझौते के रूप में पेश करती है, जबकि तिवारी जैसे व्यक्तित्वों ने उसे वैज्ञानिक और सामाजिक आधार दिया। उनकी विरासत आज भी प्रासंगिक है — भाषा-नीति के हर नए विवाद में उनके तर्क-शस्त्र की ज़रूरत महसूस होती है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वेंकटेश नारायण तिवारी कौन थे?
वेंकटेश नारायण तिवारी कानपुर में जन्मे स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और संविधान सभा सदस्य थे। वे गोपालकृष्ण गोखले की 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' के आजीवन सदस्य रहे और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करवाने में उनकी निर्णायक भूमिका थी।
हिंदी राजभाषा बनाने में वेंकटेश नारायण तिवारी की क्या भूमिका थी?
1946 में संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के सदस्य चुने गए तिवारी ने देश के संघीय ढाँचे को मज़बूत करने और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित करवाने में ऐतिहासिक योगदान दिया। इससे पहले 1939 में उनकी पुस्तक 'हिन्दी बनाम उर्दू' ने सरकारी आँकड़ों से देवनागरी की स्वाभाविक प्रगति सिद्ध कर इस बहस को वैज्ञानिक आधार दिया था।
'हिन्दी बनाम उर्दू' पुस्तक क्या है और इसका महत्व क्यों है?
1939 में प्रकाशित यह पुस्तक वेंकटेश नारायण तिवारी द्वारा लिखी गई थी, जिसमें 1891 से 1936 तक के सरकारी आँकड़ों के आधार पर यह प्रमाणित किया गया कि भारतीय समाज स्वाभाविक रूप से देवनागरी लिपि और परिष्कृत हिंदी की ओर बढ़ रहा है। यह पुस्तक 'हिन्दुस्तानी' थोपने के प्रयासों के विरुद्ध एक तार्किक और सांख्यिकीय प्रतिवाद थी।
किसान जांच समिति में लाल बहादुर शास्त्री की क्या भूमिका थी?
लखनऊ कांग्रेस के निर्देश पर गठित किसान जांच समिति के अध्यक्ष वेंकटेश नारायण तिवारी थे, जबकि तत्कालीन युवा नेता लाल बहादुर शास्त्री इसके सचिव थे। 1937 में प्रकाशित इस समिति की रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन की नीतिगत नींव रखी।
वेंकटेश नारायण तिवारी का निधन कब हुआ और उनकी स्मृति कैसे जीवित है?
वेंकटेश नारायण तिवारी का निधन 20 जून 1964 को हुआ। कानपुर स्थित उनका निवास 'हरिहर नाथ भवन' आज भी भारत के स्वतंत्रता-संग्राम और भाषाई इतिहास का साक्षी बना हुआ है। 1951-52 के पहले आम चुनाव में वे कानपुर-फर्रुखाबाद सीट से देश के प्रथम लोकसभा सदस्यों में शामिल थे।
राष्ट्र प्रेस
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