वीजीआरसी में सांखेड़ा फर्नीचर की धूम: ग्लोबल खरीदारों से जुड़ेंगे गुजरात के कारीगर
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात की वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (वीजीआरसी) में इस बार राज्य की सदियों पुरानी हस्तशिल्प विरासत को वैश्विक मंच मिलने जा रहा है। 29-30 जून 2026 को वडोदरा की जीएसएफसी यूनिवर्सिटी में आयोजित इस सम्मेलन में गुजरात का प्रतिष्ठित सांखेड़ा फर्नीचर प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि स्थानीय कारीगरों को देश-विदेश के बाज़ारों से सीधे जोड़ा जा सके। राज्य सरकार का यह कदम 'विकसित गुजरात से विकसित भारत' के विज़न का हिस्सा बताया जा रहा है।
सांखेड़ा फर्नीचर: विरासत और पहचान
वडोदरा के निकट स्थित सांखेड़ा गाँव और उसके आसपास के क्षेत्रों में तैयार होने वाला यह फर्नीचर अपने चमकदार लैकर कार्य और हाथ से उकेरे गए बारीक डिज़ाइनों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से खराडी कारीगर समुदाय द्वारा पीढ़ियों से निर्मित यह लकड़ी का फर्नीचर अब देश के प्रमुख शहरों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी अपनी जगह बना चुका है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यह कला लगभग 200 वर्ष पुरानी है, जब एक संत ने स्थानीय बढ़ई परिवारों को लैकर और धातु की सजावट से लकड़ी को सँवारने की तकनीक से परिचित कराया था। इस विशिष्ट पहचान को मान्यता देते हुए इसे जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग भी प्रदान किया जा चुका है।
निर्माण प्रक्रिया और उत्पाद श्रृंखला
कारीगर लकड़ी को आकार देने के लिए पारंपरिक औज़ारों के साथ-साथ लेथ मशीनों का उपयोग करते हैं। इसके बाद हाथ से पेंटिंग, लैकर कोटिंग और पॉलिशिंग के ज़रिए प्रत्येक नग को अंतिम रूप दिया जाता है। एक अकेले उत्पाद को तैयार करने में लगभग एक महीने का समय लग सकता है। इस शिल्प की उत्पाद श्रृंखला में पारंपरिक झूले, स्टूल, कुर्सियाँ, सोफा सेट, बच्चों के पालने और डाइनिंग टेबल शामिल हैं — हर नग में पीढ़ियों की दक्षता और हाथ की बारीक कारीगरी झलकती है। यह फर्नीचर मुख्यतः सांखेड़ा के अलावा वडोदरा और छोटा उदयपुर ज़िलों के आसपास के क्षेत्रों में बनाया जाता है।
सरकारी सहयोग और कारीगरों की आय में वृद्धि
गुजरात स्टेट हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने कारीगरों की सहायता के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। इनमें प्रदर्शनियों, मेलों और मार्केटिंग प्लेटफॉर्म में भागीदारी के अवसर, आधुनिक डिज़ाइन प्रशिक्षण, गुणवत्ता सुधार, नई उत्पादन तकनीकें और वित्तीय सहायता शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार इन प्रयासों से कारीगरों की आय में लगभग 20 से 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
अहमदाबाद, दिल्ली और मुंबई में आयोजित हस्तशिल्प मेलों, एक्सपो और प्रदर्शनियों के ज़रिए सांखेड़ा फर्नीचर को नए ग्राहकों तक पहुँचाया गया है। एम्पोरियम और अन्य बिक्री केंद्रों के माध्यम से प्रत्यक्ष विपणन चैनल भी स्थापित किए गए हैं।
वैश्विक बाज़ार में बढ़ती माँग
सांखेड़ा फर्नीचर की माँग अब गुजरात की सीमाओं से आगे निकलकर मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु तक पहुँच चुकी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बाज़ारों में निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जहाँ पारंपरिक झूलों, कुर्सियों, सोफा सेट और घरेलू सजावट की वस्तुओं को खरीदार मिल रहे हैं।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्तमान में लगभग तीन सांखेड़ा फर्नीचर कारीगर इन गतिविधियों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं, जबकि हज़ारों लोग परोक्ष रूप से इस पारंपरिक हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था से जीविका अर्जित कर रहे हैं।
वीजीआरसी से क्या उम्मीदें
अधिकारियों का कहना है कि वीजीआरसी जैसे मंच सांखेड़ा फर्नीचर को निवेशकों, खरीदारों और वैश्विक बाज़ारों से जोड़ने के नए रास्ते खोलेंगे। यह सम्मेलन न केवल औद्योगिक निवेश और विकास का मंच बनेगा, बल्कि गुजरात की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का अवसर भी साबित होगा। आने वाले समय में यह पहल कारीगरों की आजीविका को और मज़बूत करने और राज्य की पारंपरिक शिल्पकला को संरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।