20 अक्टूबर 2026
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विजयादशमी पर छत्रपति संभाजीनगर में शूर्पणखा दहन, पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम ने पुरुष आयोग की मांग उठाई

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विजयादशमी पर छत्रपति संभाजीनगर में शूर्पणखा दहन, पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम ने पुरुष आयोग की मांग उठाई

सारांश

विजयादशमी के प्रतीकवाद को नया मोड़ देते हुए छत्रपति संभाजीनगर के पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम ने लगातार 10वें साल शूर्पणखा दहन किया और स्वतंत्र पुरुष आयोग की माँग दोहराई — एक ऐसा आंदोलन जो कानूनों के कथित दुरुपयोग और लैंगिक न्याय की परिभाषा पर बहस को नए सिरे से उकसा रहा है।

मुख्य बातें

पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम ने 20 अक्टूबर 2026 को छत्रपति संभाजीनगर में विजयादशमी के अवसर पर शूर्पणखा दहन किया।
संगठन पिछले 10 वर्षों से स्वतंत्र पुरुष आयोग की स्थापना की माँग कर रहा है।
अध्यक्ष भारत फुलारे ने आरोप लगाया कि महिला सुरक्षा कानूनों का कथित तौर पर दुरुपयोग कर पुरुषों व उनके परिजनों को परेशान किया जा रहा है।
संगठन का तर्क है कि जैसे महिलाओं के लिए आयोग है, उसी तर्ज़ पर पुरुषों की शिकायतें सुनने की व्यवस्था होनी चाहिए।
संगठन ने घोषणा की कि माँग पूरी होने तक प्रत्येक विजयादशमी पर यह प्रदर्शन जारी रहेगा।

छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र में विजयादशमी, 20 अक्टूबर 2026 के अवसर पर पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम ने एक अनोखा प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया — संगठन ने शूर्पणखा दहन कर स्वतंत्र पुरुष आयोग की स्थापना की माँग सरकार तक पहुँचाने की कोशिश की। यह आयोजन वालुज स्थित संगठन की ओर से किया गया, जो कथित तौर पर अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित पुरुषों के अधिकारों के लिए काम करता है।

मुख्य घटनाक्रम

संगठन के अध्यक्ष भारत फुलारे ने बताया कि पिछले 10 वर्षों से प्रत्येक विजयादशमी को शूर्पणखा दहन के ज़रिये यह आंदोलन किया जा रहा है। उनके अनुसार, जिस तरह रावण दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार महिलाओं में पाई जाने वाली बुरी प्रवृत्तियों के विरुद्ध भी प्रतीकात्मक विरोध आवश्यक है।

गौरतलब है कि यह आंदोलन केवल एक दिन का नहीं, बल्कि एक दशक से चली आ रही निरंतर माँग का हिस्सा है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि जब तक पुरुष आयोग गठित नहीं हो जाता, तब तक यह प्रदर्शन जारी रहेगा।

संगठन की माँग और तर्क

भारत फुलारे ने आरोप लगाया कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कुछ कानूनों का कथित तौर पर दुरुपयोग कर पुरुषों और उनके परिजनों को परेशान किया जा रहा है। उनका कहना है कि हर मामले में महिला ही सही हो, यह आवश्यक नहीं है, और कई बार पुरुष भी अन्याय का सामना करते हैं।

संगठन का तर्क है कि जिस तरह महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग व अन्य न्यायिक व्यवस्थाएँ मौजूद हैं, उसी तर्ज़ पर पुरुषों की शिकायतें सुनने और उन्हें समान न्याय दिलाने के लिए एक स्वतंत्र पुरुष आयोग का गठन होना चाहिए।

संगठन की पृष्ठभूमि

वालुज, छत्रपति संभाजीनगर स्थित पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम पिछले 10 वर्षों से पुरुषों के अधिकारों के लिए सक्रिय है। यह संगठन उन पुरुषों को सहयोग और मंच प्रदान करता है जो कथित तौर पर अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित महसूस करते हैं और कानूनी सहारे के अभाव में हाशिये पर हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब देश में पुरुष अधिकार आंदोलन धीरे-धीरे संगठित रूप ले रहा है और सामाजिक-कानूनी विमर्श में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

आम जनता पर असर

इस प्रदर्शन ने सामाजिक माध्यमों पर बहस छेड़ दी है — एक वर्ग इसे पुरुषों के वैध अधिकारों की आवाज़ मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग शूर्पणखा दहन जैसे प्रतीकात्मक कदम पर सवाल उठा रहा है। आलोचकों का कहना है कि महिला पात्रों के दहन जैसे आयोजन सामाजिक संवाद को नकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं।

क्या होगा आगे

संगठन ने घोषणा की है कि पुरुष आयोग की माँग पूरी होने तक प्रत्येक विजयादशमी पर यह आंदोलन दोहराया जाएगा। भारत फुलारे के अनुसार, संगठन अपनी माँग को लेकर शासन-प्रशासन के उच्च स्तर तक पहुँचने की कोशिश जारी रखेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि यह एक न्यायिक माँग को सांस्कृतिक विवाद में बदल देता है। असली मुद्दा — कानूनों के कथित दुरुपयोग की जाँच और न्याय तंत्र में समावेशिता — मुख्यधारा की कवरेज में अक्सर पीछे छूट जाता है। संगठन 10 वर्षों से सक्रिय है, फिर भी नीतिगत स्तर पर कोई ठोस प्रतिक्रिया न आना यह दर्शाता है कि पुरुष अधिकारों का विमर्श अभी राजनीतिक प्राथमिकता से दूर है।
RashtraPress
20 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम कौन है और यह क्या करता है?
पत्नी पीड़ित पुरुष आश्रम महाराष्ट्र के वालुज, छत्रपति संभाजीनगर में स्थित एक संगठन है जो पिछले 10 वर्षों से पुरुषों के अधिकारों के लिए काम कर रहा है। यह उन पुरुषों को मंच देता है जो कथित तौर पर महिला सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग से प्रभावित हुए हैं।
विजयादशमी पर शूर्पणखा दहन क्यों किया गया?
संगठन के अध्यक्ष भारत फुलारे के अनुसार, जिस तरह रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, उसी तरह शूर्पणखा दहन महिलाओं की बुरी प्रवृत्तियों के विरुद्ध प्रतीकात्मक विरोध है। यह आयोजन पुरुष आयोग की माँग को सरकार तक पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया।
पुरुष आयोग की माँग क्या है?
संगठन माँग करता है कि जैसे महिलाओं के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग मौजूद है, उसी तर्ज़ पर पुरुषों की शिकायतें सुनने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए एक स्वतंत्र पुरुष आयोग का गठन किया जाए। संगठन का कहना है कि कई बार पुरुष भी अन्याय का शिकार होते हैं और उनका पक्ष सुनने की कोई अलग व्यवस्था नहीं है।
यह आंदोलन कब से चल रहा है और आगे क्या होगा?
यह आंदोलन पिछले 10 वर्षों से प्रत्येक विजयादशमी पर शूर्पणखा दहन के रूप में जारी है। भारत फुलारे ने स्पष्ट किया है कि जब तक पुरुष आयोग की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक यह प्रदर्शन हर साल दोहराया जाएगा।
क्या महिला सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग के दावे मान्य हैं?
संगठन का कथित तौर पर आरोप है कि कुछ महिला सुरक्षा कानूनों का दुरुपयोग पुरुषों और उनके परिजनों को परेशान करने में होता है। यह एक विवादास्पद दावा है — इसकी सत्यता न्यायिक और सांख्यिकीय आधार पर अलग-अलग मामलों में अलग हो सकती है; संगठन ने इस संदर्भ में कोई विशिष्ट आँकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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