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विशाखापट्टनम डेटा सेंटर से शहर की पानी आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी: मंत्री नारा लोकेश

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विशाखापट्टनम डेटा सेंटर से शहर की पानी आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी: मंत्री नारा लोकेश

सारांश

आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेश ने विधानसभा में साफ किया कि विशाखापट्टनम के डेटा सेंटर शहर के पेयजल से नहीं, बल्कि पोलावरम के औद्योगिक कोटे से चलेंगे। 6.5 गीगावाट की सीमा तय हो चुकी है, लेकिन सीपीआई, सीपीआई(एम) और नागरिक समूह पर्यावरण व जल संकट का हवाला देकर विरोध में डटे हैं।

मुख्य बातें

मंत्री नारा लोकेश ने 19 अगस्त को विधानसभा में कहा कि विशाखापट्टनम के डेटा सेंटर से नागरिकों की पेयजल आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी।
डेटा सेंटर के लिए पानी पोलावरम परियोजना के औद्योगिक कोटे से लिया जाएगा; इसके लिए अलग पाइपलाइन बिछेगी।
प्रस्तावित इकोसिस्टम के 6.5 गीगावाट पर पहुँचने पर सालाना लगभग 3 टीएमसी पानी की जरूरत होगी।
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा तय 6.5 गीगावाट की सीमा पूरी हो चुकी है; डेटा सेंटर अदाविवारम-मुडासारलोवा , तार्लुवाड़ा और रामबिल्ली में बन रहे हैं।
सीपीआई , सीपीआई(एम) और नागरिक समूह पर्यावरण व जनस्वास्थ्य पर असर का हवाला देकर परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
सरकार अगले 18 महीनों में ग्रेविटी आधारित प्रणाली से शहरी जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेश ने बुधवार, 19 अगस्त को राज्य विधानसभा में स्पष्ट किया कि विशाखापट्टनम में प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजना से शहर के नागरिकों की पेयजल आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस परियोजना को लेकर पानी और पर्यावरण के संदर्भ में भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, जिसे सरकार सिरे से खारिज करती है।

विधानसभा में उठा सवाल

जन सेना की विधायक लोकम नागा माधवी के सवाल के जवाब में नारा लोकेश ने बताया कि गूगल के विशाखापट्टनम में निवेश की घोषणा के बाद से अन्य प्रमुख आईटी कंपनियाँ भी शहर में निवेश की संभावनाएँ तलाश रही हैं। उन्होंने कहा कि डेटा सेंटर आज की डिजिटल और एआई-आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में देश की डेटा संप्रभुता के लिए भी अनिवार्य हैं।

पानी की व्यवस्था कहाँ से होगी

मंत्री ने बताया कि जब प्रस्तावित डेटा सेंटर इकोसिस्टम 6.5 गीगावाट की क्षमता पर पहुँचेगा, तो मौजूदा तकनीक के अनुसार सालाना लगभग 3 टीएमसी पानी की आवश्यकता होगी। हालाँकि उन्होंने आश्वस्त किया कि नई कूलिंग तकनीकों के आने से यह खपत और घटेगी।

नारा लोकेश ने स्पष्ट किया कि डेटा सेंटर के लिए पानी नागरिकों के हिस्से से नहीं लिया जाएगा, बल्कि पोलावरम परियोजना के तहत आवंटित औद्योगिक कोटे का उपयोग होगा। इसके अलावा, डेटा सेंटर के लिए एक अलग पाइपलाइन बिछाई जाएगी। सरकार अगले 18 महीनों में ग्रेविटी आधारित प्रणाली से विशाखापट्टनम की शहरी जल आवश्यकता पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है।

तुलनात्मक तर्क

मंत्री ने तर्क दिया कि 1 गीगावाट का थर्मल पावर प्लांट सालाना एक डेटा सेंटर की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक पानी की खपत करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अन्य औद्योगिक परियोजनाओं पर ऐसे प्रश्न नहीं उठाए जाते, तो केवल डेटा सेंटर को लेकर ही यह विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है।

नारा लोकेश ने बताया कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने डेटा सेंटर के लिए 6.5 गीगावाट की सीमा निर्धारित की है और यह लक्ष्य पूरा कर लिया गया है। विशाखापट्टनम में डेटा सेंटर अदाविवारम-मुडासारलोवा, तार्लुवाड़ा और रामबिल्ली क्षेत्रों में स्थापित किए जा रहे हैं। सरकार उन कंपनियों को प्राथमिकता देगी जो पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रदर्शन करेंगी।

विरोध के स्वर

यह ऐसे समय में आया है जब नागरिक समूह इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे पानी और बिजली जैसे संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और पर्यावरण को नुकसान होगा। आलोचकों ने राज्य में सुपर एल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियों के कारण पहले से मौजूद जल संकट का हवाला देकर परियोजना पर आपत्ति जताई है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और सीपीआई(एम) भी विशाखापट्टनम के निकट डेटा सेंटर परियोजना का विरोध कर रही हैं। उनका आरोप है कि इससे पर्यावरण, पेयजल स्रोतों और जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

आगे की राह

सरकार और विरोधी पक्षों के बीच यह बहस आने वाले दिनों में और गहरी हो सकती है, खासकर जब परियोजना के क्रियान्वयन की गति बढ़ेगी। पर्यावरणीय चिंताओं और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन बनाना आंध्र प्रदेश सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह असली सवाल से ध्यान हटाता है — विशाखापट्टनम पहले से ही जल-संकटग्रस्त क्षेत्र है, और पोलावरम का औद्योगिक कोटा कागज़ पर अलग दिखता है, ज़मीन पर नहीं। सुपर एल नीनो की आशंका के बीच 3 टीएमसी की अतिरिक्त माँग को 'अलग कोटे' के भरोसे छोड़ना जोखिम भरा है। गौरतलब है कि गूगल जैसी कंपनियाँ खुद अपनी वैश्विक परियोजनाओं में जल-तटस्थता की प्रतिबद्धता जताती हैं — आंध्र सरकार को यही मानक अनुबंध में बाध्यकारी बनाना चाहिए, न कि केवल 'पर्यावरणीय जिम्मेदारी दिखाने वाली कंपनियों को प्राथमिकता' जैसे अस्पष्ट वादे करने चाहिए।
RashtraPress
19 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विशाखापट्टनम के डेटा सेंटर के लिए पानी कहाँ से आएगा?
मंत्री नारा लोकेश के अनुसार, डेटा सेंटर के लिए पोलावरम परियोजना के तहत आवंटित औद्योगिक कोटे का पानी उपयोग किया जाएगा। इसके लिए एक अलग पाइपलाइन बिछाई जाएगी ताकि नागरिकों की पेयजल आपूर्ति प्रभावित न हो।
विशाखापट्टनम में कितने गीगावाट के डेटा सेंटर बनेंगे?
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने डेटा सेंटर के लिए 6.5 गीगावाट की सीमा तय की है और यह लक्ष्य पूरा कर लिया गया है। डेटा सेंटर अदाविवारम-मुडासारलोवा, तार्लुवाड़ा और रामबिल्ली क्षेत्रों में स्थापित किए जा रहे हैं।
डेटा सेंटर से विशाखापट्टनम में कितना पानी लगेगा?
मंत्री नारा लोकेश ने बताया कि 6.5 गीगावाट की पूरी क्षमता पर मौजूदा तकनीक के अनुसार सालाना लगभग 3 टीएमसी पानी की आवश्यकता होगी। हालाँकि उन्होंने कहा कि नई कूलिंग तकनीकों के आने से यह खपत और कम होगी।
डेटा सेंटर परियोजना का विरोध क्यों हो रहा है?
नागरिक समूह, सीपीआई और सीपीआई(एम) का आरोप है कि परियोजना से पेयजल स्रोतों, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। विरोधियों ने सुपर एल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियों के कारण राज्य में पहले से मौजूद जल संकट का हवाला भी दिया है।
क्या विशाखापट्टनम में गूगल के अलावा अन्य कंपनियाँ भी आ रही हैं?
नारा लोकेश ने विधानसभा में बताया कि गूगल की निवेश घोषणा के बाद अन्य आईटी कंपनियाँ भी विशाखापट्टनम में दिलचस्पी दिखाने लगी हैं। सरकार उन कंपनियों को प्राथमिकता देगी जो पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रदर्शन करेंगी।
राष्ट्र प्रेस
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