11 अक्टूबर 2026
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तंजावुर में सांबा धान की फसल बर्बाद: 1,000 एकड़ खेत उजड़े, किसानों ने मुआवजे की मांग उठाई

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तंजावुर में सांबा धान की फसल बर्बाद: 1,000 एकड़ खेत उजड़े, किसानों ने मुआवजे की मांग उठाई

सारांश

तंजावुर का 'चावल का कटोरा' इस बार खाली रहा — मेट्टूर बांध से 81 दिन देरी से पानी छोड़ा गया, भूजल खारा निकला, और 1,000 एकड़ से अधिक सांबा धान ट्रैक्टर से जोतनी पड़ी। किसान खेतों में डटे हैं और कलेक्टर कार्यालय घेराव की चेतावनी दे चुके हैं।

मुख्य बातें

तंजावुर जिले के मेलट्टूर , रंगनाथपुरम , विलिथियूर और अन्नाप्पनपेट्टई क्षेत्रों में 1,000+ एकड़ सांबा धान की फसल पानी की कमी से नष्ट।
मेट्टूर जलाशय से 81 दिनों के अंतराल पर पानी छोड़ा गया, जिससे कावेरी डेल्टा में सिंचाई बाधित रही।
पंप सेट से निकाला गया भूजल खारा होने के कारण सिंचाई के अयोग्य पाया गया।
किसानों ने बर्बाद फसल को ट्रैक्टर से जोतना शुरू किया; बुवाई लागत के साथ जुताई का अतिरिक्त खर्च भी झेल रहे हैं।
किसान संगठन ने चेतावनी दी — माँगें न मानी गईं तो जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया जाएगा।
न कृषि मंत्री, न कोई अधिकारी अब तक प्रभावित खेतों का दौरा करने पहुँचा।

तमिलनाडु के तंजावुर जिले में मेलट्टूर और आसपास के इलाकों में सिंचाई के पानी की भारी किल्लत के चलते सांबा धान की खड़ी फसलें पूरी तरह सूख गई हैं। 11 अक्टूबर 2026 को किसान अपने खेतों में एकत्र हुए और बर्बाद फसलों को ट्रैक्टर से जोतकर वापस मिट्टी में मिलाने का दर्दनाक काम शुरू किया। किसानों ने अधिकारियों से तत्काल नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की माँग की है।

कितनी जमीन पर पड़ा असर

रंगनाथपुरम, मेलट्टूर, विलिथियूर, अन्नाप्पनपेट्टई और आसपास के गाँवों में लगभग 1,000 एकड़ से अधिक खेतों में सांबा धान की बुवाई की गई थी। किसानों के अनुसार इन सभी इलाकों में हजारों एकड़ फसल पानी की कमी से नष्ट हो गई। फसल पूरी तरह सूख जाने के बाद किसानों को खेतों की दोबारा जुताई पर अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ रहा है, जिससे उनका आर्थिक बोझ और बढ़ गया है।

मुख्य कारण: मेट्टूर बांध और भूजल की विफलता

प्रदर्शनकारी किसानों के अनुसार, मेट्टूर जलाशय में पर्याप्त जलभंडारण न होने के कारण सिंचाई के लिए नहर में पानी की आपूर्ति बाधित रही। उनका कहना है कि बांध से 81 दिनों के अंतराल के बाद ही पानी छोड़ा गया, जबकि कावेरी डेल्टा के कई हिस्सों में खड़ी फसल पानी को तरस रही थी। भूजल का विकल्प भी किसानों के काम नहीं आया — पंप सेट से निकाला गया पानी खारा था और फसलों की सिंचाई के लिए अनुपयुक्त था।

किसानों का विरोध और चेतावनी

प्रभावित किसानों ने अपने खेतों में एकजुट होकर विरोध-प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि न तो कृषि मंत्री और न ही कोई वरिष्ठ अधिकारी नुकसान का जायजा लेने के लिए उनके खेतों में पहुँचे। किसानों ने माँग की कि संबंधित विभाग टीमें भेजकर फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण करें और प्रभावित किसानों को समय पर आर्थिक सहायता सुनिश्चित करें। किसान संगठन ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी माँगें नहीं मानी गईं, तो वे जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव करेंगे।

किसानों पर आर्थिक मार

फसल के पूरी तरह नष्ट हो जाने से किसानों को बुवाई से लेकर खेती की देखभाल तक की पूरी लागत डूब गई है। अब उन्हें बर्बाद फसल को जोतकर खेत साफ करने का अतिरिक्त खर्च भी वहन करना पड़ रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब कावेरी डेल्टा क्षेत्र पहले से ही पानी के असमान वितरण और सिंचाई ढाँचे की खामियों से जूझता रहा है। गौरतलब है कि तंजावुर को 'तमिलनाडु का चावल का कटोरा' कहा जाता है और इस क्षेत्र की खेती का सीधा असर राज्य के खाद्य उत्पादन पर पड़ता है।

आगे क्या होगा

किसानों ने अधिकारियों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे सरकारी उदासीनता बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि प्रशासन शीघ्र कदम नहीं उठाता, तो जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने बड़ा आंदोलन तय माना जा रहा है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार फसल बीमा और मुआवजे की प्रक्रिया को कितनी तेज़ी से आगे बढ़ाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फसल सूखती है, किसान सड़क पर उतरते हैं और मुआवजे की माँग धीरे-धीरे फाइलों में दब जाती है। असल सवाल यह नहीं कि इस बार कितनी एकड़ बर्बाद हुई, बल्कि यह है कि कावेरी डेल्टा के लिए दीर्घकालिक जल प्रबंधन नीति कब बनेगी। 81 दिनों की देरी से पानी छोड़ना और भूजल का खारा होना — दोनों संरचनात्मक विफलताएँ हैं जिन्हें मुआवजे से नहीं, नीतिगत सुधार से ही ठीक किया जा सकता है। जब तक फसल बीमा का त्वरित भुगतान और सिंचाई ढाँचे का आधुनिकीकरण नहीं होता, तब तक 'तमिलनाडु का चावल का कटोरा' हर मौसम में खतरे में रहेगा।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तंजावुर में सांबा धान की फसल क्यों बर्बाद हुई?
मेट्टूर जलाशय से 81 दिनों के अंतराल के बाद पानी छोड़े जाने के कारण कावेरी डेल्टा क्षेत्र में नहर से सिंचाई बाधित रही। भूजल का विकल्प भी काम नहीं आया क्योंकि पंप सेट से निकला पानी खारा था और फसलों के लिए अनुपयुक्त था।
कितनी एकड़ फसल प्रभावित हुई है?
मेलट्टूर, रंगनाथपुरम, विलिथियूर और अन्नाप्पनपेट्टई क्षेत्रों में कम से कम 1,000 एकड़ सांबा धान की खेती होती है और किसानों के अनुसार इन गाँवों में हजारों एकड़ फसल बर्बाद हो गई है। अधिकारिक आकलन अभी नहीं हुआ है।
किसानों की क्या माँगें हैं?
किसान माँग कर रहे हैं कि सरकारी टीमें तत्काल खेतों का दौरा कर फसल क्षति का सर्वेक्षण करें और प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि माँगें न मानने पर जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव करेंगे।
क्या सरकार या अधिकारियों ने अब तक कोई कदम उठाया है?
किसानों के अनुसार न कृषि मंत्री और न ही कोई वरिष्ठ अधिकारी प्रभावित खेतों का दौरा करने पहुँचा है। फसल नुकसान का कोई आधिकारिक आकलन अभी तक नहीं किया गया है।
तंजावुर को 'तमिलनाडु का चावल का कटोरा' क्यों कहते हैं और इस संकट का क्या असर होगा?
तंजावुर जिला कावेरी डेल्टा क्षेत्र में स्थित है और राज्य के धान उत्पादन में प्रमुख योगदानकर्ता है, इसीलिए इसे 'तमिलनाडु का चावल का कटोरा' कहा जाता है। बड़े पैमाने पर सांबा धान की बर्बादी से न केवल किसानों की आजीविका बल्कि क्षेत्र के खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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