तंजावुर में सांबा धान की फसल बर्बाद: 1,000 एकड़ खेत उजड़े, किसानों ने मुआवजे की मांग उठाई
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के तंजावुर जिले में मेलट्टूर और आसपास के इलाकों में सिंचाई के पानी की भारी किल्लत के चलते सांबा धान की खड़ी फसलें पूरी तरह सूख गई हैं। 11 अक्टूबर 2026 को किसान अपने खेतों में एकत्र हुए और बर्बाद फसलों को ट्रैक्टर से जोतकर वापस मिट्टी में मिलाने का दर्दनाक काम शुरू किया। किसानों ने अधिकारियों से तत्काल नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की माँग की है।
कितनी जमीन पर पड़ा असर
रंगनाथपुरम, मेलट्टूर, विलिथियूर, अन्नाप्पनपेट्टई और आसपास के गाँवों में लगभग 1,000 एकड़ से अधिक खेतों में सांबा धान की बुवाई की गई थी। किसानों के अनुसार इन सभी इलाकों में हजारों एकड़ फसल पानी की कमी से नष्ट हो गई। फसल पूरी तरह सूख जाने के बाद किसानों को खेतों की दोबारा जुताई पर अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ रहा है, जिससे उनका आर्थिक बोझ और बढ़ गया है।
मुख्य कारण: मेट्टूर बांध और भूजल की विफलता
प्रदर्शनकारी किसानों के अनुसार, मेट्टूर जलाशय में पर्याप्त जलभंडारण न होने के कारण सिंचाई के लिए नहर में पानी की आपूर्ति बाधित रही। उनका कहना है कि बांध से 81 दिनों के अंतराल के बाद ही पानी छोड़ा गया, जबकि कावेरी डेल्टा के कई हिस्सों में खड़ी फसल पानी को तरस रही थी। भूजल का विकल्प भी किसानों के काम नहीं आया — पंप सेट से निकाला गया पानी खारा था और फसलों की सिंचाई के लिए अनुपयुक्त था।
किसानों का विरोध और चेतावनी
प्रभावित किसानों ने अपने खेतों में एकजुट होकर विरोध-प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि न तो कृषि मंत्री और न ही कोई वरिष्ठ अधिकारी नुकसान का जायजा लेने के लिए उनके खेतों में पहुँचे। किसानों ने माँग की कि संबंधित विभाग टीमें भेजकर फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण करें और प्रभावित किसानों को समय पर आर्थिक सहायता सुनिश्चित करें। किसान संगठन ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी माँगें नहीं मानी गईं, तो वे जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव करेंगे।
किसानों पर आर्थिक मार
फसल के पूरी तरह नष्ट हो जाने से किसानों को बुवाई से लेकर खेती की देखभाल तक की पूरी लागत डूब गई है। अब उन्हें बर्बाद फसल को जोतकर खेत साफ करने का अतिरिक्त खर्च भी वहन करना पड़ रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब कावेरी डेल्टा क्षेत्र पहले से ही पानी के असमान वितरण और सिंचाई ढाँचे की खामियों से जूझता रहा है। गौरतलब है कि तंजावुर को 'तमिलनाडु का चावल का कटोरा' कहा जाता है और इस क्षेत्र की खेती का सीधा असर राज्य के खाद्य उत्पादन पर पड़ता है।
आगे क्या होगा
किसानों ने अधिकारियों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे सरकारी उदासीनता बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि प्रशासन शीघ्र कदम नहीं उठाता, तो जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने बड़ा आंदोलन तय माना जा रहा है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार फसल बीमा और मुआवजे की प्रक्रिया को कितनी तेज़ी से आगे बढ़ाती है।