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नागपट्टिनम किसानों की मांग: मेट्टूर बांध जल निकासी 10 दिन टले, 45 दिन की आपूर्ति सांबा खेती को नाकाफी

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नागपट्टिनम किसानों की मांग: मेट्टूर बांध जल निकासी 10 दिन टले, 45 दिन की आपूर्ति सांबा खेती को नाकाफी

सारांश

नागपट्टिनम के किसान मेट्टूर बांध की 1 सितंबर की जल निकासी को 10 दिन टालने की माँग कर रहे हैं। 45 दिन की सीमित आपूर्ति और पानी पहुँचने में 10 दिन की देरी के चलते सांबा धान की खेती खतरे में है। पूर्वोत्तर मानसून विफल रहा तो संकट और गहरा सकता है।

मुख्य बातें

नागपट्टिनम के किसानों ने मेट्टूर बांध से 1 सितंबर की प्रस्तावित जल निकासी को कम से कम 10 दिन स्थगित करने की माँग की है।
योजनाबद्ध 45 दिनों की आपूर्ति सांबा धान के लिए अपर्याप्त; फसल को कम से कम 120 दिनों की सिंचाई चाहिए।
मेट्टूर का पानी नागपट्टिनम की नहरों तक पहुँचने में 10 दिन लगते हैं — जिले की प्रभावी सिंचाई अवधि और भी घट जाती है।
जिले का भूजल खारा होने से किसान पूरी तरह कावेरी नदी के पानी पर निर्भर हैं।
ऐतिहासिक रूप से मेट्टूर 2002 में 6 सितंबर, 2012 में 17 सितंबर और 2016 में 20 सितंबर को खोला गया था।
अनिश्चितता के बीच कई किसान 135 दिन के फसल चक्र वाली मध्यम अवधि या कम अवधि की धान किस्मों की ओर रुख कर रहे हैं।

नागपट्टिनम के किसानों ने तमिलनाडु सरकार से आग्रह किया है कि मेट्टूर बांध से 1 सितंबर को प्रस्तावित जल निकासी को कम से कम 10 दिनों के लिए स्थगित किया जाए। किसानों की चेतावनी है कि योजनाबद्ध 45 दिनों की जल आपूर्ति सांबा धान की खेती के लिए अपर्याप्त है और पूर्वोत्तर मानसून के आगमन से पहले खड़ी फसलें कम से कम 15 दिनों तक बिना सिंचाई के रह सकती हैं।

नागपट्टिनम की विशेष भौगोलिक चुनौती

कावेरी डेल्टा के अन्य जिलों की तुलना में नागपट्टिनम की स्थिति अधिक कठिन है। मेट्टूर बांध से छोड़ा गया पानी इस जिले की सिंचाई नहरों तक पहुँचने में लगभग 10 दिन लेता है, क्योंकि यह कावेरी डेल्टा प्रणाली का अंतिम छोर है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पहले से ही सीमित 45 दिनों की आपूर्ति में से प्रभावी सिंचाई का समय और भी घट जाता है।

इसके अलावा, जिले के बड़े हिस्से में भूजल खारा है और निरंतर सिंचाई के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त है। ऐसे में किसान कावेरी नदी के पानी पर ही लगभग पूर्णतः निर्भर हैं।

किसान नेताओं और विशेषज्ञों की राय

थलैनायर के किसान पी. सेंथिल कुमार ने कहा कि यदि मेट्टूर से जल आपूर्ति बंद होने के बाद पूर्वोत्तर मानसून में देरी हुई या वह विफल रहा, तो किसानों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

तमिलनाडु किसान संरक्षण संघ के एस.आर. तमिलसेल्वन ने कहा कि सांबा की खेती का दायरा काफी हद तक पूर्वोत्तर मानसून के आगमन पर निर्भर करेगा, क्योंकि कावेरी का पानी केवल 45 दिनों के लिए सुनिश्चित किया गया है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने स्पष्ट किया कि धान की खेती के लिए 45 दिनों का जल प्रवाह अपर्याप्त है — सांबा फसलों के लिए कम से कम 120 दिनों की सुनिश्चित सिंचाई आवश्यक है।

ऐतिहासिक संदर्भ और किसानों की माँग

तमिलनाडु किसान संघ के राज्य महासचिव सामी नटराजन ने पिछले जल संकट वर्षों का हवाला देते हुए बताया कि मेट्टूर बांध को 2002 में 6 सितंबर, 2012 में 17 सितंबर और 2016 में 20 सितंबर को खोला गया था। उन्होंने सरकार से इस वर्ष भी सितंबर के दूसरे सप्ताह में पानी छोड़ने का आग्रह किया ताकि सांबा की खेती के सबसे महत्वपूर्ण चरण में सीमित आपूर्ति उपलब्ध रहे।

नटराजन ने यह भी कहा कि सरकार को बांध खोलने का निर्णय लेने से पहले किसानों के साथ परामर्श बैठकें आयोजित करनी चाहिए थीं, खासकर जब मेट्टूर बांध का भंडारण स्तर कम था और जल प्रवाह अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था।

किसानों की फसल रणनीति में बदलाव

पानी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच कई किसान लगभग 135 दिनों के फसल चक्र वाली मध्यम अवधि की धान की किस्मों की ओर रुख कर रहे हैं। कुछ किसान फसल नुकसान के जोखिम को कम करने और जनवरी के बाद सिंचाई की स्थिति गंभीर होने से पहले खेती पूरी करने के लिए कम अवधि वाली किस्मों पर भी विचार कर रहे हैं।

पड़ोसी जिले तिरुवरूर में भी इसी तरह की चिंताएँ जताई गई हैं, जो दर्शाता है कि यह संकट पूरे कावेरी डेल्टा क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। आने वाले दिनों में सरकार का रुख और पूर्वोत्तर मानसून की प्रगति यह तय करेगी कि इस सीजन की सांबा फसल का भविष्य क्या होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस बार कम भंडारण स्तर और 45 दिनों की सीमित आपूर्ति के संयोजन ने चिंता को और गहरा कर दिया है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार ने बांध खोलने की तारीख तय करते समय डेल्टा के अंतिम छोर के जिलों — विशेषकर नागपट्टिनम — की भौगोलिक वास्तविकता को पर्याप्त भार दिया। किसान संगठनों की माँग तकनीकी रूप से तर्कसंगत है: यदि पानी पहुँचने में 10 दिन लगते हैं और फसल को 120 दिन चाहिए, तो 45 दिन की आपूर्ति गणितीय रूप से ही नाकाफी है। पूर्वोत्तर मानसून की अनिश्चितता इस समीकरण को और जटिल बनाती है — और इसीलिए किसानों के साथ पूर्व परामर्श की अनुपस्थिति एक प्रशासनिक चूक की तरह दिखती है।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नागपट्टिनम के किसान मेट्टूर बांध जल निकासी में देरी क्यों चाहते हैं?
किसानों का कहना है कि 1 सितंबर को पानी छोड़ने पर वह नागपट्टिनम की नहरों तक 10 दिन बाद पहुँचेगा, जिससे पहले से सीमित 45 दिनों की आपूर्ति और घट जाएगी। सांबा धान की खेती के लिए कम से कम 120 दिनों की सिंचाई जरूरी है, इसलिए किसान कम से कम 10 दिन की देरी माँग रहे हैं।
मेट्टूर से पानी छोड़े जाने पर नागपट्टिनम को अन्य जिलों की तुलना में अधिक समस्या क्यों होती है?
नागपट्टिनम कावेरी डेल्टा प्रणाली का अंतिम छोर है, इसलिए मेट्टूर से छोड़ा गया पानी यहाँ की सिंचाई नहरों तक पहुँचने में लगभग 10 दिन लगते हैं। इसके अलावा जिले का अधिकांश भूजल खारा है, जिससे किसान पूरी तरह कावेरी के पानी पर निर्भर हैं।
सांबा धान की खेती के लिए कितने दिनों की सिंचाई जरूरी है?
सांबा धान की खेती के लिए कम से कम 120 दिनों की सुनिश्चित सिंचाई आवश्यक है। तमिलनाडु सरकार ने अभी केवल 45 दिनों की जल आपूर्ति सुनिश्चित की है, जो किसान संगठनों के अनुसार पर्याप्त नहीं है।
पिछले जल संकट वर्षों में मेट्टूर बांध कब खोला गया था?
ऐतिहासिक रूप से कम भंडारण वाले वर्षों में मेट्टूर बांध 2002 में 6 सितंबर, 2012 में 17 सितंबर और 2016 में 20 सितंबर को खोला गया था। किसान संगठन इस वर्ष भी सितंबर के दूसरे सप्ताह में पानी छोड़ने की माँग कर रहे हैं।
पानी की अनिश्चितता के बीच किसान क्या विकल्प अपना रहे हैं?
कई किसान लगभग 135 दिनों के फसल चक्र वाली मध्यम अवधि की धान किस्मों की ओर रुख कर रहे हैं। कुछ किसान जनवरी से पहले खेती पूरी करने के लिए कम अवधि वाली किस्मों पर भी विचार कर रहे हैं ताकि फसल नुकसान का जोखिम कम हो सके।
राष्ट्र प्रेस
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