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एयरग्लो क्या है: पृथ्वी की रहस्यमयी चमक का विज्ञान और ऑरोरा से फर्क

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एयरग्लो क्या है: पृथ्वी की रहस्यमयी चमक का विज्ञान और ऑरोरा से फर्क

सारांश

पृथ्वी हमेशा एक मंद लेकिन वास्तविक चमक से घिरी रहती है — यह एयरग्लो है, ऑरोरा नहीं। 13 अप्रैल 2026 को नासा यात्री क्रिस विलियम्स की तस्वीर ने इस घटना को फिर सुर्खियों में ला दिया। सौर विकिरण से उत्तेजित अणुओं का यह प्रकाश-उत्सर्जन वैज्ञानिकों के लिए वायुमंडल की 'खिड़की' है।

मुख्य बातें

एयरग्लो पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में सौर विकिरण से उत्तेजित अणुओं द्वारा उत्सर्जित निरंतर प्रकाश है।
13 अप्रैल 2026 को नासा यात्री क्रिस विलियम्स ने स्पेसएक्स ड्रैगन से एयरग्लो और मिल्की वे की दुर्लभ तस्वीर खींची।
एयरग्लो लाल, हरे, बैंगनी और पीले रंगों में हो सकता है और दिन-रात निरंतर होता रहता है।
ऑरोरा सौर वायु के उच्च-ऊर्जा कणों से बनता है और ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित है; एयरग्लो सामान्य सौर विकिरण से पूरी पृथ्वी पर होता है।
वैज्ञानिक एयरग्लो से ऊपरी वायुमंडल का तापमान, घनत्व, संरचना और हवाओं की गति मापते हैं।

पृथ्वी का वायुमंडल एक अदृश्य लेकिन निरंतर चमक से आवृत रहता है, जिसे वैज्ञानिक एयरग्लो कहते हैं। 13 अप्रैल 2026 को नासा के अंतरिक्ष यात्री क्रिस विलियम्स ने स्पेसएक्स ड्रैगन यान से एक दुर्लभ तस्वीर खींची, जिसमें पृथ्वी नारंगी आभा में लिपटी दिख रही थी और उसके ऊपर मिल्की वे गैलेक्सी भी स्पष्ट नज़र आ रही थी। यह तस्वीर नासा ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पर साझा की, जिसने एयरग्लो की अवधारणा को एक बार फिर वैश्विक चर्चा में ला दिया।

एयरग्लो क्या होता है

एयरग्लो तब उत्पन्न होता है जब सूर्य से आने वाली विकिरण (रेडिएशन) पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में मौजूद अणुओं और परमाणुओं को उत्तेजित करती है। इन कणों में अतिरिक्त ऊर्जा भर जाती है और जैसे ही वे अपनी सामान्य अवस्था में लौटते हैं, वे उस ऊर्जा को प्रकाश के रूप में मुक्त कर देते हैं। यही प्रकाश-उत्सर्जन एयरग्लो कहलाता है।

कभी-कभी सूर्य की रोशनी से आयनित हुए अणु मुक्त इलेक्ट्रॉनों से टकराकर भी प्रकाश छोड़ते हैं। दोनों ही स्थितियों में फोटॉन यानी प्रकाश-कण उत्सर्जित होते हैं, जो अंतरिक्ष से देखने पर अत्यंत सुंदर दिखते हैं।

एयरग्लो के रंग और विशेषताएँ

यह चमक लाल, हरे, बैंगनी और पीले रंगों में हो सकती है — यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-से अणु उत्तेजित हो रहे हैं और किस ऊँचाई पर। यह घटना दिन और रात, दोनों समय निरंतर होती रहती है, लेकिन इतनी मंद होती है कि नंगी आँखों से सामान्यतः दिखाई नहीं देती। इसे देखने के लिए या तो अंतरिक्ष से अवलोकन करना होता है, या पृथ्वी पर किसी अत्यंत अंधेरे स्थान पर उच्च-संवेदनशीलता वाले कैमरे की आवश्यकता पड़ती है।

वैज्ञानिकों के लिए एयरग्लो का महत्व

एयरग्लो केवल एक दृश्य-सौंदर्य नहीं है — यह वैज्ञानिक शोध का एक महत्वपूर्ण उपकरण भी है। इसके अध्ययन से ऊपरी वायुमंडल का तापमान, घनत्व, रासायनिक संरचना और हवाओं की गति का पता चलता है। यह दर्शाता है कि ऊँचाई पर स्थित हवाएँ आयनमंडल में किस प्रकार प्रवाहित होती हैं और विभिन्न गैसों को पृथ्वी के चारों ओर कैसे वितरित करती हैं। गौरतलब है कि आयनमंडल का अध्ययन रेडियो संचार और उपग्रह तकनीक के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।

एयरग्लो और ऑरोरा में क्या अंतर है

एयरग्लो को अक्सर ऑरोरा (उत्तरी या दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश) से भ्रमित किया जाता है, लेकिन दोनों की उत्पत्ति मौलिक रूप से भिन्न है। ऑरोरा तब बनता है जब सूर्य की उच्च-ऊर्जा सौर वायु (सोलर विंड) के कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराकर वायुमंडल में प्रवेश करते हैं और उत्तेजना पैदा करते हैं। यह घटना मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित रहती है।

इसके विपरीत, एयरग्लो सामान्य सौर विकिरण के कारण उत्पन्न होता है और पृथ्वी के सम्पूर्ण वायुमंडल में — ध्रुव से भूमध्य रेखा तक — एक समान रूप से होता रहता है। संक्षेप में, ऑरोरा एक असाधारण और स्थान-विशिष्ट घटना है, जबकि एयरग्लो पृथ्वी की एक स्थायी और सार्वभौमिक विशेषता है।

आगे की संभावनाएँ

वैज्ञानिक समुदाय एयरग्लो के डेटा का उपयोग जलवायु परिवर्तन के ऊपरी वायुमंडल पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए भी कर रहा है। भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और आगामी अंतरिक्ष मिशनों से मिलने वाली उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें इस शोध को और गहरा करेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि इसका वैज्ञानिक महत्व कहीं अधिक गहरा है — यह ऊपरी वायुमंडल की संरचना और जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने का एक प्रमुख माध्यम है। भारत में अंतरिक्ष विज्ञान की लोकप्रिय समझ अभी भी इसरो की उपलब्धियों तक केंद्रित है, जबकि वायुमंडलीय भौतिकी जैसे क्षेत्र सार्वजनिक चर्चा में हाशिये पर हैं। एयरग्लो-आधारित अवलोकन भविष्य के भारतीय अंतरिक्ष मिशनों के लिए भी प्रासंगिक डेटा प्रदान कर सकते हैं।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एयरग्लो क्या होता है?
एयरग्लो पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में सूर्य की विकिरण से उत्तेजित अणुओं और परमाणुओं द्वारा उत्सर्जित एक निरंतर, मंद प्रकाश है। यह घटना दिन-रात होती रहती है और पृथ्वी के पूरे वायुमंडल में फैली रहती है।
एयरग्लो और ऑरोरा में क्या फर्क है?
ऑरोरा सूर्य की उच्च-ऊर्जा सौर वायु के कणों से बनता है और मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखता है, जबकि एयरग्लो सामान्य सौर विकिरण से पूरी पृथ्वी पर होता है। ऑरोरा एक असाधारण घटना है, एयरग्लो एक स्थायी प्रक्रिया।
क्रिस विलियम्स ने एयरग्लो की तस्वीर कब और कैसे ली?
नासा के अंतरिक्ष यात्री क्रिस विलियम्स ने 13 अप्रैल 2026 को स्पेसएक्स ड्रैगन यान से यह तस्वीर खींची, जिसमें पृथ्वी की नारंगी एयरग्लो परत और उसके ऊपर मिल्की वे गैलेक्सी दोनों स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
एयरग्लो वैज्ञानिकों के लिए क्यों उपयोगी है?
एयरग्लो के अध्ययन से ऊपरी वायुमंडल का तापमान, घनत्व, रासायनिक संरचना और हवाओं की गति मापी जा सकती है। यह आयनमंडल में गैसों के प्रवाह को समझने में भी मदद करता है, जो रेडियो संचार और उपग्रह तकनीक के लिए महत्वपूर्ण है।
क्या एयरग्लो पृथ्वी से नंगी आँखों से देखा जा सकता है?
सामान्यतः नहीं — एयरग्लो इतना मंद होता है कि इसे देखने के लिए या तो अंतरिक्ष से अवलोकन करना पड़ता है या पृथ्वी पर किसी अत्यंत अंधेरे स्थान पर उच्च-संवेदनशीलता वाले कैमरे की आवश्यकता होती है।
राष्ट्र प्रेस
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