विश्व अल्जाइमर दिवस: ब्लड टेस्ट से दशकों पहले मिल सकती है बीमारी की पहचान — द लैंसेट स्टडी
सारांश
मुख्य बातें
द लैंसेट में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, अल्जाइमर रोग से जुड़े जैविक बदलावों की पहचान मिडिल एज में ही एक साधारण ब्लड टेस्ट के ज़रिए की जा सकती है — यानी लक्षण सामने आने से कई दशक पहले। विश्व अल्जाइमर दिवस, 21 सितंबर 2026 के अवसर पर सामने आया यह शोध इस गंभीर न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारी की शुरुआती पहचान की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
शोध में क्या पाया गया
शोधकर्ताओं ने मिडिल एज के उन लोगों के रक्त में विशेष बायोमार्कर्स की जाँच की, जिनमें अल्जाइमर के स्पष्ट लक्षण अभी नहीं थे। इन बायोमार्कर्स में मुख्य रूप से फॉस्फोराइलेटेड टाऊ और अमाइलॉइड-बीटा प्रोटीन शामिल थे — दोनों ऐसे संकेतक हैं जो अल्जाइमर से जुड़ी मस्तिष्क प्रक्रियाओं की ओर इशारा करते हैं।
शोध में पाया गया कि कुछ प्रतिभागियों में अल्जाइमर से जुड़ी न्यूरोपैथोलॉजी के संकेत पहले से उपस्थित थे, हालाँकि ऐसे मामले सामान्य नहीं थे। गौरतलब है कि यह रोग केवल बुढ़ापे में अचानक प्रकट होने वाली स्थिति नहीं है — इसके जैविक बदलाव लक्षणों से कई वर्ष, यहाँ तक कि दशकों, पहले शुरू हो सकते हैं।
याददाश्त पर असर और बायोमार्कर का संबंध
जिन प्रतिभागियों के रक्त में ये बायोमार्कर्स अल्जाइमर से जुड़े पाए गए, उनमें सोचने-समझने और याददाश्त से संबंधित परीक्षणों में अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रदर्शन देखने को मिला। यह संबंध उम्र, बॉडी मास इंडेक्स (BMI), किडनी की कार्यक्षमता और एपीओई जीन जैसे कई कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर अल्जाइमर और डिमेंशिया के मामलों में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की जा रही है, और प्रारंभिक निदान की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
लिंग, जीन और नस्लीय समूहों में अंतर
शोध के अनुसार, इन संबंधों में लिंग, एपीओई 4 जीन और नस्लीय समूहों के आधार पर भी भिन्नता देखी गई। कुछ विश्लेषणों में ब्लैक प्रतिभागियों, एपीओई 4 जीन वाले लोगों और महिलाओं में यह संबंध अधिक स्पष्ट दिखाई दिया, हालाँकि यह प्रत्येक तुलना में एकसमान नहीं था। शोधकर्ताओं ने इस भिन्नता को भविष्य के अध्ययनों के लिए महत्त्वपूर्ण बताया है।
सीमाएँ और आगे की ज़रूरत
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ यह नहीं कि अभी से किसी के लिए भी सामान्य ब्लड टेस्ट द्वारा अल्जाइमर की निश्चित भविष्यवाणी की जा सकती है। इस तकनीक की सटीकता, नैदानिक उपयोग (क्लिनिकल एप्लिकेशन) और व्यापक स्क्रीनिंग में उपयोगिता को लेकर अभी और अध्ययन अपेक्षित हैं।
फिर भी, यह शोध इस बात को वैज्ञानिक आधार देता है कि कम खर्चीले और सुलभ ब्लड टेस्ट भविष्य में डॉक्टरों को जोखिम वाले लोगों की जल्द पहचान करने में सहायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ऐसा संभव हो सका, तो यह रोकथाम और उपचार दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
आगे क्या
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में बड़े और विविध जनसंख्या समूहों पर दीर्घकालिक अध्ययन की ज़रूरत है ताकि इन बायोमार्कर्स की भूमिका को और स्पष्ट किया जा सके। यदि ये परिणाम अगले चरण के परीक्षणों में भी स्थापित होते हैं, तो अल्जाइमर की शुरुआती जाँच की दिशा में चिकित्सा विज्ञान एक नए युग में प्रवेश कर सकता है।