21 सितंबर 2026
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लारा दत्ता ने मां के 10 साल के अल्जाइमर संघर्ष का खुलासा किया, बोलीं — 'बुढ़ापे की सामान्य प्रक्रिया मत समझिए'

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लारा दत्ता ने मां के 10 साल के अल्जाइमर संघर्ष का खुलासा किया, बोलीं — 'बुढ़ापे की सामान्य प्रक्रिया मत समझिए'

सारांश

लारा दत्ता ने वर्ल्ड अल्जाइमर डे पर वह बात कही जो कई भारतीय परिवार महसूस करते हैं पर कहते नहीं — उनकी 80 वर्षीया माँ 10 साल से अल्जाइमर और डिमेंशिया से जूझ रही हैं। उनका संदेश सीधा है: इंतज़ार मत करो, बात करो, और समय रहते मदद लो।

मुख्य बातें

लारा दत्ता भूपति ने 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में वर्ल्ड अल्जाइमर डे जागरूकता कार्यक्रम में भाग लिया।
उनकी माँ की उम्र 80 वर्ष है और वे लगभग 10 वर्षों से अल्जाइमर और डिमेंशिया के साथ जीवन जी रही हैं।
अभिनेत्री ने चेताया — भूलने की समस्या को सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर 5 साल तक इंतज़ार न करें ।
WHO के अनुसार, 2021 में दुनिया भर में 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया से पीड़ित थे; हर साल लगभग 1 करोड़ नए मामले आते हैं।
2026 वर्ल्ड अल्जाइमर मंथ की थीम: 'द अर्लियर यू नो, द मोर यू कैन डू' — समय पर निदान पर ज़ोर।

अभिनेत्री लारा दत्ता भूपति ने 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में वर्ल्ड अल्जाइमर डे के उपलक्ष्य में आयोजित एक अल्जाइमर जागरूकता प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेते हुए अपनी माँ के 10 वर्षों के अल्जाइमर और डिमेंशिया संघर्ष को सार्वजनिक रूप से साझा किया। उन्होंने आम जनता से अपील की कि इस बीमारी को केवल भूलने की आम समस्या मानकर नज़रअंदाज़ न करें, बल्कि जल्द-से-जल्द विशेषज्ञ से सलाह लें।

माँ की बीमारी का व्यक्तिगत अनुभव

लारा दत्ता ने मीडिया से बात करते हुए कहा, 'आज वर्ल्ड अल्जाइमर डे है और सबसे ज़रूरी संदेश जो मैं देना चाहती हूँ, वह यह है कि हम अक्सर सोचते हैं कि अल्जाइमर सिर्फ़ भूलने की बीमारी है।' उन्होंने बताया कि उनकी माँ की उम्र 80 वर्ष है और वे लगभग 10 साल से अल्जाइमर और डिमेंशिया के साथ जीवन जी रही हैं।

अभिनेत्री ने कहा, 'जिस तरह की देखभाल हम उन्हें दे पाए हैं, वह अच्छे डॉक्टरों, एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम और देखभाल करने वालों की मदद के बिना मुमकिन नहीं होती।' उनके इस खुलासे ने यह दर्शाया कि एक मशहूर हस्ती के परिवार में भी यह बीमारी किस तरह कई वर्षों तक जीवन को प्रभावित करती है।

शुरुआती पहचान क्यों ज़रूरी है

लारा दत्ता ने ज़ोर देकर कहा कि बीमारी की शुरुआती पहचान सबसे महत्वपूर्ण कदम है। उनके शब्दों में, 'हमें जितनी जल्दी हो सके शुरुआत करनी चाहिए, ताकि बीमारी को उसके शुरुआती स्टेज में पहचाना जा सके और खुद को मज़बूत बनाया जा सके।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी करीबी में या स्वयं में सोचने या याददाश्त में बदलाव महसूस हो, तो सही मदद तुरंत ली जानी चाहिए।

उन्होंने विशेष रूप से चेताया, 'इसे सिर्फ़ भूलने की समस्या समझकर पाँच साल इंतज़ार मत कीजिए कि देखते हैं क्या होता है। यह बहुत ज़रूरी है कि आप इसे सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया मानकर न चलें।' यह टिप्पणी इस लिहाज़ से अहम है क्योंकि भारत में अक्सर बुज़ुर्गों की याददाश्त संबंधी समस्याओं को 'बुढ़ापे का असर' कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

परिवार और देखभालकर्ताओं को भी चाहिए मदद

लारा दत्ता ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि अल्जाइमर या डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति के साथ-साथ उसकी देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों को भी मानसिक और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। उन्होंने लोगों से अच्छे हेल्थकेयर विशेषज्ञ से मिलने, सवाल पूछने और एक मज़बूत सपोर्ट नेटवर्क बनाने की अपील की।

गौरतलब है कि डिमेंशिया के रोगियों की देखभाल करने वाले परिजन अक्सर स्वयं गंभीर तनाव और 'केयरगिवर बर्नआउट' के शिकार हो जाते हैं — एक पहलू जिस पर भारत में जागरूकता अभी भी सीमित है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और इस वर्ष की थीम

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में दुनिया भर में करीब 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे थे और हर साल लगभग 1 करोड़ नए मामले सामने आते हैं। अल्जाइमर, डिमेंशिया का सबसे आम कारण है और यह याददाश्त के साथ-साथ सोचने तथा रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता को भी गहरे रूप से प्रभावित करता है।

वर्ष 2026 के वर्ल्ड अल्जाइमर मंथ की थीम है — 'द अर्लियर यू नो, द मोर यू कैन डू: ए डिमेंशिया डायग्नोसिस मैटर्स' — जो इस बात को रेखांकित करती है कि समय पर निदान ही सबसे कारगर हथियार है। हर वर्ष 21 सितंबर को यह दिन मनाया जाता है।

आगे की राह

लारा दत्ता जैसी जानी-मानी हस्ती का इस विषय पर खुलकर बोलना सामाजिक कलंक (stigma) को तोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब सार्वजनिक जीवन में लोग व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं, तो जागरूकता अभियानों की पहुँच कई गुना बढ़ जाती है। उम्मीद है कि इस तरह की पहल से परिवार अपने बुज़ुर्गों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर अधिक सतर्क और संवेदनशील होंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी भारत में इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस स्क्रीनिंग नीति नहीं है। किसी जानी-मानी हस्ती का व्यक्तिगत अनुभव सार्वजनिक करना इस दिशा में नीति-निर्माताओं पर दबाव बनाने का अप्रत्यक्ष लेकिन असरदार ज़रिया बन सकता है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लारा दत्ता की माँ को कौन सी बीमारी है और कब से है?
लारा दत्ता की माँ, जो अब 80 वर्ष की हैं, लगभग 10 वर्षों से अल्जाइमर और डिमेंशिया के साथ जीवन जी रही हैं। लारा ने 21 सितंबर 2026 को वर्ल्ड अल्जाइमर डे पर यह जानकारी मीडिया के साथ साझा की।
अल्जाइमर को बुढ़ापे की सामान्य बीमारी क्यों नहीं मानना चाहिए?
अल्जाइमर एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, न कि उम्र बढ़ने का स्वाभाविक हिस्सा। लारा दत्ता ने चेताया कि इसे साधारण भूलने की समस्या मानकर वर्षों तक इंतज़ार करने से स्थिति बिगड़ती है और इलाज के अवसर खो जाते हैं।
वर्ल्ड अल्जाइमर डे 2026 कब है और इस साल की थीम क्या है?
वर्ल्ड अल्जाइमर डे हर साल 21 सितंबर को मनाया जाता है। 2026 के वर्ल्ड अल्जाइमर मंथ की थीम 'द अर्लियर यू नो, द मोर यू कैन डू: ए डिमेंशिया डायग्नोसिस मैटर्स' है, जो शुरुआती निदान की अहमियत पर केंद्रित है।
दुनिया भर में डिमेंशिया के कितने मरीज़ हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों के अनुसार, 2021 में दुनिया भर में लगभग 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे थे। हर साल इसमें लगभग 1 करोड़ नए मामले जुड़ते हैं, और अल्जाइमर इसका सबसे आम कारण है।
अल्जाइमर से पीड़ित व्यक्ति के परिवार को क्या करना चाहिए?
लारा दत्ता ने सुझाया कि परिवार को एक अच्छे हेल्थकेयर विशेषज्ञ से मिलना चाहिए, सवाल पूछने में संकोच नहीं करना चाहिए और एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि देखभाल करने वाले परिजनों को भी मानसिक सहारे की ज़रूरत होती है।
राष्ट्र प्रेस
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