लारा दत्ता ने मां के 10 साल के अल्जाइमर संघर्ष का खुलासा किया, बोलीं — 'बुढ़ापे की सामान्य प्रक्रिया मत समझिए'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री लारा दत्ता भूपति ने 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में वर्ल्ड अल्जाइमर डे के उपलक्ष्य में आयोजित एक अल्जाइमर जागरूकता प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेते हुए अपनी माँ के 10 वर्षों के अल्जाइमर और डिमेंशिया संघर्ष को सार्वजनिक रूप से साझा किया। उन्होंने आम जनता से अपील की कि इस बीमारी को केवल भूलने की आम समस्या मानकर नज़रअंदाज़ न करें, बल्कि जल्द-से-जल्द विशेषज्ञ से सलाह लें।
माँ की बीमारी का व्यक्तिगत अनुभव
लारा दत्ता ने मीडिया से बात करते हुए कहा, 'आज वर्ल्ड अल्जाइमर डे है और सबसे ज़रूरी संदेश जो मैं देना चाहती हूँ, वह यह है कि हम अक्सर सोचते हैं कि अल्जाइमर सिर्फ़ भूलने की बीमारी है।' उन्होंने बताया कि उनकी माँ की उम्र 80 वर्ष है और वे लगभग 10 साल से अल्जाइमर और डिमेंशिया के साथ जीवन जी रही हैं।
अभिनेत्री ने कहा, 'जिस तरह की देखभाल हम उन्हें दे पाए हैं, वह अच्छे डॉक्टरों, एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम और देखभाल करने वालों की मदद के बिना मुमकिन नहीं होती।' उनके इस खुलासे ने यह दर्शाया कि एक मशहूर हस्ती के परिवार में भी यह बीमारी किस तरह कई वर्षों तक जीवन को प्रभावित करती है।
शुरुआती पहचान क्यों ज़रूरी है
लारा दत्ता ने ज़ोर देकर कहा कि बीमारी की शुरुआती पहचान सबसे महत्वपूर्ण कदम है। उनके शब्दों में, 'हमें जितनी जल्दी हो सके शुरुआत करनी चाहिए, ताकि बीमारी को उसके शुरुआती स्टेज में पहचाना जा सके और खुद को मज़बूत बनाया जा सके।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी करीबी में या स्वयं में सोचने या याददाश्त में बदलाव महसूस हो, तो सही मदद तुरंत ली जानी चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से चेताया, 'इसे सिर्फ़ भूलने की समस्या समझकर पाँच साल इंतज़ार मत कीजिए कि देखते हैं क्या होता है। यह बहुत ज़रूरी है कि आप इसे सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया मानकर न चलें।' यह टिप्पणी इस लिहाज़ से अहम है क्योंकि भारत में अक्सर बुज़ुर्गों की याददाश्त संबंधी समस्याओं को 'बुढ़ापे का असर' कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
परिवार और देखभालकर्ताओं को भी चाहिए मदद
लारा दत्ता ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि अल्जाइमर या डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति के साथ-साथ उसकी देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों को भी मानसिक और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। उन्होंने लोगों से अच्छे हेल्थकेयर विशेषज्ञ से मिलने, सवाल पूछने और एक मज़बूत सपोर्ट नेटवर्क बनाने की अपील की।
गौरतलब है कि डिमेंशिया के रोगियों की देखभाल करने वाले परिजन अक्सर स्वयं गंभीर तनाव और 'केयरगिवर बर्नआउट' के शिकार हो जाते हैं — एक पहलू जिस पर भारत में जागरूकता अभी भी सीमित है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और इस वर्ष की थीम
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में दुनिया भर में करीब 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे थे और हर साल लगभग 1 करोड़ नए मामले सामने आते हैं। अल्जाइमर, डिमेंशिया का सबसे आम कारण है और यह याददाश्त के साथ-साथ सोचने तथा रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता को भी गहरे रूप से प्रभावित करता है।
वर्ष 2026 के वर्ल्ड अल्जाइमर मंथ की थीम है — 'द अर्लियर यू नो, द मोर यू कैन डू: ए डिमेंशिया डायग्नोसिस मैटर्स' — जो इस बात को रेखांकित करती है कि समय पर निदान ही सबसे कारगर हथियार है। हर वर्ष 21 सितंबर को यह दिन मनाया जाता है।
आगे की राह
लारा दत्ता जैसी जानी-मानी हस्ती का इस विषय पर खुलकर बोलना सामाजिक कलंक (stigma) को तोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब सार्वजनिक जीवन में लोग व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं, तो जागरूकता अभियानों की पहुँच कई गुना बढ़ जाती है। उम्मीद है कि इस तरह की पहल से परिवार अपने बुज़ुर्गों की स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर अधिक सतर्क और संवेदनशील होंगे।