23 अक्टूबर 2026
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फॉरेंसिक जांच में एआई की भूमिका पर लखनऊ में विशेषज्ञों की चेतावनी: साक्ष्य सत्यापन अनिवार्य

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फॉरेंसिक जांच में एआई की भूमिका पर लखनऊ में विशेषज्ञों की चेतावनी: साक्ष्य सत्यापन अनिवार्य

सारांश

लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय फॉरेंसिक सम्मेलन में विशेषज्ञों ने एआई को जांच का गेमचेंजर बताया — लेकिन चेताया कि डीपफेक, पक्षपाती डेटा और बिना सत्यापन के निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया को खतरे में डाल सकते हैं। मानवीय निगरानी और चेन ऑफ कस्टडी अनिवार्य बताई गई।

मुख्य बातें

23 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के तहत एआई और फॉरेंसिक पर पैनल चर्चा आयोजित हुई।
विशेषज्ञ संदीप जोशी ने बताया कि एआई फिंगरप्रिंट, डीएनए, सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण में जांच को तेज़ कर सकता है।
डीपफेक और पक्षपाती डेटा पर प्रशिक्षित एआई सिस्टम से जांच परिणाम प्रभावित होने का खतरा बताया गया।
सेवानिवृत्त विशेषज्ञ संदीप के.
सत्यपथी ने कहा — एआई जांचकर्ता के पेशेवर विवेक का विकल्प नहीं है।
अदालत में एआई-आधारित साक्ष्य की स्वीकार्यता भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और विश्वसनीय चेन ऑफ कस्टडी पर निर्भर होगी।
पैनल का निष्कर्ष: एआई की उपयोगिता विश्वसनीय डेटा, पारदर्शी प्रक्रिया और मानवीय निगरानी से ही सुनिश्चित होगी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) फॉरेंसिक विज्ञान और आपराधिक जांच को अधिक तेज़, सटीक और प्रभावी बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है — लेकिन बिना स्वतंत्र सत्यापन के इसके निष्कर्षों को अंतिम मानना जांच और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिए जोखिमभरा है। यह निष्कर्ष 23 अक्टूबर 2026 को लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के 'टेकसंगम' सत्र में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने साझा किया। पैनल चर्चा का विषय था — 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन फॉरेंसिक्स एंड इन्वेस्टिगेशन'।

एआई से फॉरेंसिक जांच में क्या बदलेगा

पैनल वक्ता संदीप जोशी ने बताया कि एआई कम समय में बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण करने में सक्षम है, जिससे जांच प्रक्रिया में उल्लेखनीय तेज़ी आ सकती है। फिंगरप्रिंट के पैटर्न की तुलना, डीएनए से जुड़े जटिल डेटा का विश्लेषण, सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और अलग-अलग स्थानों पर लोगों की आवाजाही का पता लगाने में एआई उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी मात्रा में फॉरेंसिक डेटा का परीक्षण कर व्यक्तियों, घटनाओं, स्थानों और साक्ष्यों के बीच संभावित कड़ियाँ तलाशने में एआई का इस्तेमाल जांचकर्ताओं को समय पर महत्वपूर्ण सुराग दे सकता है। पारंपरिक तरीकों से जिन सूचनाओं की पड़ताल में घंटों या दिन लग जाते हैं, एआई उन्हें कुछ ही समय में प्रसंस्कृत कर सकता है।

एआई की सीमाएँ और जोखिम

विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि एआई की प्रभावशीलता डेटा की गुणवत्ता, उपयुक्त सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और विश्लेषण की पद्धति पर पूरी तरह निर्भर करती है। संदीप जोशी ने कहा कि गलत या पक्षपातपूर्ण डेटा पर प्रशिक्षित प्रणालियाँ जांच के परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।

गौरतलब है कि एआई कभी-कभी ऐसे निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकता है जिनका उपलब्ध साक्ष्यों से पर्याप्त समर्थन नहीं होता। इसके अलावा, डीपफेक और अन्य कृत्रिम रूप से तैयार की गई सामग्री के माध्यम से भ्रामक साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने का खतरा भी बढ़ रहा है। चर्चा में 'सुरक्षा के लिए एआई और एआई की सुरक्षा' के सिद्धांत पर विशेष जोर दिया गया।

विशेषज्ञों की मुख्य अनुशंसाएँ

सेवानिवृत्त विशेषज्ञ संदीप के. सत्यपथी ने कहा कि फॉरेंसिक जांच में एआई के उपयोग के लिए संबंधित विषय का गहरा ज्ञान, व्यावहारिक अनुभव और तकनीकी समझ अनिवार्य है। जांचकर्ता को यह पता होना चाहिए कि सही प्रश्न कैसे पूछे जाएँ, डेटा की गुणवत्ता कैसे परखी जाए और एआई के निष्कर्षों में संभावित गलतियों की पहचान कैसे की जाए।

सत्यपथी ने नोएडा के वर्ष 2006 के निठारी मामले से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए यह रेखांकित किया कि जांच के क्षेत्र में मार्गदर्शन, व्यावहारिक अनुभव और अर्जित विशेषज्ञता का कोई तकनीकी विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि एआई सूचनाओं का विश्लेषण कर सकता है, लेकिन जांचकर्ता के पेशेवर विवेक का स्थान नहीं ले सकता।

न्यायिक प्रक्रिया में एआई साक्ष्यों की स्थिति

पैनल में स्पष्ट किया गया कि अदालत में एआई की मदद से तैयार निष्कर्षों की स्वीकार्यता लागू कानूनी प्रावधानों और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। केवल एआई द्वारा निष्कर्ष दिए जाने से कोई साक्ष य स्वतः स्वीकार्य नहीं हो जाता।

पैनल के मॉडरेटर डीआईजी टेक्नीकल आशीष तिवारी ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों और व्यापक आपराधिक न्याय व्यवस्था में फॉरेंसिक साक्ष्यों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि साक्ष्य-अभिरक्षा श्रृंखला (चेन ऑफ कस्टडी), विश्लेषण की पद्धति और परिणामों के सत्यापन का पूरा रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। जांचकर्ताओं को एआई के परिणामों की तुलना अन्य विश्वसनीय स्रोतों और पारंपरिक फॉरेंसिक तरीकों से करनी चाहिए।

आगे की राह

पैनल चर्चा का समग्र निष्कर्ष यह रहा कि एआई जांच एजेंसियों के लिए एक प्रभावी तकनीकी साधन बन सकता है, बशर्ते इसकी उपयोगिता विश्वसनीय डेटा, पारदर्शी प्रक्रियाओं और मानवीय निगरानी के साथ सुनिश्चित की जाए। तकनीक की गति के साथ साक्ष्यों की प्रामाणिकता और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना उतना ही अनिवार्य है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर की जांच एजेंसियाँ एआई उपकरणों को अपनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि भारत की जांच एजेंसियाँ इस तकनीक को अपनाने के लिए कितनी तैयार हैं — डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित जनशक्ति और कानूनी ढाँचे तीनों मोर्चों पर। डीपफेक-युग में जहाँ साक्ष्य स्वयं संदिग्ध हो सकता है, वहाँ एआई-जनित निष्कर्षों को अदालत में स्वीकार्य बनाने की चुनौती महज तकनीकी नहीं, बल्कि न्यायिक भी है। विशेषज्ञों की चेतावनी सही समय पर आई है — क्योंकि कई राज्य पुलिस बलों में एआई उपकरण तेज़ी से प्रवेश कर रहे हैं, जबकि उनके नियमन और जवाबदेही का कोई स्पष्ट राष्ट्रीय ढाँचा अभी तक सामने नहीं आया है।
RashtraPress
23 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फॉरेंसिक जांच में एआई किस तरह से उपयोगी है?
एआई फिंगरप्रिंट पैटर्न की तुलना, डीएनए डेटा विश्लेषण, सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान और बड़े पैमाने पर डिजिटल साक्ष्यों की पड़ताल में जांच एजेंसियों की क्षमता बढ़ा सकता है। पारंपरिक तरीकों की तुलना में एआई पैटर्न और संभावित संबंधों की पहचान कहीं अधिक तेज़ी से करता है।
एआई से फॉरेंसिक जांच में क्या खतरे हैं?
पक्षपातपूर्ण डेटा पर प्रशिक्षित एआई सिस्टम गलत निष्कर्ष दे सकते हैं, और डीपफेक जैसी कृत्रिम सामग्री के ज़रिए भ्रामक साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने का खतरा बढ़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई के निष्कर्षों को बिना स्वतंत्र सत्यापन के अंतिम मानना न्यायिक प्रक्रिया के लिए जोखिमपूर्ण है।
क्या भारतीय अदालतों में एआई-आधारित साक्ष्य स्वीकार्य हैं?
एआई-आधारित साक्ष्यों की अदालत में स्वीकार्यता भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। केवल एआई द्वारा निष्कर्ष दिए जाने से कोई साक्ष्य स्वतः स्वीकार्य नहीं हो जाता — संबंधित विशेषज्ञ को विश्लेषण की पद्धति और परिणामों की प्रासंगिकता स्थापित करनी होगी।
फॉरेंसिक जांच में एआई के ज़िम्मेदार उपयोग के लिए क्या ज़रूरी है?
विशेषज्ञों ने कहा कि एआई के निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि, मूल साक्ष्यों की प्रामाणिकता की जांच, चेन ऑफ कस्टडी का पालन और मानवीय निगरानी अनिवार्य है। इसके साथ-साथ स्पष्ट कानूनी व नैतिक मानकों को भी बनाए रखना ज़रूरी है।
यह सम्मेलन कहाँ और कब आयोजित हुआ?
यह पैनल चर्चा 23 अक्टूबर 2026 को लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संवाद-26 के 'टेकसंगम' सत्र के दौरान हुई। इसमें देश-विदेश के फॉरेंसिक और एआई विशेषज्ञों ने भाग लिया।
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