13 अक्टूबर 2026
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महाराष्ट्र: डेटा सेंटर के पर्यावरण असर की जाँच के लिए डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में हाई-लेवल कमेटी गठित

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महाराष्ट्र: डेटा सेंटर के पर्यावरण असर की जाँच के लिए डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में हाई-लेवल कमेटी गठित

सारांश

महाराष्ट्र ने डेटा सेंटर विस्तार की आँधी में पर्यावरण और नागरिक चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए परमाणु वैज्ञानिक डॉ. काकोडकर की अगुवाई में उच्च-स्तरीय कमेटी बनाई है। यह कमेटी तीन महीने में राज्य को डेटा सेंटरों के टिकाऊ विस्तार का रोडमैप देगी।

मुख्य बातें

महाराष्ट्र सरकार ने 13 अक्टूबर 2026 को डॉ.
अनिल काकोडकर (पूर्व चेयरमैन, परमाणु ऊर्जा आयोग) की अध्यक्षता में डेटा सेंटर प्रभाव-आकलन समिति गठित की।
समिति को सरकारी आदेश जारी होने के तीन महीने के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपनी होगी।
कमेटी डेटा सेंटरों के पर्यावरण, जल, ऊर्जा, शोर और स्थानीय इकोसिस्टम पर वैज्ञानिक आकलन करेगी और SOP की सिफारिश करेगी।
समिति में IIT बॉम्बे , CSIR-NEERI , Amazon Web Services और Yotta Data Services के विशेषज्ञ शामिल हैं।
यह कदम 2026 के मॉनसून सत्र में विधान परिषद सदस्यों द्वारा लाए गए ध्यान आकर्षण प्रस्ताव के बाद उठाया गया।
प्रशासनिक एवं वित्तीय सहायता MIDC और उद्योग निदेशालय द्वारा दी जाएगी।

महाराष्ट्र सरकार ने 13 अक्टूबर 2026 को परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की है, जो राज्य में डेटा सेंटरों के पर्यावरण, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करेगी। यह कदम महाराष्ट्र को देश का प्रमुख डेटा सेंटर हब बनाने की महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के बीच उठाया गया है, जहाँ पर्यावरण और स्थानीय नागरिकों पर पड़ने वाले असर को लेकर विधानमंडल में गंभीर सवाल उठे थे।

समिति गठन की पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्यों ने 2026 के मॉनसून सत्र के दौरान नियम 101 के तहत 'ध्यान आकर्षण प्रस्ताव' लाकर डेटा सेंटरों के विस्तार पर चिंता जताई थी। सदस्यों ने बिजली, पानी और जमीन पर बढ़ती माँग, तापमान वृद्धि, ध्वनि प्रदूषण तथा स्थानीय नागरिकों के दैनिक जीवन पर पड़ने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों का हवाला दिया था।

उद्योग मंत्री उदय सामंत ने विधानसभा को आश्वस्त किया था कि संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक व्यापक समिति गठित की जाएगी। इसी वादे के अनुपालन में राज्य सरकार ने सोमवार देर रात सरकारी आदेश जारी कर यह कमेटी बनाई।

समिति की संरचना

इस बहु-विशेषज्ञ समिति में शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी, उद्योग प्रतिनिधि और शैक्षणिक विशेषज्ञ शामिल हैं। प्रमुख सदस्यों में शामिल हैं: अतिरिक्त मुख्य सचिव (ऊर्जा विभाग); प्रधान सचिव (जल संसाधन विभाग); प्रधान सचिव (पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग); महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी; महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) तथा महाराष्ट्र राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड (MSETCL) के CMD।

शैक्षणिक और शोध क्षेत्र से डॉ. एस. वेंकट मोहन (निदेशक, CSIR-राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान, नागपुर), प्रो. एम.वी. राणे (मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, IIT बॉम्बे) और प्रो. डॉ. शमिता कुमार (पर्यावरण शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, भारती विद्यापीठ, पुणे) को सदस्य बनाया गया है।

उद्योग जगत की ओर से श्रीनिवास पी. (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, डेटा सेंटर डिजाइन, Yotta Data Services) तथा प्रसाद कल्याणरमन (वाइस प्रेसिडेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज, Amazon Web Services) भी समिति में शामिल हैं।

समिति का कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियाँ

समिति को पर्यावरण, जल, ऊर्जा, वायु, शोर और स्थानीय इकोसिस्टम पर डेटा सेंटरों के प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन करना होगा। इसके अलावा, डेटा सेंटरों को लेकर फैली भ्रांतियों की जाँच करना और उन्हें दूर करना भी समिति की जिम्मेदारी है।

समिति को ऊर्जा-कुशल और टिकाऊ डेटा सेंटर के लिए अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियों का अध्ययन कर दिशानिर्देश तैयार करने होंगे। जल संरक्षण, रिसाइक्लिंग और वैकल्पिक कूलिंग तकनीकों की सिफारिश करना भी इसके एजेंडे में है। साथ ही, डेटा सेंटरों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की सिफारिश, विभागीय प्रशासनिक सुधार और स्थानीय रोज़गार व कौशल विकास के उपाय सुझाना भी कमेटी के दायित्व हैं।

रिपोर्ट की समयसीमा और प्रशासनिक सहायता

समिति को सरकारी आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी होगी। MIDC, उद्योग सेवा निदेशालय और उद्योग निदेशालय की ओर से प्रशासनिक, तकनीकी और वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाएगा।

यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में डेटा सेंटर उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और महाराष्ट्र इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की दौड़ में अग्रणी राज्यों में शुमार है। डॉ. काकोडकर की अध्यक्षता और अमेज़न व Yotta जैसी कंपनियों की भागीदारी से समिति को उद्योग की वास्तविकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या तीन महीने की समयसीमा में एक बहु-आयामी जाँच सतही नहीं रह जाएगी। समिति में Amazon Web Services और Yotta जैसी डेटा सेंटर कंपनियों के प्रतिनिधियों का होना उद्योग-संवाद के लिहाज़ से उचित है, लेकिन यह हितों के टकराव का जोखिम भी पैदा करता है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिक समूहों की भागीदारी की अनुपस्थिति यह सवाल उठाती है कि रिपोर्ट उद्योग-समर्थक सिफारिशों की ओर झुकेगी या वास्तव में संतुलित नीतिगत ढाँचा देगी।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र में डेटा सेंटर पर्यावरण समिति क्यों बनाई गई?
2026 के मॉनसून सत्र में महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्यों ने नियम 101 के तहत ध्यान आकर्षण प्रस्ताव लाकर डेटा सेंटरों के कारण बिजली-पानी की बढ़ती माँग, तापमान वृद्धि और स्थानीय नागरिकों पर असर को लेकर चिंता जताई थी। उद्योग मंत्री उदय सामंत के आश्वासन के बाद यह समिति गठित की गई।
इस समिति की अध्यक्षता कौन कर रहे हैं और इसमें कौन-कौन शामिल हैं?
समिति की अध्यक्षता परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन डॉ. अनिल काकोडकर कर रहे हैं। इसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, MIDC, MSEDCL और MSETCL के प्रमुख, IIT बॉम्बे और CSIR-NEERI के शोधकर्ता तथा Amazon Web Services और Yotta Data Services के उद्योग प्रतिनिधि सदस्य हैं।
यह समिति कब तक रिपोर्ट देगी?
सरकारी आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार को सौंपनी होगी।
इस समिति का काम क्या होगा?
समिति डेटा सेंटरों के पर्यावरण, जल, ऊर्जा, शोर और स्थानीय इकोसिस्टम पर वैज्ञानिक आकलन करेगी। इसके साथ ही ऊर्जा-कुशल डेटा सेंटर के लिए अंतरराष्ट्रीय पद्धतियों का अध्ययन कर दिशानिर्देश और SOP तैयार करेगी, और स्थानीय रोज़गार व कौशल विकास के उपाय भी सुझाएगी।
महाराष्ट्र डेटा सेंटर हब बनाने की दिशा में कैसे आगे बढ़ रहा है?
महाराष्ट्र पहले से ही देश के प्रमुख डेटा सेंटर निवेश गंतव्यों में शामिल है। राज्य सरकार इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है, लेकिन पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी चिंताओं को देखते हुए अब वैज्ञानिक मूल्यांकन के ज़रिये टिकाऊ नीति बनाने की कोशिश की जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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