अंतरिक्ष विकिरण: एस्ट्रोनॉट्स की सुरक्षा के उपाय
सारांश
Key Takeaways
- स्पेस रेडिएशन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
- अंतरिक्ष में विकिरण से बचाव के लिए सुरक्षा कवच का उपयोग होता है।
- नए डिटेक्टर विकिरण की निगरानी में मदद करते हैं।
- अंतरिक्ष मिशनों की अवधि से विकिरण डोज बढ़ सकता है।
- वैज्ञानिक प्रयासों से मानव यात्रा को सुरक्षित बनाने की कोशिशें जारी हैं।
नई दिल्ली, 20 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अंतरिक्ष यात्रा एक रोमांचक अनुभव है, लेकिन इसमें कई चुनौतियाँ भी हैं। इनमें से एक प्रमुख चुनौती है स्पेस रेडिएशन या अंतरिक्ष विकिरण। पृथ्वी पर हमारे चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल हमें अधिकतर हानिकारक कणों से बचाते हैं। हम दैनिक जीवन में थोड़े-बहुत प्राकृतिक विकिरण के संपर्क में रहते हैं, लेकिन अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्री एक अलग प्रकार और बहुत अधिक मात्रा में विकिरण का सामना करते हैं, जो पृथ्वी पर मिलने वाले विकिरण से कहीं अधिक खतरनाक होता है।
अंतरिक्ष विकिरण के तीन प्रमुख स्रोत माने जाते हैं। पहला, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फंसे कण, जो वैन एलन बेल्ट में उपस्थित ऊर्जावान प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन के रूप में होते हैं। दूसरा स्रोत सूर्य से निकलने वाले सौर ऊर्जावान कण हैं, जो सौर ज्वालाओं और कोरोनल मास इजेक्शन के दौरान उत्सर्जित होते हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत गैलेक्टिक कॉस्मिक किरणें हैं। ये तीव्रगामी किरणें हमारे आकाशगंगा के बाहर सुपरनोवा विस्फोटों से उत्पन्न होती हैं और इनसे सुरक्षा पाना लगभग असंभव है।
अधिक विकिरण के प्रभाव से मतली, उल्टी, थकान और त्वचा में जलन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। लेकिन सबसे बड़ा खतरा लंबे समय बाद आता है, जैसे कि कैंसर, दिल की बीमारियाँ, मोतियाबिंद, तंत्रिका तंत्र को नुकसान, और प्रजनन स्वास्थ्य पर प्रभाव। जानवरों और कोशिकाओं पर किए गए शोध ने यह दर्शाया है कि स्पेस रेडिएशन के भारी कण, अर्थात हाई-जेड पार्टिकल्स, डीएनए को गहराई से नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे पृथ्वी पर मिलने वाले विकिरण से खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए, अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, कई रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। जैसे कि शील्डिंग या सुरक्षा कवच के तहत अंतरिक्ष यान में पानी की टंकी, पॉलिथीन, हाइड्रोजन-समृद्ध सामग्री या मल्टीलेयर ढाल का उपयोग किया जाता है। ये कणों को रोकने में सहायक होती हैं। दूसरा उपाय है विकिरण की निगरानी, जिसमें नए डिटेक्टर विकसित किए जा रहे हैं जो रीयल-टाइम में विकिरण की मात्रा और प्रकार को मापते हैं। इसके अतिरिक्त, ऑपरेशनल उपाय भी हैं, जैसे कि सोलर स्टॉर्म के समय यात्रियों को यान के सबसे सुरक्षित हिस्से जैसे स्टोरेज या पानी के पास ले जाना।
अंतरिक्ष यात्रियों का चयन, ट्रेनिंग और मानसिक तैयारी बहुत सावधानी से की जाती है। लंबे मिशनों के दौरान नींद, थकान, बोरियत और अलग-थलग माहौल से निपटने के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। कई गतिविधियाँ मनोबल बनाए रखने में मदद करती हैं। स्पेस रेडिएशन अंतरिक्ष यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन वैज्ञानिक प्रयासों से इसे नियंत्रित किया जा रहा है ताकि मानव सुरक्षित रूप से चंद्रमा, मंगल और उससे भी आगे जा सके।
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मिशन 6 से 12 महीने के होते हैं, जबकि मंगल मिशन 2 से 3 साल तक चल सकते हैं। इससे कुल विकिरण डोज कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ लगातार नए शोध, बेहतर डिटेक्टर और उन्नत सामग्री पर कार्य कर रही हैं।