अंशुमन गायकवाड़: क्रिकेट विरासत, माइकल होल्डिंग की खतरनाक गेंद और अदम्य साहस की कहानी
सारांश
मुख्य बातें
भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज अंशुमन गायकवाड़ की गिनती भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे निडर बल्लेबाजों में होती है। 1970-80 के दशक में उन्होंने वेस्टइंडीज के उन खतरनाक तेज गेंदबाजों का डटकर सामना किया, जिनके खिलाफ अधिकांश बल्लेबाज विकेट की नहीं, बल्कि अपनी जान की फिक्र करते थे।
क्रिकेट विरासत में मिला
अंशुमन गायकवाड़ का जन्म 23 सितंबर 1952 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता दत्ताजीराव गायकवाड़ भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी और कप्तान रह चुके थे, जिन्होंने 1952 से 1961 के बीच भारत के लिए 11 टेस्ट मैच खेले। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने अंशुमन को खेल की बारीकियाँ सहज ही सिखा दीं।
घरेलू क्रिकेट में निरंतर उल्लेखनीय प्रदर्शन के बाद 1975 में अंशुमन को भारतीय टीम में पदार्पण का अवसर मिला। ईडन गार्डन्स, कोलकाता में वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट में उन्होंने दोनों पारियों को मिलाकर 40 रन बनाए।
गावस्कर के साथ खूंटा बनी सलामी जोड़ी
शुरुआत में मध्यक्रम बल्लेबाज के रूप में टीम में आए अंशुमन ने जल्द ही सलामी बल्लेबाज की भूमिका अपना ली। सुनील गावस्कर के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी उस युग की एक विश्वसनीय साझेदारी बन गई — जहाँ गावस्कर आक्रामक अंदाज़ में रन बनाते, वहीं अंशुमन क्रीज पर जमकर खड़े रहते।
गौरतलब है कि यह वह दौर था जब वेस्टइंडीज की तेज गेंदबाजी चौकड़ी — माइकल होल्डिंग, एंडी रॉबर्ट्स, कॉलिन क्राफ्ट और जोएल गार्नर — दुनिया की सबसे खतरनाक आक्रमण पंक्ति मानी जाती थी।
वह दर्दनाक पल — जब जान पर बन आई
1976 में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट सीरीज का तीसरा मैच जीतकर भारतीय टीम चौथे टेस्ट में उतरी। क्लाइव लॉयड की कप्तानी में कैरेबियाई टीम हार को पचाने में असमर्थ थी। तीसरी पराजय के बाद वेस्टइंडीज के गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों के शरीर को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई।
अंशुमन गायकवाड़ और सुनील गावस्कर पहले विकेट के लिए 136 रन की साझेदारी कर चुके थे। विकेट लेने में बार-बार नाकाम रहने से वेस्टइंडीज के गेंदबाजों का आक्रोश और भड़क उठा। इसी बीच माइकल होल्डिंग की एक तीव्र गेंद उछाल लेती हुई सीधे अंशुमन के कान पर जा लगी। चोट इतनी गहरी थी कि उनका चेहरा लहूलुहान हो गया।
अंशुमन को तत्काल अस्पताल ले जाया गया और उन्हें दो दिन तक ICU में रखा गया। क्रिकेट जगत ने साँस रोककर देखा और कई लोगों को आशंका हो गई कि वे शायद फिर मैदान पर न लौट पाएँ।
सात महीने बाद — साहस की वापसी
हालाँकि, सात महीने बाद अंशुमन गायकवाड़ मैदान पर वापस आए — उसी अदम्य जज्बे के साथ। उन्होंने वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजों का फिर सामना किया और भारत में खेली गई टेस्ट सीरीज में शतक भी ठोका। इसके अलावा उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट में दोहरा शतक भी जड़ा।
अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में अंशुमन ने 40 टेस्ट मैचों में 1985 रन और 15 वनडे में 269 रन बनाए। खिलाड़ी के रूप में संन्यास के बाद उन्होंने राष्ट्रीय चयनकर्ता और फिर भारतीय क्रिकेट टीम के कोच की भूमिका भी निभाई।
विदाई और विरासत
31 जुलाई 2024 को अंशुमन गायकवाड़ का 71 वर्ष की आयु में कैंसर के कारण निधन हो गया। उनका जीवन भारतीय क्रिकेट के उस स्वर्णिम युग की याद दिलाता है जब साहस ही किसी बल्लेबाज की सबसे बड़ी पूँजी थी। वे न केवल एक योद्धा बल्लेबाज थे, बल्कि भारतीय क्रिकेट की परंपरा के सजग संरक्षक भी थे।