बीसीसीआई आरटीआई के दायरे से बाहर: सीआईसी का बड़ा फैसला, 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं

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बीसीसीआई आरटीआई के दायरे से बाहर: सीआईसी का बड़ा फैसला, 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं

सारांश

केंद्रीय सूचना आयोग ने साफ कर दिया — बीसीसीआई आरटीआई के दायरे से बाहर है। न सरकारी स्थापना, न पर्याप्त वित्तीय सहायता, न नियंत्रण। लेकिन सवाल यह है कि राष्ट्रीय टीम का चयन करने वाली संस्था जवाबदेही से परे कैसे रह सकती है?

मुख्य बातें

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 18 मई 2026 को फैसला सुनाया कि बीसीसीआई आरटीआई एक्ट के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं है।
रमेश ने गीता रानी की अपील खारिज की, जो 2017 के आरटीआई आवेदन से जुड़ी थी।
सीआईसी ने पाया कि बीसीसीआई तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण एक्ट के तहत पंजीकृत निजी संस्था है — संसद या सरकार द्वारा स्थापित नहीं।
बीसीसीआई मीडिया राइट्स, स्पॉन्सरशिप और टिकट बिक्री से स्वतंत्र राजस्व अर्जित करता है; सरकारी फंडिंग का कोई साक्ष्य नहीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले माना था कि बीसीसीआई सार्वजनिक स्वरूप के कार्य करता है, परंतु उसे आरटीआई के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया था।

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 18 मई 2026 को स्पष्ट रूप से फैसला सुनाया कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) सूचना का अधिकार (आरटीआई) एक्ट की धारा 2(एच) के अंतर्गत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' की श्रेणी में नहीं आता। आयोग ने पाया कि बीसीसीआई न तो किसी कानून के तहत स्थापित है, न ही उसे सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त होती है, और न ही सरकार का उस पर कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह फैसला सूचना आयुक्त पी.आर. रमेश ने गीता रानी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए सुनाया। गीता रानी ने 2017 में केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्रालय के समक्ष एक आरटीआई आवेदन दायर किया था, जिसमें उन्होंने बीसीसीआई के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार, सरकार द्वारा दिए जाने वाले लाभों और सरकारी नियंत्रण की सीमा से संबंधित जानकारी माँगी थी। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया था कि यह जानकारी उसके पास उपलब्ध नहीं है और आरटीआई आवेदन को बीसीसीआई को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

सीआईसी की मुख्य टिप्पणियाँ

सीआईसी ने अपने आदेश में दर्ज किया कि बीसीसीआई का गठन न तो संविधान, न संसद, न किसी राज्य विधानमंडल और न ही किसी सरकारी अधिसूचना के माध्यम से हुआ है। आयोग ने कहा, 'पंजीकरण केवल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से निजी व्यक्तियों द्वारा गठित किसी संस्था को कानूनी मान्यता प्रदान की जाती है — इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि उस संस्था का अस्तित्व किसी कानून के माध्यम से ही सामने आया है।'

आयोग ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि बीसीसीआई को सरकार से किसी भी प्रकार की पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त होती है। सीआईसी ने दर्ज किया कि बीसीसीआई मीडिया राइट्स, स्पॉन्सरशिप, ब्रॉडकास्टिंग एग्रीमेंट और टिकटों की बिक्री के जरिए स्वतंत्र रूप से राजस्व अर्जित करता है।

बीसीसीआई का पक्ष

सुनवाई के दौरान बीसीसीआई ने तर्क दिया कि वह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण एक्ट के तहत पंजीकृत एक निजी स्वायत्त संस्था है। बोर्ड ने कहा कि वह आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) के तहत निर्धारित स्वामित्व, नियंत्रण या पर्याप्त वित्तीय सहायता के मानदंडों को पूरा नहीं करता। आयोग ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ

सीआईसी ने बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों के जरिए बीसीसीआई में शासन सुधार लागू किए थे। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि बीसीसीआई सार्वजनिक स्वरूप के कार्य करता है, परंतु उसने इसे आरटीआई एक्ट के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया था — और सीआईसी ने इसी तर्क को आधार बनाया।

आगे क्या होगा

यह फैसला बीसीसीआई की पारदर्शिता को लेकर चल रही बहस को नई दिशा देता है। आलोचकों का कहना है कि क्रिकेट बोर्ड राष्ट्रीय टीम के चयन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व जैसे सार्वजनिक महत्व के कार्य करता है, इसलिए उसे पारदर्शिता के दायरे में लाया जाना चाहिए। यह देखना होगा कि अपीलकर्ता या अन्य पक्ष इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हैं या नहीं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक बड़े विरोधाभास को उजागर करता है — जो संस्था भारत का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में प्रतिनिधित्व करती है, राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों का चयन करती है और अरबों रुपये के मीडिया अधिकार संचालित करती है, वह जवाबदेही के किसी सार्वजनिक ढाँचे के बाहर बनी रहती है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं माना है कि बीसीसीआई सार्वजनिक स्वरूप के कार्य करता है — फिर भी पारदर्शिता की बाध्यता शून्य है। यह कानून की सीमा नहीं, बल्कि नीतिगत इच्छाशक्ति का अभाव है; संसद चाहे तो बीसीसीआई जैसी संस्थाओं को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए विधायी संशोधन कर सकती है।
RashtraPress
18 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीआईसी ने बीसीसीआई के बारे में क्या फैसला दिया?
केंद्रीय सूचना आयोग ने 18 मई 2026 को फैसला सुनाया कि बीसीसीआई आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं है। इसलिए आरटीआई एक्ट के प्रावधान बीसीसीआई पर लागू नहीं होते।
बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे से बाहर क्यों माना गया?
सीआईसी ने पाया कि बीसीसीआई न तो संसद या किसी राज्य विधानमंडल द्वारा स्थापित है, न ही उसे सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलती है और न ही सरकार का उस पर कोई नियंत्रण है। बीसीसीआई मीडिया राइट्स, स्पॉन्सरशिप और टिकट बिक्री से स्वतंत्र रूप से राजस्व अर्जित करता है।
यह मामला किसने और कब दायर किया था?
गीता रानी ने 2017 में केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्रालय के समक्ष आरटीआई आवेदन दायर किया था। इसमें बीसीसीआई के भारत का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार, सरकारी लाभों और नियंत्रण की जानकारी माँगी गई थी।
क्या सर्वोच्च न्यायालय ने भी बीसीसीआई को आरटीआई से बाहर माना है?
बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि बीसीसीआई सार्वजनिक स्वरूप के कार्य करता है, लेकिन उसने बीसीसीआई को आरटीआई एक्ट के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया था। सीआईसी ने इसी आधार को अपने फैसले में शामिल किया।
इस फैसले के बाद बीसीसीआई की जवाबदेही पर क्या असर होगा?
इस फैसले के बाद आम नागरिक आरटीआई के जरिए बीसीसीआई से जानकारी नहीं माँग सकते। आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रीय टीम के चयन जैसे सार्वजनिक महत्व के कार्य करने वाली संस्था को पारदर्शिता के दायरे में लाने के लिए संसदीय संशोधन की जरूरत है।
राष्ट्र प्रेस
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