धीरज बोम्मादेवरा के वर्ल्ड कप फाइनल गोल्ड पर पिता श्रवण बोले — '20 साल की मेहनत रंग लाई'
सारांश
मुख्य बातें
धीरज बोम्मादेवरा के साल्टिलो 2026 आर्चरी वर्ल्ड कप फाइनल में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनके पिता श्रवण कुमार ने 15 सितंबर 2026 को विजयवाड़ा से खुशी जाहिर की और इसे बरसों की अनवरत साधना का फल बताया। 25 वर्षीय इस तीरंदाज ने रिकर्व पुरुष वर्ग का खिताब जीतकर वर्ल्ड कप फाइनल में गोल्ड हासिल करने वाले पहले भारतीय पुरुष आर्चर का गौरव प्राप्त किया।
ऐतिहासिक उपलब्धि और परिवार की भावनाएँ
श्रवण कुमार ने कहा, 'बहुत अच्छा लग रहा है। मुझे बहुत खुशी और गर्व है कि मेरा बेटा वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाला पहला भारतीय तीरंदाज बन गया है।' उन्होंने इस कामयाबी को 2006 में शुरू हुए करियर की दो दशक लंबी यात्रा का स्वाभाविक पड़ाव बताया।
धीरज की माँ रेवती ने भी इस उपलब्धि को केवल परिवार नहीं, बल्कि आंध्र प्रदेश और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण करार दिया। परिवार ने कहा कि यह सफलता उन सभी बच्चों के लिए प्रेरणा है जो खेलों में करियर बनाने का सपना देखते हैं।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
यह साल्टिलो, मेक्सिको में आयोजित धीरज का तीसरा वर्ल्ड कप फाइनल था। 2023 और 2024 में वह पदक से चूक गए थे, लेकिन इस बार उन्होंने सबसे बड़ा व्यक्तिगत खिताब अपने नाम किया। गौरतलब है कि डोला बनर्जी के बाद धीरज इस सर्किट पर स्वर्ण जीतने वाले भारत के दूसरे और पहले पुरुष खिलाड़ी बने।
श्रवण ने बताया, 'एक माता-पिता के तौर पर मुझे बहुत खुशी है कि एक भारतीय एथलीट, जिसने 2006 में अपना करियर शुरू किया, उसने 2026 में इतना बड़ा लक्ष्य हासिल कर लिया।' यह यात्रा लगन, अनुशासन और लंबे इंतजार की कहानी है।
वर्ल्ड रैंकिंग में उछाल — एक और रिकॉर्ड
पिछले तीन-चार वर्षों से विश्व रैंकिंग में आठवें से दसवें स्थान के बीच रहने वाले धीरज इस स्वर्ण पदक के बाद वर्ल्ड नंबर 4 पर पहुँच गए हैं। श्रवण ने कहा, 'उनकी बायोग्राफी में लिखा है — मैं वर्ल्ड नंबर वन बनना चाहता हूँ।' वह रैंकिंग में चौथे स्थान तक पहुँचने वाले पहले भारतीय तीरंदाज हैं, जो अपने आप में एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है।
अनुशासित परिवार की पृष्ठभूमि
धीरज का परिवार सेवा और अनुशासन की मिसाल है। उनके पिता भारतीय नौसेना से जुड़े रहे हैं और वर्तमान में राष्ट्रीय तकनीकी अधिकारी (National Technical Official) के रूप में तीरंदाजी प्रशासन में सक्रिय हैं। उनके दादा बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन में कार्यरत थे, जबकि भाई शिक्षण से जुड़े हैं।
श्रवण स्वयं करीब दो दशकों से तीरंदाजी के साथ जुड़े हैं और आंध्र प्रदेश में इस खेल के प्रसार में भूमिका निभा रहे हैं। इस पृष्ठभूमि ने धीरज को वह माहौल दिया जिसमें एक विश्वस्तरीय एथलीट तैयार होता है।
एशियन गेम्स पर नज़र
मेक्सिको की सफलता के तुरंत बाद धीरज एशियन गेम्स की तैयारी के लिए रवाना हो चुके हैं। श्रवण ने उम्मीद जताई कि उनका बेटा इस महाद्वीपीय प्रतियोगिता में भी कुछ खास करेगा। उन्होंने कहा, 'वह पहले ही एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल — टीम सिल्वर मेडल सहित — जीत चुके हैं और उनके नाम कई अंतरराष्ट्रीय पदक हैं।' परिवार की आकांक्षा अब एशियाई स्तर पर स्वर्ण और आगे विश्व नंबर एक का दर्जा है।