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ओलंपिक 2036 मेजबानी: भारत क्यों बन रहा है प्रबल दावेदार, जानें 5 बड़े कारण

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ओलंपिक 2036 मेजबानी: भारत क्यों बन रहा है प्रबल दावेदार, जानें 5 बड़े कारण

सारांश

ओलंपिक 2036 की मेजबानी भारत के लिए महज एक खेल आयोजन नहीं — यह वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में एक रणनीतिक दाँव है। TOPS, खेलो इंडिया, G-20 कूटनीति और बुनियादी ढाँचे में निवेश के साथ भारत एक मज़बूत दावेदार के रूप में उभर रहा है, हालाँकि पारदर्शी आयोजन की परीक्षा अभी बाकी है।

मुख्य बातें

भारत ओलंपिक 2036 की मेजबानी के लिए एक प्रबल दावेदार के रूप में उभर रहा है।
TOPS और खेलो इंडिया योजनाओं ने भारतीय एथलीट्स के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार किया है।
ओलंपिक मेजबानी से भारत को ग्लोबल साउथ में नेतृत्व की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
हाई-स्पीड रेल , आधुनिक हवाई अड्डे और विश्वस्तरीय खेल परिसरों का विकास सफल बोली के लिए अनिवार्य।
2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के अनुभव से सीखते हुए इस बार पारदर्शी और समयबद्ध तैयारी सबसे बड़ी चुनौती।
IOC अगले कुछ वर्षों में 2036 के मेजबान शहर का निर्णय करेगी।

भारत अब ओलंपिक 2036 की मेजबानी की दौड़ में एक प्रमुख दावेदार के रूप में उभर रहा है। बेहतर होते खेल बुनियादी ढाँचे, वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता और 1.4 अरब की आबादी वाले विशाल बाज़ार की बदौलत भारत का यह दावा अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में गंभीरता से लिया जा रहा है। हालाँकि, अन्य देशों की मजबूत दावेदारी और ओलंपिक में भारत के अब तक के सीमित पदक प्रदर्शन को लेकर चुनौतियाँ भी बनी हुई हैं।

भारतीय खेलों में बदलाव की बयार

बीते एक दशक में भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन उल्लेखनीय रूप से सुधरा है। केंद्र सरकार की टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) और खेलो इंडिया अभियान ने जमीनी स्तर से खिलाड़ियों को संसाधन और प्रशिक्षण मुहैया कराया है। एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय दल की बढ़ती उपलब्धियाँ इस नीतिगत बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

गौरतलब है कि पेरिस ओलंपिक 2024 में भारत ने कुल 6 पदक जीते — जो अब तक के सर्वाधिक में से एक है। यह आँकड़ा भले ही वैश्विक महाशक्तियों की तुलना में कम हो, लेकिन यह भारतीय खेलों की बदलती दिशा को रेखांकित करता है।

मेजबानी से आगे: कूटनीतिक और आर्थिक आयाम

विशेषज्ञों के अनुसार, ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजन अब केवल खेल प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहे — ये किसी देश की आर्थिक क्षमता, सांस्कृतिक पहचान और राजनयिक प्रभाव प्रदर्शित करने के सबसे बड़े मंचों में से एक हैं। टोक्यो 1964, सोल 1988 और बीजिंग 2008 ओलंपिक ने इन देशों को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।

भारत भी इसी राह पर चलते हुए 2036 के खेलों को अपनी उभरती आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन के अवसर के रूप में देख रहा है। इन आयोजनों में सार्वजनिक संस्थान, नागरिक समाज, अंतरराष्ट्रीय खेल निकाय और निजी कॉर्पोरेट प्रायोजक सभी एक साथ आते हैं, जो उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।

ग्लोबल साउथ की आवाज़ और भारत की भूमिका

जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने विकासशील देशों के हितों को वैश्विक एजेंडे पर प्रमुखता से स्थापित किया था। इसके अलावा, वैक्सीन कूटनीति और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई है।

आलोचकों का कहना है कि 2036 ओलंपिक की मेजबानी भारत को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को और अधिक प्रभावशाली तरीके से विश्व के सामने रखने का एक अद्वितीय अवसर दे सकती है। यह ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में शक्ति के नए केंद्र उभर रहे हैं और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था आकार ले रही है।

बुनियादी ढाँचे की तैयारी और चुनौतियाँ

ओलंपिक की मेजबानी के लिए हाई-स्पीड रेल नेटवर्क, आधुनिक हवाई अड्डे, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और विश्वस्तरीय खेल परिसरों का विकास अनिवार्य है। भारत इन मोर्चों पर तेज़ी से काम कर रहा है, हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस पैमाने के बुनियादी ढाँचे के विकास में समय और भारी निवेश दोनों की ज़रूरत होगी।

उल्लेखनीय है कि भारत पहले भी 1982 एशियन गेम्स और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े आयोजनों की मेजबानी कर चुका है, जिनसे देश को मिले-जुले अनुभव मिले। कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में आयोजन-पूर्व देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों की आलोचनाओं को देखते हुए पारदर्शी और समयबद्ध तैयारी इस बार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

आगे की राह

भारत की ओलंपिक 2036 मेजबानी की दावेदारी केवल एक खेल आयोजन हासिल करने की महत्वाकांक्षा नहीं है — यह देश के बुनियादी ढाँचे, आर्थिक विकास, वैश्विक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय पहचान को नई दिशा देने का एक बहुआयामी अवसर है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) अगले कुछ वर्षों में मेजबान शहर का निर्णय करेगी, जिसमें भारत की बोली का ठोस और विश्वसनीय स्वरूप निर्णायक भूमिका निभाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की विरासत — देरी, लागत वृद्धि और पारदर्शिता के सवाल — को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि क्या भारत IOC के सामने केवल बड़े सपनों की बजाय ठोस, समयबद्ध और वित्तीय रूप से जवाबदेह बोली प्रस्तुत कर सकता है। ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और G-20 कूटनीति की साख भारत के पक्ष में हैं, लेकिन बुनियादी ढाँचे की विशाल ज़रूरतें और दूसरे देशों की मज़बूत दावेदारी इस दौड़ को कड़ा बनाती हैं। यदि भारत इस अवसर को भुना सका, तो यह 'विकसित भारत' की परिकल्पना के लिए सबसे शक्तिशाली वैश्विक मंच साबित हो सकता है।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत ओलंपिक 2036 की मेजबानी का दावेदार क्यों है?
भारत की विशाल आबादी, बेहतर होता खेल बुनियादी ढाँचा, TOPS और खेलो इंडिया जैसी सरकारी योजनाएँ तथा G-20 जैसे मंचों पर कूटनीतिक सक्रियता उसे एक प्रबल दावेदार बनाती हैं। इसके अलावा ओलंपिक मेजबानी को भारत ग्लोबल साउथ में नेतृत्व स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहा है।
ओलंपिक 2036 की मेजबानी के लिए भारत की तैयारी कहाँ तक पहुँची है?
भारत हाई-स्पीड रेल, आधुनिक हवाई अड्डों और विश्वस्तरीय खेल परिसरों के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। केंद्र सरकार ने TOPS और खेलो इंडिया के ज़रिए एथलीट विकास में निवेश बढ़ाया है, हालाँकि इस पैमाने के बुनियादी ढाँचे की तैयारी में अभी काफी काम बाकी है।
ओलंपिक 2036 की मेजबानी से भारत को क्या फायदा होगा?
ओलंपिक 2036 की मेजबानी से भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आर्थिक और सांस्कृतिक छवि मज़बूत करने का अवसर मिलेगा। इससे देश में पर्यटन, रोज़गार और बुनियादी ढाँचे के विकास को भी गति मिल सकती है, जैसा टोक्यो, सोल और बीजिंग ओलंपिक के बाद इन देशों में देखा गया था।
ओलंपिक 2036 मेजबानी की राह में भारत के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?
2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में आयोजन-पूर्व देरी और भ्रष्टाचार के आरोप भारत की साख पर सवाल उठाते हैं। इसके अलावा, अन्य देशों की मज़बूत दावेदारी और विशाल बुनियादी ढाँचे के लिए आवश्यक भारी निवेश भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।
ओलंपिक 2036 के मेजबान का फैसला कब होगा?
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) अगले कुछ वर्षों में 2036 ओलंपिक के मेजबान शहर का निर्णय करेगी। भारत की बोली का ठोस और विश्वसनीय स्वरूप इस प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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