पल्लवी देहुरी: 100 मीटर की राष्ट्रीय धावक अब चला रही हैं ओडिशा में 'अम्मा बस', पिता के निधन के बाद छूटा खेल
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्तर की धावक पल्लवी देहुरी, जो कभी 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ में स्वर्ण और रजत पदक जीत चुकी हैं, आज ओडिशा की 'अम्मा बस' सेवा में बस चालक के रूप में कार्यरत हैं। पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी कंधों पर आ गई, जिसके चलते उन्हें एथलेटिक्स का करियर बीच में छोड़ना पड़ा। बावजूद इसके, देहुरी ने देश के लिए खेलने का सपना नहीं छोड़ा है।
कैसे छूटा एथलेटिक्स का सफर
पल्लवी देहुरी मूल रूप से असम से हैं और फिलहाल भुवनेश्वर, ओडिशा में रहती हैं। उन्होंने बताया, 'पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। परिवार को देखने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे खेल छोड़कर ड्राइवरी को चुनना पड़ा, ताकि मैं अपने परिवार की मदद कर सकूं।' यह वही धावक हैं जिन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की थी।
खेल का सपना अभी भी ज़िंदा
पल्लवी ने स्पष्ट किया कि वह भविष्य में एथलेटिक्स में वापसी करना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'अगर मुझे फिर मौका मिलता है, तो मैं फिर से एथलेटिक्स में आना चाहूंगी और देश का प्रतिनिधित्व करना चाहूंगी।' फिलहाल बस चालक की व्यस्त दिनचर्या के कारण उन्हें अभ्यास का समय नहीं मिल पाता।
महिलाओं को प्रेरणा का संदेश
स्नातक तक शिक्षा हासिल करने वाली पल्लवी ने अन्य महिलाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि लड़कियों को हिम्मत करते हुए आगे बढ़ना चाहिए और अपने तथा परिवार के लिए कुछ करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि लड़कियों को किसी से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए और खुद को बेहतर समझना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब महिला सशक्तिकरण और खेल में महिलाओं की भागीदारी पर राष्ट्रीय बहस जारी है।
खेल और आजीविका के बीच फंसी प्रतिभाएं
पल्लवी देहुरी का मामला अकेला नहीं है। देश में कई राष्ट्रीय स्तर के एथलीट पारिवारिक दबाव और आर्थिक संकट के चलते खेल छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। गौरतलब है कि खेल नीति में सरकारी नौकरी और वित्तीय सहायता के प्रावधान होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर इनका लाभ हर एथलीट तक नहीं पहुंच पाता। पल्लवी का संघर्ष इस व्यवस्थागत खामी को उजागर करता है।
क्या होगा आगे
पल्लवी देहुरी की कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन चुकी है और खेल प्रेमियों की ओर से उनके लिए सरकारी सहायता की मांग उठ रही है। यदि उन्हें उचित समर्थन और अवसर मिले, तो वह एथलेटिक्स में वापसी की संभावना से इनकार नहीं करतीं।