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सुनील छेत्री: मेसी का रिकॉर्ड तोड़ने वाले भारतीय फुटबॉल के सबसे बड़े सितारे

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सुनील छेत्री: मेसी का रिकॉर्ड तोड़ने वाले भारतीय फुटबॉल के सबसे बड़े सितारे

सारांश

सिकंदराबाद में जन्मे सुनील छेत्री ने फुटबॉल को कॉलेज एडमिशन का ज़रिया समझकर शुरू किया — और अंत में मेसी का रिकॉर्ड तोड़ा। यही उनकी कहानी को बाकी सबसे अलग बनाता है: कोई मास्टर प्लान नहीं, बस जुनून और अनुशासन।

मुख्य बातें

सुनील छेत्री का जन्म 3 अगस्त 1984 को सिकंदराबाद (तत्कालीन आंध्र प्रदेश) में हुआ; माँ नेपाल की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की खिलाड़ी रही हैं।
2005 में सीनियर राष्ट्रीय टीम में डेब्यू; 2008 एएफसी चैलेंज कप फाइनल में हैट्रिक सहित 4 गोल दागकर 'पोस्टर ब्वॉय' बने।
इंटरकांटिनेंटल कप 2018 में 100वाँ अंतरराष्ट्रीय मैच खेला और लियोनेल मेसी के 64 गोल का रिकॉर्ड तोड़ा।
रिकॉर्ड 7 बार AIFF प्लेयर ऑफ द ईयर ; 2021 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय फुटबॉलर।
2010 में कैनसस सिटी विजार्ड्स (USA) से साइन होकर विदेशी क्लब में खेलने वाले तीसरे भारतीय बने।
अर्जुन पुरस्कार (2011) और पद्म श्री (2019) से भी सम्मानित।

सुनील छेत्री — भारतीय फुटबॉल का वह नाम जिसने न केवल राष्ट्रीय टीम के लिए सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड बनाया, बल्कि लियोनेल मेसी के 64 अंतरराष्ट्रीय गोल के आँकड़े को भी पीछे छोड़ा। 3 अगस्त 1984 को तत्कालीन आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में जन्मे छेत्री ने अपने करियर में भारतीय फुटबॉल को एक नई पहचान और गरिमा दिलाई।

फुटबॉल की विरासत जो रगों में उतरी

सुनील छेत्री का फुटबॉल से नाता महज जुनून नहीं, बल्कि विरासत भी है। उनके पिता केबी छेत्री भारतीय सेना में रहे और खुद एक बेहतरीन फुटबॉलर थे। उनकी माँ सुशीला छेत्री नेपाल की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का हिस्सा रह चुकी थीं। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने सुनील में खेल के प्रति स्वाभाविक लगाव पैदा किया।

पिता के सेना में होने के कारण बार-बार तबादले हुए और सुनील को अलग-अलग शहरों में रहकर बार-बार स्कूल बदलने पड़े। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में उन्होंने कभी पेशेवर फुटबॉलर बनने का सपना नहीं देखा था — वे फुटबॉल इसलिए खेलते थे ताकि किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल सके।

प्रतिभा की पहचान और शुरुआती सफर

जब सुनील 12वीं कक्षा में थे, तब उन्हें कुआलालंपुर में आयोजित एशियन स्कूल चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में जगह मिली। इसी दौरान ऐतिहासिक क्लब मोहन बागान ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने दल में शामिल किया। इसके बाद छेत्री ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने 2005 में भारतीय सीनियर टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय डेब्यू किया। 2007 में पहले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में 4 गोल दागते हुए भारत को 1997 के बाद पहली बार ट्रॉफी दिलाई। 2008 के एएफसी चैलेंज कप में उन्होंने 4 गोल किए, जिनमें फाइनल में हैट्रिक भी शामिल थी — और भारत ने टूर्नामेंट जीता। इसी से उन्हें भारतीय फुटबॉल का 'पोस्टर ब्वॉय' कहा जाने लगा।

रिकॉर्ड और उपलब्धियाँ

सैफ चैंपियनशिप 2011 में छेत्री ने एक सीज़न में 7 गोल दागकर सर्वाधिक गोल का रिकॉर्ड बनाया। उन्हें 'प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' चुना गया और भारत ने खिताब अपने नाम किया। 2012 में उन्हें पहली बार एएफसी चैलेंज कप क्वालिफायर्स में भारतीय टीम की कप्तानी सौंपी गई और उसी वर्ष उन्होंने भारत को नेहरू कप भी जिताया।

इंटरकांटिनेंटल कप 2018 में सुनील छेत्री ने अपना 100वाँ अंतरराष्ट्रीय मैच खेला और इसी टूर्नामेंट में लियोनेल मेसी के 64 अंतरराष्ट्रीय गोल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया — यह भारतीय फुटबॉल के इतिहास का एक ऐतिहासिक क्षण था।

छेत्री रिकॉर्ड सात बार ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) प्लेयर ऑफ द ईयर रहे — 2007, 2011, 2013, 2014, 2017, 2018-19 और 2021-22 में। वे जेसीटी, ईस्ट बंगाल और डेम्पो जैसे प्रतिष्ठित क्लबों के लिए करीब 8 वर्षों तक खेले।

विदेशी क्लबों का अनुभव

2007 में छेत्री इंग्लैंड के कोवेंट्री सिटी के लिए ट्रायल देने गए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद लंदन के क्वींस पार्क रेंजर्स ने उनके साथ अनुबंध किया, परंतु वर्क परमिट की समस्या आड़े आ गई। 2010 में वे यूएसए की मेजर लीग सॉकर में कैनसस सिटी विजार्ड्स के लिए साइन हुए और विदेशी फुटबॉल क्लब में खेलने वाले तीसरे भारतीय बन गए। 2012 में स्पोर्टिंग क्लुब डे पुर्तगाल ने भी उन्हें बुलावा दिया।

स्वदेश लौटकर उन्होंने बेंगलुरु एफसी के साथ आई-लीग में कदम रखा। 2015 में इंडियन सुपर लीग (ISL) की शुरुआत में वे सबसे महंगे भारतीय खिलाड़ी रहे और अगले सीज़न में मुंबई सिटी एफसी को प्लेऑफ तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

सम्मान और विरासत

भारतीय फुटबॉल में अतुलनीय योगदान के लिए सुनील छेत्री को 2011 में अर्जुन पुरस्कार, 2019 में पद्म श्री और 2021 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे यह पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय फुटबॉलर हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद अनुशासन, कड़ी मेहनत और कभी हार न मानने वाले जज्बे से उन्होंने साबित किया है कि समर्पण से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। भारतीय फुटबॉल की अगली पीढ़ी के लिए छेत्री सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, एक संस्था हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह फिर भी भारत में फुटबॉल को क्रिकेट के बराबर की लोकप्रियता क्यों नहीं दिला सका। यह छेत्री की विफलता नहीं, बल्कि उस ढाँचे की कमज़ोरी है जिसमें भारतीय फुटबॉल संचालित होती है — जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और मीडिया कवरेज का असंतुलन दशकों से बना हुआ है। छेत्री ने जो कुछ हासिल किया, वह सिस्टम की मदद से नहीं, बल्कि उसके बावजूद किया। उनके संन्यास के बाद असली परीक्षा यह होगी कि भारतीय फुटबॉल उनकी विरासत को एक व्यक्ति की उपलब्धि तक सीमित रखती है या उसे एक टिकाऊ आंदोलन में बदलती है।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुनील छेत्री ने मेसी का कौन सा रिकॉर्ड तोड़ा था?
सुनील छेत्री ने इंटरकांटिनेंटल कप 2018 में लियोनेल मेसी के 64 अंतरराष्ट्रीय गोल के रिकॉर्ड को पार किया। इसी टूर्नामेंट में उन्होंने अपना 100वाँ अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेला।
सुनील छेत्री का जन्म कब और कहाँ हुआ?
सुनील छेत्री का जन्म 3 अगस्त 1984 को तत्कालीन आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में हुआ। उनके पिता केबी छेत्री सेना में थे और माँ सुशीला छेत्री नेपाल की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की खिलाड़ी रही हैं।
सुनील छेत्री को कौन-कौन से राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं?
सुनील छेत्री को 2011 में अर्जुन पुरस्कार , 2019 में पद्म श्री और 2021 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे यह खेल रत्न पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय फुटबॉलर हैं।
सुनील छेत्री किन विदेशी क्लबों के लिए खेले?
छेत्री 2010 में यूएसए की मेजर लीग सॉकर में कैनसस सिटी विजार्ड्स के लिए साइन हुए और विदेशी क्लब में खेलने वाले तीसरे भारतीय बने। इससे पहले क्वींस पार्क रेंजर्स (लंदन) के साथ अनुबंध हुआ था, लेकिन वर्क परमिट की समस्या आड़े आई। 2012 में स्पोर्टिंग क्लुब डे पुर्तगाल ने भी उन्हें बुलाया।
सुनील छेत्री कितनी बार AIFF प्लेयर ऑफ द ईयर रहे?
सुनील छेत्री रिकॉर्ड सात बार ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) प्लेयर ऑफ द ईयर रहे — 2007, 2011, 2013, 2014, 2017, 2018-19 और 2021-22 में। यह भारतीय फुटबॉल में किसी एक खिलाड़ी द्वारा इस खिताब को सर्वाधिक बार जीतने का रिकॉर्ड है।
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