विंबलडन जूनियर 2026: अर्णव पापरकर क्वार्टर फाइनल में हारे, फिर भी 36 साल का इतिहास रचा
सारांश
मुख्य बातें
अर्णव पापरकर का विंबलडन जूनियर चैंपियनशिप 2026 में ऐतिहासिक अभियान 9 जुलाई को लड़कों के एकल क्वार्टर फाइनल में समाप्त हो गया, जब अमेरिका के जॉर्डन ली ने उन्हें 6-2, 7-5 से पराजित किया। हार के बावजूद, पुणे के इस 18 वर्षीय खिलाड़ी ने 1990 में लिएंडर पेस के जूनियर खिताब जीतने के बाद 36 वर्षों में विंबलडन बॉयज़ सिंगल्स क्वार्टर फाइनल तक पहुँचने वाले पहले भारतीय बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया।
मुख्य घटनाक्रम
पापरकर ने इस टूर्नामेंट में अपने अभियान की शुरुआत शानदार ढंग से की थी। उन्होंने अमेरिका के जूनियर विश्व नंबर 3 कीटन हैंस को 6-2, 6-3 से हराया और फिर जापान के रियो तबाता को 6-2, 6-1 के दमदार स्कोर से परास्त कर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। तबाता पर यह जीत इसलिए भी विशेष रही क्योंकि पापरकर उनसे पहले दो बार हार चुके थे।
क्वार्टर फाइनल में जॉर्डन ली के सामने भारतीय युवा प्रतिभा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी और 2-6, 5-7 से मुकाबला गँवा दिया।
खिलाड़ी की प्रतिक्रिया
तबाता पर जीत के बाद पापरकर ने कहा था, 'मैं रियो तबाता के खिलाफ इस जीत से सच में बहुत खुश हूँ। मैं उनसे पहले दो बार हार चुका था, इसलिए आखिरकार जीत हासिल करना बहुत अच्छा लग रहा है। यह मेरा पहला ग्रैंड स्लैम क्वार्टर फाइनल भी है, और विंबलडन में इसे हासिल करना इसे और भी खास बनाता है।'
उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि आरामदायक स्कोरलाइन के बावजूद तबाता के विरुद्ध मैच मानसिक रूप से कठिन था। उन्होंने कहा, 'स्कोरलाइन से यह पता नहीं चलता, लेकिन उसे चोट लगी थी, और एक घायल विरोधी के खिलाफ खेलना सच में मुश्किल होता है क्योंकि आपके दिमाग में बहुत सी बातें चलती रहती हैं।'
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
भारत के पूर्व दिग्गज टेनिस खिलाड़ी आनंद अमृतराज ने पापरकर की खेल-शैली की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा, 'अर्णव न सिर्फ शानदार फॉर्म में हैं, बल्कि उनके पास विविधता भी है। वह नेट पर अटैक कर सकते हैं, बेसलाइन पर पीछे रह सकते हैं, और लगातार ग्राउंडस्ट्रोक के साथ रैली जारी रख सकते हैं।'
अमृतराज ने आगे कहा, 'उनका मूवमेंट तेज है, शॉट चयन अच्छा है, और वह जानते हैं कि कब नेट पर आगे बढ़कर पॉइंट पूरे करने हैं। लंबे कद और मजबूत सर्व के साथ वह एक संपूर्ण खिलाड़ी हैं और उनका भविष्य उज्ज्वल है।'
ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि 1990 में लिएंडर पेस ने विंबलडन जूनियर एकल खिताब जीता था — जो किसी भारतीय का इस स्तर पर सर्वोच्च प्रदर्शन रहा है। उसके बाद से तीन दशकों से अधिक समय तक कोई भारतीय इस प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम के जूनियर बॉयज़ क्वार्टर फाइनल तक नहीं पहुँच सका था। पापरकर ने इस लंबे अंतराल को तोड़ते हुए भारतीय जूनियर टेनिस में नई उम्मीद जगाई है।
आगे की राह
क्वार्टर फाइनल में हार के साथ पापरकर का विंबलडन 2026 अभियान समाप्त हो गया, लेकिन इस प्रदर्शन ने उन्हें जूनियर सर्किट में एक गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित कर दिया है। आने वाले ग्रैंड स्लैम और जूनियर टूर इवेंट में उनसे बड़ी उम्मीदें लगाई जाएंगी।