एबीवीपी ने एनएलएसआईयू में उमर खालिद डॉक्यूमेंट्री स्क्रीनिंग रद्द करने की मांग की
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की बेंगलुरु इकाई ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) प्रशासन से डॉक्यूमेंट्री 'प्रिजनर नंबर 626710 इज प्रेजेंट' की प्रस्तावित स्क्रीनिंग तत्काल रद्द करने की माँग की है। यह डॉक्यूमेंट्री जेएनयू के पूर्व छात्र नेता और यूएपीए अभियुक्त उमर खालिद पर केंद्रित है, जो सितंबर 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं।
स्क्रीनिंग का कार्यक्रम और पृष्ठभूमि
फिल्मकार ललित वाचानी द्वारा निर्मित यह डॉक्यूमेंट्री 14 सितंबर 2026 को विश्वविद्यालय की छात्र संस्था लॉ एंड सोसाइटी कमेटी (लॉ सोक) द्वारा दिखाई जानी प्रस्तावित है। यह आयोजन उमर खालिद की 2020 में हुई गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे होने के अवसर पर रखा गया है और देशभर में आयोजित एकजुटता स्क्रीनिंग श्रृंखला का हिस्सा बताया जा रहा है।
यह कार्यक्रम राजनीतिक बंदी दिवस (13 सितंबर) के ठीक एक दिन बाद निर्धारित है। आयोजकों का कहना है कि इसका उद्देश्य बिना मुकदमा शुरू हुए लंबे समय से हिरासत में रहने की स्थिति पर ध्यान आकर्षित करना है।
एबीवीपी की आपत्ति और विश्वविद्यालय को शिकायत
एबीवीपी बेंगलुरु के सचिव अभिनंदन मिर्जी ने प्रेस बयान जारी कर प्रस्तावित स्क्रीनिंग की कड़ी निंदा की। उन्होंने बताया कि संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन को ई-मेल के जरिए औपचारिक शिकायत भी भेजी है, जिसका अब तक कोई जवाब नहीं मिला।
बयान में कहा गया कि शैक्षणिक परिसरों को राष्ट्रीय अखंडता और शिक्षा के लिए समर्पित रहना चाहिए, न कि 'राजनीतिक प्रचार या नागरिक अशांति का महिमामंडन करने का मंच' बनना चाहिए। एबीवीपी नेता गिरीश ने भी एनएलएसआईयू के कुलपति प्रोफेसर सुधीर कृष्णास्वामी को अलग से पत्र लिखकर स्क्रीनिंग रद्द कराने की माँग की है।
उमर खालिद मामले की स्थिति
उमर खालिद को 2020 के दिल्ली दंगों के संबंध में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) समेत अन्य धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। वह सितंबर 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं और अभी तक मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई है।
गौरतलब है कि इससे पहले अगस्त 2026 में जेएनयू प्रशासन ने उमर खालिद की पुस्तक 'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर' पर प्रस्तावित चर्चा के लिए दी गई स्थल की अनुमति वापस ले ली थी। यह उनसे जुड़े आयोजनों पर दूसरी बड़ी रुकावट है।
परिजन की प्रतिक्रिया
उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने स्क्रीनिंग रोकने की कोशिश को 'तानाशाही रवैया' करार दिया। उन्होंने कहा, 'जब तक किसी व्यक्ति को अदालत दोषी करार नहीं देती, तब तक कानून की नज़र में वह निर्दोष माना जाता है। अपराध साबित होने से पहले कार्यक्रमों या स्क्रीनिंग को रोकना गलत और अलोकतांत्रिक तरीका है।'
इलियास ने आरोप लगाया कि एनआरसी और सीएए विरोधी आंदोलनों से जुड़े लोगों को दिल्ली दंगों से जोड़कर उनके खिलाफ 'झूठे मामले' बनाए गए। उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक हर स्तर पर जमानत में देरी हो रही है।
आगे क्या होगा
यह देखना बाकी है कि एनएलएसआईयू प्रशासन एबीवीपी की माँग पर कोई निर्णय लेता है या स्क्रीनिंग तय कार्यक्रम के अनुसार 14 सितंबर को होती है। यह मामला शैक्षणिक स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और परिसर में राजनीतिक विमर्श की सीमाओं पर बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।