अंबाजी मंदिर में प्लास्टिक-मुक्त प्रसाद पैकेजिंग की योजना, सालाना 135.6 टन प्लास्टिक कचरा होगा कम
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) अब अंबाजी मंदिर में प्रसाद वितरण के लिए पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग लागू करने की तैयारी कर रहा है, जिससे प्रतिवर्ष अनुमानित 135.6 टन प्लास्टिक कचरे को कम किया जा सकेगा। यह कदम सितंबर 2026 में सोमनाथ मंदिर में सफलतापूर्वक शुरू की गई प्लास्टिक-मुक्त प्रसाद पहल के बाद उठाया जा रहा है। गुजरात सरकार इस मॉडल को राज्य के प्रमुख तीर्थस्थलों तक विस्तारित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
मुख्य घटनाक्रम
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने बताया कि अंबाजी मंदिर में सामान्य दिनों में लगभग 15,000 प्लास्टिक प्रसाद बक्से प्रतिदिन उपयोग होते हैं, जबकि त्योहारों और विशेष अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। प्रतिमाह लगभग 10 लाख बक्से वितरित किए जाते हैं, जिससे हर महीने अनुमानित 11,299.5 किलोग्राम पैकेजिंग प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।
मोढवाडिया के अनुसार, पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाने से अंबाजी में सालाना 135.6 टन प्लास्टिक कचरे की रोकथाम हो सकती है। इस पहल का उद्देश्य प्रसाद वितरण की स्वच्छता, कार्यक्षमता और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए प्लास्टिक का विकल्प खोजना है।
डिज़ाइन और वैकल्पिक पैकेजिंग
राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (NID), अहमदाबाद की इंटीग्रेटेड डिज़ाइन सर्विसेज़ को GPCB ने यह पेशेवर डिज़ाइन परामर्श कार्य सौंपा है। NID द्वारा विकसित विकल्पों में गन्ने की खोई (sugarcane bagasse) से बने सांचे, पुन: प्रयोज्य टिन के बक्से और प्लास्टिक-मुक्त कागज पैकेजिंग शामिल हैं।
दोनों मंदिरों में किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला कि एक ही प्रकार की पैकेजिंग सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती। तत्काल उपभोग के लिए हल्की, जैव-अपघटनीय पैकेजिंग उपयुक्त है, जबकि घर ले जाने या लंबी दूरी तक परिवहन के लिए मजबूत कंटेनरों की आवश्यकता है। इसी आधार पर तीन श्रेणियों — तत्काल उपभोग, नियमित रूप से ले जाने और पुन: प्रयोज्य — के लिए अलग-अलग समाधान विकसित किए गए हैं।
सोमनाथ मॉडल: पहले से लागू
सोमनाथ मंदिर में यह बदलाव पहले ही हो चुका है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 17 सितंबर 2026 को इस पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग पहल का औपचारिक उद्घाटन किया। सोमनाथ मंदिर अब प्रतिदिन लगभग 27,700 बक्सों में 4,200 किलोग्राम प्रसाद वितरित करता है — और अब यह सब प्लास्टिक-मुक्त कागज के डिब्बों तथा पुन: उपयोग योग्य टिन कंटेनरों में होता है। इस बदलाव से सोमनाथ में प्रतिवर्ष 203 टन से अधिक प्लास्टिक के उपयोग में कमी आने का अनुमान है।
गौरतलब है कि यह पहल ऐसे समय में आई है जब केंद्र और राज्य सरकारें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर अंकुश लगाने के लिए नीतिगत प्रयास तेज कर रही हैं। धार्मिक स्थलों पर यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए एक नज़ीर बन सकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया और व्यापक उद्देश्य
वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री प्रवीण माली ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य पर्यावरणीय जिम्मेदारी को धार्मिक अनुष्ठान का अभिन्न अंग बनाना है। माली के अनुसार, प्रमुख तीर्थस्थलों पर जैव-अपघटनीय और पुन: उपयोग योग्य विकल्पों को अपनाकर GPCB यह प्रदर्शित करना चाहता है कि सुविचारित डिज़ाइन, संस्थागत कार्रवाई और जनभागीदारी से पर्यावरण को मापने योग्य लाभ कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं।
आगे की राह
सोमनाथ में इस मॉडल की सफलता के बाद अंबाजी की योजनाएँ अंतिम रूप ले रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, इस दृष्टिकोण को भविष्य में गुजरात के अन्य तीर्थस्थलों और संभवतः देश के दूसरे धार्मिक केंद्रों तक भी विस्तारित किया जा सकता है। धार्मिक पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के इस अनूठे संगम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि श्रद्धालु और मंदिर प्रशासन इसे किस हद तक अपनाते हैं।