26 अक्टूबर 2026
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महाराष्ट्र मतदाता सूची से 3 करोड़ नाम हटाने के आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया

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महाराष्ट्र मतदाता सूची से 3 करोड़ नाम हटाने के आरोप: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया

सारांश

महाराष्ट्र की मतदाता सूची से कथित तौर पर 3 करोड़ यानी 33% मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। CJI सूर्यकांत की पीठ ने चुनाव आयोग व सरकार को नोटिस जारी किया, पर तत्काल राहत देने से इनकार किया। अगली सुनवाई 5 नवंबर को निर्धारित।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 26 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र मतदाता सूची एसआईआर मामले में ECI , केंद्र, और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया।
याचिका में आरोप: महाराष्ट्र के 9 करोड़ मतदाताओं में से 3 करोड़ (33%) के नाम हटाए गए; इनमें 1.22 करोड़ 'तार्किक विसंगति' के आधार पर।
पीठ ने दावे-आपत्ति की समय सीमा बढ़ाने या अंतिम सूची प्रकाशन रोकने की तत्काल राहत देने से इनकार किया।
CJI सूर्यकांत की पीठ ने आश्वासन दिया: 'किसी पर भी मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।' अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर को प्रकाशित होनी है; अगली सुनवाई 5 नवंबर को।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिका पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI), केंद्र सरकार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची के मसौदे के प्रकाशन के बाद राज्य के लगभग 3 करोड़ मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटा दिए गए हैं।

मुख्य घटनाक्रम

याचिका अरुण आनंदगिरि ने दायर की थी, जिसमें मतदाता सूची के मसौदे से नाम हटाए जाने और पुनः पंजीकरण की निर्धारित प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर को तय की है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने पीठ के समक्ष बताया कि महाराष्ट्र के लगभग 9 करोड़ मतदाताओं में से करीब 33 प्रतिशत यानी लगभग 3 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से 1.22 करोड़ मतदाताओं के नाम 'तार्किक विसंगति' के आधार पर हटाए गए हैं।

याचिकाकर्ता की दलीलें

दातार ने तर्क दिया कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनसे फॉर्म 6 जमा करने के लिए कहा जा रहा है — जो कि नए मतदाता पंजीकरण के लिए है — जबकि ये लोग पिछले चुनावों में मतदान कर चुके हैं। उनका कहना था कि ऐसे मतदाताओं को फॉर्म 6 भरने के लिए बाध्य करने से उन पर झूठी घोषणा करने का आरोप लग सकता है, क्योंकि आवेदकों को यह बताना होता है कि वे पहले मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं थे।

उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन से बचाव का आश्वासन मूल समस्या का समाधान नहीं करता। दातार ने सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, उनके लिए एक अलग फॉर्म जारी किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

पीठ ने तत्काल राहत — दावे और आपत्तियाँ दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने या अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने — से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ चुनाव आयोग का पक्ष सुने बिना एकतरफा आदेश पारित करने के लिए तैयार नहीं थी। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील को आश्वस्त किया कि 'किसी पर भी मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।'

पीठ ने यह भी संकेत दिया कि सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य राज्यों में आयोजित एसआईआर अभ्यासों में समय सीमा बढ़ाई थी, और परिस्थितियों की जाँच के बाद उचित निर्देश दिए जा सकते हैं।

मतदाता सूची की संशोधित समय सारिणी

महाराष्ट्र के लिए संशोधित कार्यक्रम के अनुसार, मतदाता सूची का मसौदा 31 अगस्त को प्रकाशित किया गया था। दावे और आपत्तियाँ दर्ज करने की अवधि 26 अक्टूबर तक बढ़ाई गई थी। इनका निपटारा 10 नवंबर तक जारी रहेगा और अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर को प्रकाशित की जाएगी।

पृष्ठभूमि और न्यायालय के पूर्व निर्णय

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले एसआईआर अभ्यास आयोजित करने के लिए चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा था। 27 मई के अपने फैसले में न्यायालय ने माना था कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत अधिकृत है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में मनमाने बहिष्कार को रोकने के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग चुनावी उद्देश्यों के लिए नागरिकता से संबंधित प्रश्नों की जाँच कर सकता है, किंतु ऐसी जाँच किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं मानी जाएगी। अब 5 नवंबर की सुनवाई में सभी पक्षों के जवाब दाखिल होने के बाद न्यायालय आगे का रुख तय करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि प्रतिनिधित्व की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर सीधा सवाल है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही एसआईआर की संवैधानिक वैधता बरकरार रख चुका है, इसलिए असली लड़ाई प्रक्रिया और उपचार की है — न कि अधिकार की। सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न यह है कि फॉर्म 6 की बाध्यता उन मतदाताओं को प्रभावी ढंग से दंडित करती है जो पहले से पंजीकृत हैं, और यह ढाँचागत विफलता है जिसे चुनाव आयोग को सुनवाई से पहले ही स्वयं सुधारना चाहिए था। अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर को आनी है — अगर 5 नवंबर की सुनवाई में पीठ कड़ा निर्देश नहीं देती, तो लाखों वैध मतदाता बिना किसी गलती के अगले चुनाव से बाहर हो सकते हैं।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र मतदाता सूची विवाद क्या है?
महाराष्ट्र की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत कथित तौर पर राज्य के लगभग 9 करोड़ मतदाताओं में से करीब 3 करोड़ (33%) के नाम हटाए गए हैं। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जिसने 26 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या आदेश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने ECI, केंद्र सरकार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है। हालाँकि, पीठ ने दावे-आपत्ति की समय सीमा बढ़ाने या अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने की तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। अगली सुनवाई 5 नवंबर को निर्धारित की गई है।
फॉर्म 6 का विवाद क्यों है?
फॉर्म 6 नए मतदाता पंजीकरण के लिए है और इसमें आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहले मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं था। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार का तर्क है कि जो मतदाता पहले से पंजीकृत हैं और पहले मतदान कर चुके हैं, उनसे यह फॉर्म भरवाना उन्हें झूठी घोषणा करने के जोखिम में डालता है।
महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची कब प्रकाशित होगी?
संशोधित समय सारिणी के अनुसार, दावों और आपत्तियों का निपटारा 10 नवंबर तक चलेगा और अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 नवंबर को सुनवाई तय की है, जिसके परिणाम इस समय सीमा को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने पहले एसआईआर प्रक्रिया को वैध ठहराया था?
हाँ, सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई के अपने फैसले में एसआईआर अभ्यास को संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत वैध माना था। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि प्रक्रिया में मनमाने बहिष्कार को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय शामिल हैं।
राष्ट्र प्रेस
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