5 सितंबर 2026
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महाराष्ट्र एसआईआर विवाद: शरद पवार और उद्धव गुट का भाजपा पर हमला, 2 करोड़ नाम हटाने का आरोप

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महाराष्ट्र एसआईआर विवाद: शरद पवार और उद्धव गुट का भाजपा पर हमला, 2 करोड़ नाम हटाने का आरोप

सारांश

महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से 2 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा करते हुए शरद पवार और उद्धव गुट ने भाजपा पर निशाना साधा है। विपक्ष का आरोप है कि बंगाल की तरह महाराष्ट्र में भी यह प्रक्रिया चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

मुख्य बातें

एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रवक्ता क्लाइड क्रैस्टो ने दावा किया कि महाराष्ट्र की मतदाता सूची से 2 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए — कुल मतदाताओं का 21 फीसदी ।
सूची में पहले 9 करोड़ नाम थे, अब घटकर 7 से 7.5 करोड़ रह गए हैं।
शिवसेना (उद्धव गुट) के एमएलसी अंबादास दानवे ने बंगाल में 98 लाख नाम हटाने का उदाहरण देते हुए भाजपा पर हर राज्य में यही रणनीति अपनाने का आरोप लगाया।
सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि महाराष्ट्र के 250-300 विधानसभा क्षेत्रों में यह स्थिति गंभीर समस्या है।
विपक्षी दलों ने संकेत दिया कि वे यह मुद्दा न्यायालय और चुनाव आयोग के समक्ष उठाएँगे।

महाराष्ट्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के राष्ट्रीय प्रवक्ता क्लाइड क्रैस्टो ने 4 सितंबर को दावा किया कि राज्य की मतदाता सूची से 2 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 21 फीसदी है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के एमएलसी अंबादास दानवे ने भी आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस प्रक्रिया का इस्तेमाल हर राज्य में अपनी चुनावी रणनीति के तहत कर रही है।

मतदाता सूची से नाम हटाने का विवाद

क्लाइड क्रैस्टो ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव की तैयारी में सूची में 40 लाख नाम जोड़े थे, लेकिन अब एसआईआर प्रक्रिया के तहत 2 करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। उनके अनुसार, जहाँ पहले सूची में 9 करोड़ नाम थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 7 से 7.5 करोड़ के बीच रह गई है। क्रैस्टो ने इसे 'बहुत गंभीर मामला' बताते हुए पारदर्शी जाँच की माँग की।

गौरतलब है कि एसआईआर एक निर्वाचन आयोग की नियमित प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों का सत्यापन किया जाता है, लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि इस बार इसका दायरा और तरीका असाधारण रूप से व्यापक रहा है।

बंगाल के उदाहरण से साधा निशाना

शिवसेना (उद्धव गुट) के एमएलसी अंबादास दानवे ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में भी इसी प्रक्रिया के तहत 98 लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर किया गया था और वह मामला अभी भी न्यायालय में लंबित है। दानवे ने कहा, 'अगर उन 98 लाख लोगों को नहीं हटाया गया होता, तो शायद ममता बनर्जी के लिए चुनाव का नतीजा अलग हो सकता था। इसी तरह, हर राज्य में, भारतीय जनता पार्टी इस प्रोसेस का इस्तेमाल पूरी तरह से अपने राजनीतिक फायदे और अपनी चुनावी रणनीति के तहत कर रही है।'

दानवे ने यह भी बताया कि उद्धव ठाकरे ने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से आए बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उन्हें इस प्रक्रिया के महत्व से अवगत कराया।

एफआईआर और जेन-जी पर क्रैस्टो के बयान

क्लाइड क्रैस्टो ने एक अलग प्रसंग में कहा कि एक हादसे में 'अजीत दादा' की मौत के बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है, जबकि भाजपा सरकार सत्ता में है। उन्होंने माँग की कि घटना की एफआईआर दर्ज हो और सच्चाई सामने आए।

क्रैस्टो ने युवा पीढ़ी (जेन-जी) की राजनीतिक सक्रियता की भी सराहना की और जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि युवाओं ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग उठाई। उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव जेन-जी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, तो यह सकारात्मक संकेत है।

सांसद अरविंद सावंत की चिंता

शिवसेना (उद्धव गुट) के सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि महाराष्ट्र में लगभग 250 से 300 विधानसभा क्षेत्र हैं और मतदाता सूची की यह स्थिति एक बड़ी समस्या है। उनके अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाया जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।

आगे क्या होगा

विपक्षी दलों ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे को न्यायालय और चुनाव आयोग के समक्ष उठाएँगे। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब महाराष्ट्र में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं और मतदाता सूची की शुद्धता एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि एसआईआर एक नियमित निर्वाचन प्रक्रिया है जिसे चुनाव आयोग संचालित करता है, न कि सत्तारूढ़ दल। असली सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने के पीछे तकनीकी कारण हैं या राजनीतिक — और इसका जवाब देने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, जिसकी स्वतंत्रता पर भी इस विवाद से छाया पड़ रही है।
RashtraPress
5 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाराष्ट्र में एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) क्या है?
एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग की एक प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों का सत्यापन और अद्यतन किया जाता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि महाराष्ट्र में इस प्रक्रिया के तहत 2 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं।
महाराष्ट्र की वोटर लिस्ट से कितने नाम हटाए गए हैं?
एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रवक्ता क्लाइड क्रैस्टो के दावे के अनुसार, 2 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं जो कुल मतदाताओं का करीब 21 फीसदी है। पहले सूची में 9 करोड़ नाम थे, जो अब 7 से 7.5 करोड़ के बीच बताए जा रहे हैं।
उद्धव गुट ने बंगाल का उदाहरण क्यों दिया?
शिवसेना (उद्धव गुट) के एमएलसी अंबादास दानवे ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में भी इसी प्रक्रिया से 98 लाख लोगों को सूची से बाहर किया गया था और वह मामला अदालत में लंबित है। उनका तर्क है कि भाजपा हर राज्य में यही रणनीति अपनाती है।
इस विवाद में चुनाव आयोग की क्या भूमिका है?
एसआईआर प्रक्रिया चुनाव आयोग द्वारा संचालित होती है। विपक्ष का आरोप है कि इस बार नाम हटाने की प्रक्रिया असाधारण रूप से व्यापक रही है और इस पर स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।
विपक्षी दल आगे क्या कदम उठाने की योजना बना रहे हैं?
विपक्षी दलों ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे को न्यायालय और चुनाव आयोग के समक्ष उठाएँगे। उद्धव ठाकरे ने बूथ लेवल एजेंटों से भी मुलाकात कर जमीनी स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है।
राष्ट्र प्रेस
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