अराघची का अमेरिका को जवाब: 'आर्थिक दबाव अभियान' भी नाकाम रहेगा, 14 साल की विफलताओं का दिया हवाला
सारांश
मुख्य बातें
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने 22 अगस्त को स्पष्ट किया कि अमेरिका का ईरान-विरोधी नया 'आर्थिक दबाव अभियान' भी वाशिंगटन की पिछली तमाम दबाव नीतियों की तरह असफल होगा। अराघची ने एक्स पर पोस्ट करते हुए पिछले डेढ़ दशक की अमेरिकी विफलताओं की फेहरिस्त गिनाई और नई घोषणा को उसी कड़ी का हिस्सा बताया।
अराघची का सीधा संदेश
अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, '14 साल पहले: 'इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध' नाकाम रहे। आठ साल पहले: 'अधिकतम दबाव' नाकाम रहा। पाँच महीने पहले: 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' नाकाम रहा। आज: 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' — यह भी नाकाम रहेगा।' यह बयान ऐसे समय आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को ऐलान किया कि ईरान का साथ देने वाले किसी भी देश के खिलाफ 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' चलाया जाएगा।
ट्रंप का 'इकोनॉमिक डी-डे' ऐलान
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा कि 'यह अभूतपूर्व स्तर का आर्थिक युद्ध और अलगाव होगा।' उन्होंने इस कदम को 'इकोनॉमिक डी-डे' की संज्ञा दी — एक ऐसा शब्द जो द्वितीय विश्व युद्ध के ऐतिहासिक मोड़ की याद दिलाता है। यह घोषणा उस समय की गई जब अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक चैनल पहले से ही तनाव में थे।
तेहरान की दोहरी आलोचना
ईरान के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपविदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने भी अमेरिकी रणनीति पर तीखा हमला बोला। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, गरीबाबादी ने सोशल मीडिया पर कहा कि एक ओर अमेरिका दावा करता है कि ईरान 'गिरने की कगार पर है', दूसरी ओर वह अपने सभी सहयोगी देशों से मदद माँग रहा है। उन्होंने कहा कि अपनी नाकामी छिपाने के लिए वाशिंगटन को और बड़ी नाकामी पैदा करनी पड़ रही है और सैन्य कार्रवाई से कोई नतीजा न निकलने के बाद अब अगली हार को 'आर्थिक युद्ध' का नाम दिया जा रहा है।
समझौते की समयसीमा और अनिश्चितता
18 जून को अमेरिका और ईरान ने क्षेत्र में जारी संघर्ष को सभी मोर्चों पर समाप्त करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें लेबनान से जुड़ा मोर्चा भी शामिल था। इस एमओयू के तहत दोनों देशों को 60 दिनों के भीतर बातचीत कर अंतिम समझौते तक पहुँचना था। यह समयसीमा सोमवार को समाप्त हो गई, लेकिन पिछले महीने दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के बाद वार्ताओं का भविष्य अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।
आगे क्या होगा
एमओयू की समयसीमा बीत जाने और ट्रंप के नए आर्थिक दबाव के ऐलान के बाद अमेरिका-ईरान संबंधों में नई जटिलता आ गई है। आलोचकों का कहना है कि बिना कूटनीतिक रास्ते के आर्थिक दबाव की रणनीति पहले भी ईरान की नीति में बदलाव लाने में नाकाम रही है। यह देखना बाकी है कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच बातचीत का कोई नया दौर शुरू होता है या दोनों देश टकराव की राह पर आगे बढ़ते हैं।