असम में बाल विवाह पर बड़ी कार्रवाई: धुबरी जिले में 70 लोग हिरासत में, कई स्थानों पर छापेमारी
सारांश
मुख्य बातें
असम पुलिस ने 28 अक्टूबर 2026 को धुबरी जिले में बाल विवाह के विरुद्ध राज्यव्यापी अभियान के तहत 70 लोगों को हिरासत में लिया और कई स्थानों पर छापेमारी की। अधिकारियों के अनुसार जाँच अभी जारी है और हिरासत में लिए गए कुछ आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है।
मुख्य घटनाक्रम
पुलिस ने मंगलवार को धुबरी जिले के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में एक साथ छापेमारी कर 70 आरोपियों को पकड़ा। इनमें से अधिकांश पर बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत मामले दर्ज हैं। कुछ आरोपियों को जेल भेज दिया गया है, जबकि शेष की जाँच चल रही है।
जिला न्यायालय में पैरवी करने वाले अधिवक्ता जाकिर हुसैन ने बताया कि 'बुधवार तक उनके पास इस मामले में 2 मुवक्किल आ चुके हैं और वे जमानत अर्जी दाखिल करेंगे।' उन्होंने जमानत मिलने की उम्मीद जताई।
वकील की प्रतिक्रिया और कानूनी पहलू
अधिवक्ता हुसैन ने कहा कि असम सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम सराहनीय है और बाल विवाह पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 को 1 नवंबर 2007 को पूरे देश में लागू किया गया था, फिर भी आम जनता में इसके प्रति जागरूकता की कमी बनी हुई है।
उन्होंने कहा, 'पूर्व में जितने भी बाल विवाह हुए हैं, वे इरादतन नहीं हुए होंगे — ग्रामीण इलाकों में अशिक्षा के कारण लोग इस कानून से अनजान हैं।' हुसैन ने सरकार, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से कानूनी जागरूकता अभियान चलाने का आग्रह किया।
समस्या की जड़ें: ग्रामीण इलाके और अशिक्षा
अधिवक्ता हुसैन के अनुसार बाल विवाह की अधिकांश घटनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में सामने आती हैं, जहाँ साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम है। उनका मानना है कि जागरूकता के अभाव में परिवार अनजाने में इस कानून का उल्लंघन कर देते हैं।
गौरतलब है कि असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में राज्य सरकार बाल विवाह के विरुद्ध लगातार अभियान चला रही है। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में बाल विवाह के आँकड़े राष्ट्रीय औसत से अधिक बताए जाते रहे हैं।
बच्चों के भविष्य पर असर
अधिवक्ता हुसैन ने रेखांकित किया कि बाल विवाह के कारण लड़के और लड़कियों दोनों का भविष्य प्रभावित होता है। कम उम्र में विवाह से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है।
आलोचकों का कहना है कि केवल गिरफ्तारी से यह समस्या नहीं सुलझेगी — दीर्घकालिक समाधान के लिए शिक्षा, आर्थिक सशक्तीकरण और व्यापक जागरूकता अभियान आवश्यक हैं।
क्या होगा आगे
हिरासत में लिए गए आरोपियों के मामले अब जिला न्यायालय में विचाराधीन हैं। जाँच एजेंसियाँ अन्य संदिग्ध मामलों की पड़ताल जारी रखे हुए हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ जागरूकता कार्यक्रमों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।