असम के चुनावों में आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में जुटे सीएम हेमंत सोरेन
सारांश
Key Takeaways
- हेमंत सोरेन ने आदिवासियों के अधिकारों की बात की।
- आदिवासियों को एकजुट होने की अपील की गई।
- चाय उद्योग में आदिवासियों का योगदान महत्वपूर्ण है।
रांची/विश्वनाथ (असम), 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। असम में विधानसभा चुनाव की हलचल के बीच झारखंड के मुख्यमंत्री और झामुमो के प्रमुख हेमंत सोरेन आदिवासियों की गोलबंदी के माध्यम से राजनीति का एक नया दृष्टिकोण विकसित करने में लगे हुए हैं। इसी क्रम में, उन्होंने मंगलवार को असम के विश्वनाथ जिले में आयोजित एक भव्य जनसभा में चाय बागानों में काम करने वाले लाखों आदिवासियों की पहचान, सम्मान और उनके अधिकारों का मुद्दा जोर-शोर से उठाया।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हजारों वर्षों से असम के विकास और चाय उद्योग में योगदान देने वाले आदिवासियों को आज तक उनका उचित हक और आदिवासी का दर्जा नहीं मिलना एक बड़ी विडंबना है। इस रैली का आयोजन जय भारत पार्टी, आदिवासी स्टूडेंट यूनियन ऑफ असम और अन्य संगठनों द्वारा किया गया था, जहां सीएम सोरेन ने कहा कि असम के गरीब, किसान, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग लंबे समय से शोषण और अत्याचार का शिकार हो रहे हैं।
इससे पहले, 1 फरवरी को भी हेमंत सोरेन ने असम के तिनसुकिया जिले में आदिवासियों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया था। मेजिकाजन चाय बागान में आयोजित इस सभा में भारी संख्या में जुटी भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "आप इस देश के चाय व्यापार की रीढ़ हैं, लेकिन इसके बदले में आपको क्या मेहनताना मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। हक की इस लड़ाई में प्रदीप नाग जैसे क्रांतिकारी नेताओं ने अपनी जान तक दी है, जिसे बेकार नहीं जाने दिया जाएगा।"
झारखंड अलग राज्य के संघर्ष का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि 50 वर्षों के संघर्ष और दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद हमें हमारा हक मिला। उन्होंने स्वर्गीय शक्ति नाथ महतो के उस संकल्प को याद किया जिसमें कहा गया था कि पहली पंक्ति के लोग शहीद होंगे, दूसरी पंक्ति के लोग जेल जाएंगे और तीसरी पंक्ति के लोग राज्य को सजाएंगे।
सीएम सोरेन ने असम के आदिवासियों से अपील की कि यदि वे अपनी स्थिति में परिवर्तन चाहते हैं, तो उन्हें एक छत और एक छांव के नीचे आना होगा। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि देश में कुछ शक्तियां सक्रिय हैं जो आदिवासी समुदाय को आर्थिक और बौद्धिक रूप से कमजोर बनाकर उन्हें केवल 'मजदूर' बनाए रखना चाहती हैं।
उन्होंने कहा, "आदिवासी समाज कभी किसी का बुरा नहीं चाहता, लेकिन अब हम अपना हक लेना जानते हैं। इसके लिए हमें कानूनी लड़ाई भी लड़नी होगी और चट्टान की तरह एकजुट रहना होगा।" झारखंड सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए जा रहे अधिकारों का हवाला देते हुए उन्होंने असम में भी बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता बताई।