दक्षिण एशिया बुनियादी ढांचे में भारत को क्षेत्रीय केंद्र बनाए ऑस्ट्रेलिया: लोवी इंस्टीट्यूट रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
लोवी इंस्टीट्यूट — ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख नीति शोध संस्थान — की एक नई रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि ऑस्ट्रेलिया को दक्षिण एशिया में व्यापार, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के एकीकरण को गति देने के लिए अपनी क्षेत्रीय रणनीति के केंद्र में भारत को रखना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली को केवल द्विपक्षीय साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के आर्थिक और भौगोलिक धुरी के रूप में देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें
रिपोर्ट में कैनबरा से आग्रह किया गया है कि वह भारत के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दूसरा चरण शुरू करे, जो द्विपक्षीय अक्षय ऊर्जा सहयोग को और सुदृढ़ बनाए। इसके तहत सौर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला, हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण, निवेश और कार्यबल कौशल विकास के क्षेत्रों में साझेदारी को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
रिपोर्ट के शब्दों में, 'नवीनीकृत सारिक में भारत-केंद्रित परियोजना तैयारी विंडो बनाई जानी चाहिए। इसमें शामिल सरकारें सीमा-पार परियोजनाओं का प्रस्ताव दे सकती हैं, जिसकी शुरुआत बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल उपक्षेत्र से की जा सकती है।'
सारिक कार्यक्रम की पृष्ठभूमि
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा कनेक्टिविटी (सारिक) कार्यक्रम 2019 से 2024 तक संचालित हुआ। इसे ऑस्ट्रेलिया ने 3.2 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से वित्त पोषित किया और यह विश्व बैंक तथा इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (IFC) के साथ मिलकर चलाया गया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका में सरकारों को परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी में सहायता दी गई, ताकि सार्वजनिक या निजी निवेश आकर्षित किया जा सके।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा संबंधों और अक्षय ऊर्जा सहयोग में उल्लेखनीय विस्तार हो चुका है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया की भूमिकाएँ
रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने बिजली ग्रिड और परिवहन प्रणालियों के माध्यम से तकनीकी समन्वय का नेतृत्व कर सकता है। वहीं ऑस्ट्रेलिया व्यवहार्यता अध्ययन, नियामकीय ढांचे, खरीद प्रक्रिया और पर्यावरणीय एवं सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध करा सकता है। परियोजनाओं की तैयारी पूरी होने के बाद विश्व बैंक, IFC और अन्य विकास बैंक इनके लिए वित्त जुटा सकते हैं।
बिजली व्यापार और ऊर्जा कनेक्टिविटी
रिपोर्ट में बिजली व्यापार को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है। सारिक ऐसे बिजली ग्रिड नियम विकसित करने में सहायक हो सकता है जो विभिन्न देशों की प्रणालियों के बीच तालमेल सुनिश्चित करें। इसके साथ ही व्यवहार्य बिजली खरीद समझौते, साझा ऊर्जा भंडारण और बिजली संतुलन व्यवस्था विकसित करने में भी सहयोग संभव है। भविष्य में यह पहल बंगाल की खाड़ी के आसपास स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के लिए परिवहन गलियारों के विकास में भी योगदान दे सकती है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है: 'ऑस्ट्रेलिया को किसी नए बड़े बुनियादी ढांचा कोष की जरूरत नहीं है, जब तक उसके पास विश्वसनीय परियोजनाओं की श्रृंखला तैयार नहीं होती। उसे एक आजमाए हुए तंत्र को फिर से शुरू करने की जरूरत है। भारत पैमाना, भौगोलिक स्थिति और नेतृत्व दे सकता है, जबकि सारिक संस्थागत तंत्र उपलब्ध करा सकता है।'
गौरतलब है कि यह सिफारिश ऐसे समय आई है जब चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के मुकाबले पश्चिमी देश और उनके सहयोगी दक्षिण एशिया में वैकल्पिक बुनियादी ढांचा वित्तपोषण के रास्ते तलाश रहे हैं। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ऑस्ट्रेलिया की नई सरकार इन सिफारिशों को नीतिगत स्तर पर किस हद तक अपनाती है।