जयपुर सीबीआई कोर्ट का फैसला: OBC के तीन बैंक अधिकारियों को 7 साल की सश्रम कारावास
सारांश
मुख्य बातें
जयपुर की सीबीआई की विशेष अदालत ने 18 सितंबर 2026 को ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) के बैंक फ्रॉड मामले में तीन लोक सेवकों को 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। तीनों दोषियों पर ₹85,000-₹85,000 का अलग-अलग जुर्माना भी लगाया गया है। यह मामला OBC की श्योसिंहपुरा, लालसोट, दौसा शाखा में हुई धोखाधड़ी से जुड़ा है, जिसमें बैंक को ₹12,14,660.71 का नुकसान हुआ था।
दोषी अधिकारी कौन हैं
सजा पाने वाले तीनों आरोपी OBC की श्योसिंहपुरा शाखा, लालसोट, दौसा में तैनात थे। इनमें रामजी लाल मीणा (तत्कालीन ब्रांच मैनेजर), मुरारी लाल मीणा (तत्कालीन स्पेशल असिस्टेंट) और थान सिंह लश्कर (चपरासी कम हाउसकीपर) शामिल हैं। अदालत ने माना कि तीनों ने मिलकर सुनियोजित तरीके से बैंक को हानि पहुँचाई और अपने सरकारी पद का दुरुपयोग किया।
धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली
आरोप के अनुसार, मुरारी लाल मीणा ने अपने पद की आड़ में बेईमानी से और बिना वैध अधिकार के 'नो ड्यूज सर्टिफिकेट' जारी किए। इसकी वजह से बैंक में गिरवी रखी गई संपत्तियाँ, लोन बकाया होने के बावजूद, छोड़ दी गईं। इस धोखाधड़ी के कारण बैंक को तीन लोन खातों में कुल ₹12,14,660.71 की चपत लगी।
मामले की जाँच और चार्जशीट
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने यह मामला 1 फरवरी 2019 को OBC के तत्कालीन डिप्टी जनरल मैनेजर की शिकायत पर दर्ज किया था। विस्तृत जाँच के बाद CBI ने 5 मई 2022 को तीनों आरोपी लोक सेवकों के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की। लंबे न्यायिक परीक्षण के पश्चात अदालत ने सभी तीनों को दोषी ठहराते हुए यह कड़ी सजा सुनाई।
व्यापक संदर्भ और CBI की सक्रियता
गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब CBI देश भर में भ्रष्टाचार और बैंक धोखाधड़ी के मामलों में तेज़ कार्रवाई कर रही है। इससे एक दिन पहले, 21 सितंबर को मुंबई में CBI ने उत्तराखंड के ऋषिकेश से केंद्रीय जीएसटी (CGST) के एक अधिकारी को ₹40 लाख की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। वह मामला महाराष्ट्र के रायगढ़ की एक कंपनी से जुड़ी जाँच से संबंधित था, जिसमें CGST के एडिशनल कमिश्नर विनय कुमार कंथेटी 16 सितंबर से फरार बताए जा रहे थे।
आगे क्या होगा
तीनों दोषी अधिकारी ऊपरी अदालत में अपील का विकल्प रखते हैं, हालाँकि अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के सख्त फैसले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में आंतरिक धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।