पश्चिम बंगाल में सीबीआई को भ्रष्टाचार जांच की सामान्य सहमति बहाल, 2018 का फैसला पलटा
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने 8 जून 2026 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को भ्रष्टाचार मामलों की जांच के लिए सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट) फिर से प्रदान कर दी है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (डीएसपीई एक्ट) की धारा 6 के तहत यह निर्णय लेते हुए राज्य सरकार ने 2018 में तत्कालीन सरकार द्वारा वापस ली गई अनुमति को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया। इस बहाली के बाद सीबीआई को अब राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने के लिए हर बार अलग से राज्य सरकार की अनुमति लेने की बाध्यता नहीं रहेगी।
सहमति की शर्तें और सीमाएँ
हालाँकि, राज्य सरकार ने यह सहमति पूरी तरह बिना शर्त नहीं दी है। यदि किसी मामले में आरोप राज्य सरकार के किसी कर्मचारी के विरुद्ध हों, तो सीबीआई को जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह शर्त एजेंसी की स्वायत्तता और राज्य के प्रशासनिक नियंत्रण के बीच एक संतुलन बिंदु के रूप में देखी जा रही है।
2018 का फैसला और उसके बाद की स्थिति
2018 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली थी, जिसके बाद एजेंसी के पास राज्य में जांच के केवल दो रास्ते बचे थे — प्रत्येक मामले में राज्य से अलग अनुमति लेना, या न्यायालय के आदेश पर जांच करना। गौरतलब है कि उस दौरान भी सीबीआई ने भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामलों में एफआईआर दर्ज कीं, जिन पर तत्कालीन TMC सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
यहाँ तक कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच के आदेश दिए जाने वाले मामलों में भी राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और राज्य के बीच जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर संवैधानिक विवाद लंबे समय से चला आ रहा था।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का तर्क रहा है कि किसी भी राज्य सरकार की शक्तियाँ असीमित नहीं होतीं और कोई भी राज्य सरकार राजनीतिक कारणों से जांच एजेंसियों के कामकाज में बाधा नहीं डाल सकती, न ही आरोपियों को संरक्षण दे सकती। यह तर्क सामान्य सहमति की वापसी को संघवाद की परीक्षा के रूप में देखने वाले विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ है।
आगे क्या होगा
इस निर्णय के बाद पश्चिम बंगाल में लंबित भ्रष्टाचार मामलों में सीबीआई जांच की गति तेज़ होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम राज्य में जवाबदेही तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बशर्ते राज्य कर्मचारियों से जुड़े मामलों में पूर्व अनुमति की शर्त जांच में अनावश्यक देरी का कारण न बने।