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पश्चिम बंगाल में सीबीआई को भ्रष्टाचार जांच की सामान्य सहमति बहाल, 2018 का फैसला पलटा

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पश्चिम बंगाल में सीबीआई को भ्रष्टाचार जांच की सामान्य सहमति बहाल, 2018 का फैसला पलटा

सारांश

सात साल बाद पश्चिम बंगाल ने सीबीआई को भ्रष्टाचार जांच की सामान्य सहमति लौटाई — 2018 में TMC सरकार का वह फैसला पलट दिया जिसने एजेंसी को राज्य में हर कदम के लिए अनुमति का मोहताज बना दिया था। एक शर्त बरकरार: राज्य कर्मचारियों के मामलों में पहले इजाज़त लेनी होगी।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल सरकार ने 8 जून 2026 को सीबीआई को भ्रष्टाचार मामलों की जांच के लिए सामान्य सहमति बहाल की।
डीएसपीई एक्ट, 1946 की धारा 6 के तहत 2018 के पूर्ववर्ती TMC सरकार के फैसले को औपचारिक रूप से निरस्त किया गया।
राज्य सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों में सीबीआई को अभी भी पूर्व अनुमति लेनी होगी।
2018 के बाद सीबीआई ने कई मामलों में एफआईआर दर्ज की थीं, जिन्हें तत्कालीन TMC सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेशों पर भी पूर्व सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था।

पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने 8 जून 2026 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को भ्रष्टाचार मामलों की जांच के लिए सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट) फिर से प्रदान कर दी है। दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (डीएसपीई एक्ट) की धारा 6 के तहत यह निर्णय लेते हुए राज्य सरकार ने 2018 में तत्कालीन सरकार द्वारा वापस ली गई अनुमति को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया। इस बहाली के बाद सीबीआई को अब राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने के लिए हर बार अलग से राज्य सरकार की अनुमति लेने की बाध्यता नहीं रहेगी।

सहमति की शर्तें और सीमाएँ

हालाँकि, राज्य सरकार ने यह सहमति पूरी तरह बिना शर्त नहीं दी है। यदि किसी मामले में आरोप राज्य सरकार के किसी कर्मचारी के विरुद्ध हों, तो सीबीआई को जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह शर्त एजेंसी की स्वायत्तता और राज्य के प्रशासनिक नियंत्रण के बीच एक संतुलन बिंदु के रूप में देखी जा रही है।

2018 का फैसला और उसके बाद की स्थिति

2018 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली थी, जिसके बाद एजेंसी के पास राज्य में जांच के केवल दो रास्ते बचे थे — प्रत्येक मामले में राज्य से अलग अनुमति लेना, या न्यायालय के आदेश पर जांच करना। गौरतलब है कि उस दौरान भी सीबीआई ने भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामलों में एफआईआर दर्ज कीं, जिन पर तत्कालीन TMC सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

यहाँ तक कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच के आदेश दिए जाने वाले मामलों में भी राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र और राज्य के बीच जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर संवैधानिक विवाद लंबे समय से चला आ रहा था।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का तर्क रहा है कि किसी भी राज्य सरकार की शक्तियाँ असीमित नहीं होतीं और कोई भी राज्य सरकार राजनीतिक कारणों से जांच एजेंसियों के कामकाज में बाधा नहीं डाल सकती, न ही आरोपियों को संरक्षण दे सकती। यह तर्क सामान्य सहमति की वापसी को संघवाद की परीक्षा के रूप में देखने वाले विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ है।

आगे क्या होगा

इस निर्णय के बाद पश्चिम बंगाल में लंबित भ्रष्टाचार मामलों में सीबीआई जांच की गति तेज़ होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम राज्य में जवाबदेही तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बशर्ते राज्य कर्मचारियों से जुड़े मामलों में पूर्व अनुमति की शर्त जांच में अनावश्यक देरी का कारण न बने।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन राज्य कर्मचारियों के मामलों में पूर्व अनुमति की शर्त एक महत्वपूर्ण अपवाद है — और अक्सर भ्रष्टाचार के सबसे संवेदनशील मामलों में यही कर्मचारी केंद्र में होते हैं। 2018 से 2026 के बीच सीबीआई और राज्य सरकार के बीच जो कानूनी खींचतान हुई, वह दिखाती है कि सहमति का हथियार राजनीतिक रूप से कितना धारदार है। असली परीक्षा यह होगी कि नई सरकार उस शर्त का उपयोग जवाबदेही बढ़ाने के लिए करती है या उसे ढाल की तरह इस्तेमाल करती है।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में सीबीआई की सामान्य सहमति क्या होती है?
सामान्य सहमति वह स्थायी अनुमति है जो एक राज्य सरकार डीएसपीई एक्ट, 1946 की धारा 6 के तहत सीबीआई को देती है, जिससे एजेंसी हर मामले में अलग अनुमति लिए बिना राज्य में जांच कर सकती है। इसके बिना सीबीआई को या तो प्रत्येक मामले में राज्य की अनुमति लेनी होती है या अदालत के आदेश का इंतज़ार करना होता है।
पश्चिम बंगाल ने 2018 में सीबीआई की सहमति क्यों वापस ली थी?
2018 में तृणमूल कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली थी। इसके बाद राज्य में सीबीआई की कार्रवाइयों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच कई कानूनी विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचे।
नई सहमति में राज्य कर्मचारियों के मामलों में क्या प्रावधान है?
नई सहमति के अनुसार, यदि किसी भ्रष्टाचार मामले में आरोप राज्य सरकार के किसी कर्मचारी के विरुद्ध हों, तो सीबीआई को जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह शर्त सामान्य सहमति के दायरे को आंशिक रूप से सीमित करती है।
इस फैसले का पश्चिम बंगाल के लंबित भ्रष्टाचार मामलों पर क्या असर होगा?
सामान्य सहमति बहाल होने के बाद सीबीआई राज्य में लंबित भ्रष्टाचार मामलों में बिना अलग अनुमति के जांच आगे बढ़ा सकती है। हालाँकि, राज्य कर्मचारियों से जुड़े मामलों में पूर्व अनुमति की शर्त जांच की गति को प्रभावित कर सकती है।
किन राज्यों ने पहले सीबीआई की सामान्य सहमति वापस ली है?
पश्चिम बंगाल के अलावा कई अन्य राज्यों ने भी विभिन्न समयों पर सीबीआई की सामान्य सहमति वापस ली है या उसे सीमित किया है, जो केंद्र-राज्य संबंधों और जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक व्यापक संवैधानिक बहस का हिस्सा है।
राष्ट्र प्रेस
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