14 जुलाई 2026
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पश्चिम बंगाल में TMC शासनकाल के कथित भ्रष्टाचार की जांच को न्यायिक आयोग गठित, न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु करेंगे नेतृत्व

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पश्चिम बंगाल में TMC शासनकाल के कथित भ्रष्टाचार की जांच को न्यायिक आयोग गठित, न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु करेंगे नेतृत्व

सारांश

पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने TMC के 15 साल के शासनकाल में कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाया है। शिक्षा से लेकर पंचायत तक छह विभाग दायरे में हैं, पुलिस ज्यादतियाँ भी जांच के घेरे में। यह आयोग FIR की सिफारिश और लूटी गई राशि की वसूली का सुझाव भी दे सकता है।

मुख्य बातें

पश्चिम बंगाल सरकार ने 14 जुलाई को 2011–2026 के TMC शासनकाल में कथित संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित किया।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु आयोग की अध्यक्षता करेंगे।
जांच के दायरे में शिक्षा, खाद्य आपूर्ति, आपदा प्रबंधन, नगर निकाय, आवास और मत्स्य पालन विभाग शामिल हैं।
आयोग पुलिस की कथित ज्यादतियों — अवैध हिरासत और झूठे मामलों — की भी जांच करेगा।
आयोग FIR दर्ज करने की सिफारिश और कथित रूप से लूटी गई धनराशि की वसूली के सुझाव देने में सक्षम होगा।
वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने विभागवार श्वेत पत्र जारी करने और CAG रिपोर्टें विधानसभा में रखने की भी घोषणा की है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने मंगलवार, 14 जुलाई को एक न्यायिक आयोग के गठन की घोषणा की, जो 2011 से 2026 तक तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेतृत्व वाली पूर्व सरकार के कार्यकाल में विभिन्न राज्य विभागों में हुए कथित संस्थागत भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करेगा। कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु इस आयोग की अध्यक्षता करेंगे।

आयोग के जांच के दायरे में क्या है

नबान्ना स्थित राज्य सचिवालय से जारी अधिसूचना के अनुसार, आयोग शिक्षा, खाद्य एवं आपूर्ति, राहत एवं आपदा प्रबंधन, नगर निकाय एवं पंचायत, आवास तथा मत्स्य पालन विभागों में 2011 से मई 2026 के बीच भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल करेगा। राज्य सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, आयोग पुलिस की कथित ज्यादतियों — जैसे अवैध हिरासत और निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फंसाने — की जांच भी करेगा।

आयोग की संरचना और अधिकार

न्यायमूर्ति बसु (सेवानिवृत्त) के नेतृत्व में यह आयोग एक वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी की निगरानी में जांच करेगा। आयोग का प्रशासनिक कार्यभार किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी या पश्चिम बंगाल सिविल सेवा (WBCS) के वरिष्ठ अधिकारी के हाथों में होगा, जबकि तकनीकी पहलू पश्चिम बंगाल राजस्व सेवा (WBRS) का एक अधिकारी संभालेगा। आवश्यकता पड़ने पर आयोग में अतिरिक्त सदस्य भी जोड़े जा सकते हैं।

आयोग को किसी भी व्यक्ति को पूछताछ के लिए तलब करने का अधिकार होगा। राज्य सचिवालय के सूत्र के अनुसार, 'यदि आयोग को लगता है कि भ्रष्टाचार हुआ है तो वह संबंधित मामलों में पुलिस को एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश कर सकता है।' आयोग समय-समय पर अपनी जांच की प्रगति रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा।

धनराशि वसूली पर भी देगा सुझाव

आयोग का एक अहम दायित्व यह भी होगा कि वह यह सुझाए कि कथित भ्रष्टाचार में लूटी गई धनराशि को दोषियों से किस प्रकार वापस वसूला जा सकता है। यह प्रावधान आयोग को महज जांच निकाय से आगे ले जाता है और उसे सुधारात्मक उपायों की अनुशंसा करने का अधिकार देता है।

श्वेत पत्र और CAG रिपोर्ट का संदर्भ

गौरतलब है कि पिछले महीने ही राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने घोषणा की थी कि सरकार जल्द ही पूर्व TMC सरकार के कार्यकाल में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं पर विभागवार श्वेत पत्र जारी करेगी। दासगुप्ता ने कहा था कि इन दस्तावेज़ों में यह स्पष्ट किया जाएगा कि 15 वर्षों के TMC शासन में राज्य पर इतना बड़ा कर्ज क्यों बढ़ा और महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी क्यों हुई।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि नई राज्य सरकार भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों को पश्चिम बंगाल विधानसभा के पटल पर रखेगी — एक कदम जिसे पूर्व सरकार ने कथित तौर पर नज़रअंदाज़ किया था।

आगे क्या होगा

यह आयोग ऐसे समय में गठित हुआ है जब पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार पूर्व TMC शासन की जवाबदेही तय करने की दिशा में कई कदम उठा रही है। आयोग की जांच रिपोर्ट और श्वेत पत्र मिलकर राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को आने वाले महीनों में गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन भारत में ऐसे आयोगों का इतिहास मिला-जुला रहा है — कई दशकों तक चलते हैं, रिपोर्टें धूल खाती हैं। असली परीक्षा यह होगी कि क्या आयोग की सिफारिशें वास्तविक FIR, अभियोजन और धनराशि वसूली में बदलती हैं, या यह महज राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीकात्मक प्रदर्शन बनकर रह जाती है। CAG रिपोर्टों को विधानसभा में रखने का निर्णय संवैधानिक पारदर्शिता की दृष्टि से सकारात्मक है, किंतु श्वेत पत्रों की विश्वसनीयता तभी सिद्ध होगी जब उनमें स्वतंत्र ऑडिट डेटा हो, न कि केवल राजनीतिक आरोप।
RashtraPress
14 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पश्चिम बंगाल में गठित न्यायिक आयोग क्या जांच करेगा?
यह आयोग 2011 से 2026 तक तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शिक्षा, खाद्य आपूर्ति, आपदा प्रबंधन, नगर निकाय, आवास और मत्स्य पालन विभागों में हुए कथित संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच करेगा। इसके साथ ही पुलिस की कथित ज्यादतियों — जैसे अवैध हिरासत और झूठे मामलों — की पड़ताल भी होगी।
न्यायिक आयोग की अध्यक्षता कौन करेंगे?
कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति बिश्वजीत बसु इस आयोग की अध्यक्षता करेंगे। जांच एक वरिष्ठ IPS अधिकारी की निगरानी में होगी और प्रशासनिक कार्यभार IAS या WBCS अधिकारी संभालेंगे।
क्या यह आयोग FIR दर्ज करा सकता है?
आयोग सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकता, लेकिन यदि उसे भ्रष्टाचार के साक्ष्य मिलते हैं तो वह पुलिस को FIR दर्ज करने की सिफारिश कर सकता है। इसके अलावा आयोग कथित रूप से लूटी गई धनराशि की वसूली के उपाय भी सुझाएगा।
श्वेत पत्र और CAG रिपोर्ट का इससे क्या संबंध है?
वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने घोषणा की है कि सरकार TMC शासनकाल की वित्तीय अनियमितताओं पर विभागवार श्वेत पत्र जारी करेगी और CAG रिपोर्टें पश्चिम बंगाल विधानसभा में रखेगी। ये दस्तावेज़ न्यायिक आयोग की जांच के साथ मिलकर जवाबदेही का व्यापक ढाँचा तैयार करेंगे।
इस आयोग का गठन राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद यह आयोग नई सरकार का पूर्व TMC शासन के प्रति जवाबदेही तय करने का पहला ठोस संस्थागत कदम है। 15 वर्षों के शासनकाल की जांच और CAG रिपोर्टों का सार्वजनिक होना राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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