भगवंत मान वीडियो विवाद: फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट के लिए ₹10 लाख की डील, गुरुग्राम में दो हिरासत में
सारांश
मुख्य बातें
गुरुग्राम पुलिस ने 23 जून 2025 को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित विवादित वीडियो मामले में नई कार्रवाई करते हुए दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है। आरोप है कि इस वीडियो को फर्जी साबित करने के लिए गुरुग्राम की एक निजी लैब से कथित तौर पर मनमाफिक फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराई गई, जिसके लिए करीब ₹10 लाख की डील हुई थी। पुलिस ने जसवीर नामक व्यक्ति की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस कथित वीडियो से जुड़ा है, जिसे लेकर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किया था। उस समय मुख्यमंत्री की ओर से वीडियो को फर्जी बताया गया था। जांच में अब सामने आया है कि दोनों हिरासत में लिए गए व्यक्तियों पर एक पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री का कथित एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित डीपफेक वीडियो बनाने और उसे प्रसारित करने का आरोप है।
गिरफ्तारी और आरोप
पुलिस ने जिन दो लोगों को हिरासत में लिया है, उनकी पहचान अंकित और अरुण के रूप में बताई जा रही है। यह कथित लेन-देन सेक्टर-29 थाना क्षेत्र के एक होटल में हुआ बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, इस कथित डील में से ₹2.5 लाख एक बैंक खाते में और ₹7.5 लाख दूसरे खाते में जमा कराए गए। पुलिस दोनों संदिग्धों से पूछताछ कर रही है, हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है।
फोरेंसिक रिपोर्ट की वैधता पर सवाल
जांच में यह भी सामने आया है कि संबंधित व्यक्तियों के पास डिजिटल फोरेंसिक विश्लेषण के लिए कोई सरकारी मान्यता प्राप्त या अधिकृत लैब नहीं थी। पुलिस वीडियो की वास्तविकता की जांच के लिए उसे स्वतंत्र फोरेंसिक परीक्षण के लिए भेज रही है। गौरतलब है कि बिना मान्यता प्राप्त लैब की रिपोर्ट को कानूनी दृष्टि से वैध नहीं माना जाता।
जांच का दायरा
अधिकारियों के अनुसार, पुलिस इस मामले में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की संभावित संलिप्तता की भी जांच कर रही है। डिजिटल गतिविधियों, वित्तीय लेन-देन और तैयार की गई फोरेंसिक रिपोर्ट की प्रमाणिकता की विस्तृत जांच चल रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।
आगे क्या होगा
यह मामला डीपफेक तकनीक के राजनीतिक दुरुपयोग और फोरेंसिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जांच के नतीजे न केवल इस विशेष मामले की दिशा तय करेंगे, बल्कि डिजिटल साक्ष्यों की कानूनी स्वीकार्यता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मिसाल भी स्थापित कर सकते हैं।