फॉर्म-6 बदलाव पर सीईसी ज्ञानेश कुमार घिरे, पूर्व केरल सीईओ टीका राम मीणा ने लगाए मनमानेपन के आरोप
सारांश
मुख्य बातें
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगे हैं। केरल के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी टीका राम मीणा ने आरोप लगाया है कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म-6 से जुड़े बदलाव लागू करते समय चुनाव आयोग के अन्य दोनों सदस्यों की राय को नज़रअंदाज़ करते हुए मनमाना रवैया अपनाया। 26 सितंबर 2026 को मीणा ने कहा कि यह मामला न केवल आंतरिक मतभेदों का है, बल्कि कानूनी प्रावधानों और तय प्रक्रियाओं की अनदेखी का भी है।
आरोपों का सार
मीणा ने कहा कि उन्होंने अपने बैचमेट्स ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू को पत्र लिखकर आयोग के फ़ैसले लेने के तरीके पर कई मतभेदों की ओर ध्यान दिलाया था। उनका कहना है कि तीन सदस्यीय निकाय में बहुमत की राय को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, किंतु ऐसा नहीं हुआ।
मीणा के अनुसार, 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' और 'चुनाव नियम, 1961' के तहत कानूनी असर वाले बदलाव केवल एक कार्यकारी आदेश के ज़रिए नहीं किए जा सकते। उनका तर्क है कि फॉर्म-6 में किए गए परिवर्तन इन्हीं क़ानूनी प्रावधानों के विरुद्ध हैं।
पारदर्शिता और सामूहिकता पर सवाल
मीणा ने कहा, 'चुनाव आयोग स्वतंत्र फ़ैसले ले रहा है। तीन सदस्यों के मामले में, बहुमत की राय को माना जाना चाहिए — लेकिन ज्ञानेश ने मनमाने ढंग से काम किया।' उन्होंने यह भी कहा कि शेष दोनों चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ अपने मतभेद दर्ज कराने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
उनके अनुसार, इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता की कमी स्पष्ट रूप से दिखती है। एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था को सामूहिक रूप से और विधि के अनुसार निर्णय लेने चाहिए।
संवैधानिक सुरक्षा और दबाव का सवाल
मीणा ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग किसी भी दबाव में नहीं आ सकता — यहाँ तक कि प्रधानमंत्री के दबाव में भी नहीं — क्योंकि आयोग के सदस्यों को संविधान के तहत पूरी संरक्षण (इम्युनिटी) प्राप्त है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया में किए गए बदलाव को लेकर व्यापक चर्चा है।
व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का मुख्य दस्तावेज़ है, और इसमें बदलाव का सीधा असर मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया पर पड़ता है। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की संभावनाएं जताई जा रही हैं और चुनाव आयोग की स्वायत्तता एवं निष्पक्षता पर राष्ट्रीय बहस जारी है।
यह पहली बार नहीं है कि चुनाव आयोग के भीतरी कामकाज पर सवाल उठे हों। आलोचकों का कहना है कि आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद को सार्वजनिक करना संस्था की विश्वसनीयता के लिए एक असाधारण कदम है। आगे देखना होगा कि चुनाव आयोग इन आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है।