केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में एआई और डाटा साइंस बीटेक की तैयारी, 95% प्राचीन पांडुलिपियों को मिलेगा डिजिटल जीवन
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली जल्द ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डाटा साइंस में बीटेक कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है — एक ऐसी पहल जो भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को 21वीं सदी की तकनीक से जोड़ने का प्रयास है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 29 जून को प्रसारित 'मन की बात' कार्यक्रम में इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए एआई टूल विकसित करने और प्राचीन ग्रंथों व पांडुलिपियों के डिजिटल संरक्षण में मदद मिलेगी।
पहल की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने बताया कि इस बीटेक कार्यक्रम के पीछे मूल सोच नई तकनीक और संस्कृति के बीच एक सुदृढ़ संबंध स्थापित करना है। उन्होंने कहा, '1970 और 1980 के दशक में जब भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत हुई, तभी संस्कृत और संगणक के संबंध पर चर्चा प्रारंभ हो गई थी।' अब एआई के नए दौर में यह अवसर और अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह कार्यक्रम केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए भी एक नया द्वार खोलेगा।
प्रो. वरखेड़ी ने कहा कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय कार्य कर रहे हैं, और इसी दिशा में यह पहल की गई है।
भारतीय भाषाओं और संस्कृत की एआई में भूमिका
प्रो. वरखेड़ी के अनुसार, संस्कृत भारतीय भाषाओं की 'सूत्र भाषा' है — अर्थात् वह आधार जिसके बिना भारतीय भाषाओं की एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि ज्ञान भारतम मिशन, डिजिटल इंडिया और नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (NRF) जैसी सरकारी योजनाओं के माध्यम से भारतीय भाषाओं में डिजिटल कंटेंट निर्माण को विशेष महत्व दिया जा रहा है। एआई-आधारित कंटेंट विश्लेषण और भाषा प्रसंस्करण में संस्कृत की संरचनात्मक स्पष्टता एक महत्वपूर्ण संपदा साबित हो सकती है।
प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण
कुलपति ने बताया कि भारत की लगभग 95 प्रतिशत प्राचीन ज्ञान परंपरा आज भी पांडुलिपियों और ग्रंथागारों में संरक्षित है, जिसे दुनिया ने अभी तक पूरी तरह नहीं देखा है। यदि इस विशाल ज्ञान भंडार को एआई तकनीक और डिजिटल माध्यम के ज़रिए सामने लाया जाए, तो यह केवल संरक्षण नहीं, बल्कि नए ज्ञान के सृजन का माध्यम भी बनेगा।
गौरतलब है कि दिल्ली एआई समिट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ज्ञान भारतम की प्रदर्शनी में लगभग 18 मिनट तक रुके थे और प्राचीन पांडुलिपियों में संरक्षित ज्ञान को आधुनिक ज्ञान-सृजन से जोड़ने के प्रयासों की सराहना की थी।
विश्वविद्यालय की भविष्य की योजनाएँ
एआई-बीटेक के अलावा, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से आयुर्वेद गुरुकुलम महाविद्यालय की योजना पहले ही शुरू की है। भारतीय विधि शास्त्र पर आधारित एलएलबी कार्यक्रम चल रहा है और भविष्य में एलएलएम शुरू करने की भी योजना है।
प्रो. वरखेड़ी ने बताया कि आने वाले समय में विश्वविद्यालय वास्तु और आर्किटेक्चर, एस्ट्रोनॉमिकल स्टडीज, प्राचीन और आधुनिक गणित के समन्वय, गीता आधारित काउंसलिंग और भारतीय प्राचीन प्रबंधन विद्या पर आधारित एमबीए कार्यक्रम भी शुरू करने की दिशा में कार्य करेगा।
राष्ट्रीय महत्व और आगे की राह
प्रो. वरखेड़ी ने कहा कि संस्कृत को अब केवल मंदिरों या प्राचीन भाषा के रूप में नहीं देखा जा रहा — यह भारतीय समाज के संयोजक तत्व, ज्ञान के संवाहक और आधुनिक प्रयोगशालाओं के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। उनके अनुसार, यही आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में विश्वविद्यालय का संकल्प है। बीटेक कार्यक्रम की शुरुआत के साथ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उद्योग जगत और शोध संस्थान इस अनूठे पाठ्यक्रम के स्नातकों को किस रूप में अपनाते हैं।