शांतिदूत बना चीन: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बीजिंग की कूटनीतिक चाल
सारांश
Key Takeaways
- चीन ने पश्चिम एशिया संकट में शांतिदूत की भूमिका अपनाते हुए चार-सूत्री शांति प्रस्ताव पेश किया।
- चीन और पाकिस्तान ने मिलकर 5-सूत्रीय शांति पहल की शुरुआत की जिसका असर इस्लामाबाद वार्ता पर पड़ा।
- अप्रैल 2026 में अमेरिका-ईरान युद्धविराम में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार गुजरता है जिसे खुला रखना चीन की प्राथमिकता है।
- चीन ने अमेरिका द्वारा ईरानी जहाजों की जब्ती को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए आलोचना की।
- चीन की असली रणनीति ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और अमेरिका के मुकाबले वैश्विक मंच पर खुद को स्थापित करना है।
बीजिंग, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। पश्चिम एशिया में युद्धविराम लागू होने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं। इस संकट के बीच चीन खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति और मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की सुनियोजित कोशिश में जुटा है।
चीन का चार और पांच सूत्री शांति प्रस्ताव
चीन ने इस महीने चार-सूत्री शांति प्रस्ताव पेश किया, जिसमें राष्ट्रीय संप्रभुता के सम्मान और बल प्रयोग से परहेज की अपील की गई। इसके अतिरिक्त, चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर एक 5-सूत्रीय शांति पहल भी शुरू की। हालांकि अमेरिका ने इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान के बीच हुई पहली दौर की बातचीत में इस पहल की परोक्ष भूमिका रही।
गौरतलब है कि अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम में भी चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह पैटर्न दर्शाता है कि बीजिंग पश्चिम एशिया में खुद को एक स्थायी कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा का संकट बिंदु
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है। इस रास्ते पर किसी भी प्रकार की रुकावट वैश्विक ऊर्जा बाजार को तत्काल प्रभावित करती है। चीन का इस मार्ग को खुला रखने पर विशेष जोर है, क्योंकि वह स्वयं ईरान से बड़े पैमाने पर तेल आयात करता है।
चीन ने अमेरिका द्वारा ईरानी जहाजों को जब्त करने और बंदरगाहों की नाकेबंदी को गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए कड़ी आलोचना की है। बीजिंग का तर्क है कि इस तरह की कार्रवाइयां वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालती हैं और पहले से ही बढ़ रही महंगाई को और हवा देती हैं।
चीन की असली रणनीति: ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक छवि
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की शांतिदूत वाली भूमिका के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला — अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना, और दूसरा — खुद को अमेरिका के मुकाबले एक जिम्मेदार और संयमित वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना। यह रणनीति उन देशों को आकर्षित करती है जो अमेरिकी वर्चस्व से असंतुष्ट हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि चीन ने 2023 में सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक कूटनीतिक समझौता कराया था। उस सफलता के बाद से बीजिंग पश्चिम एशिया में मध्यस्थता की भूमिका को लगातार मजबूत करता आ रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध का असर
पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो रही है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और खाद्य महंगाई पर पड़ रहा है। चीन के लिए यह विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि उसकी विनिर्माण-आधारित अर्थव्यवस्था सस्ते और निरंतर ऊर्जा आयात पर निर्भर है।
दुनिया के अधिकांश देश अब यह चाहते हैं कि ईरान-अमेरिका के बीच संघर्षविराम स्थायी रूप ले और वैश्विक व्यापार सामान्य हो। आने वाले हफ्तों में इस्लामाबाद में होने वाली अगली दौर की वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है।
(साभार — चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)