चुराचांदपुर में किसानों को यूरिया और बायो-फर्टिलाइजर वितरण, संतुलित उपयोग पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के कृषि कार्यालय ने सोमवार, 31 अगस्त को जिले के पंजीकृत किसानों के बीच यूरिया और बायो-फर्टिलाइजर का वितरण किया। यह वितरण सब्सिडी दरों पर किया गया और इसमें केवल रजिस्टर्ड किसानों को ही शामिल किया गया।
वितरण का विवरण
वितरण कार्यक्रम सुबह लगभग 11 बजे जिला कृषि कार्यालय परिसर में आरंभ हुआ। जिला कृषि अधिकारी (प्रभारी) सुथियानलाल के अनुसार, कार्यालय अब तक यूरिया के लगभग 2,000 बैग और बायो-फर्टिलाइजर के 1,900 बैग वितरित कर चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वितरण की मात्रा मुख्यालय से प्राप्त स्टॉक पर निर्भर करती है।
संतुलित उपयोग की अपील क्यों
जिला कृषि अधिकारी सुथियानलाल ने बताया कि पिछले वर्ष अत्यधिक मात्रा में उर्वरक वितरित किए जाने पर कुछ किसानों ने उनका अनुचित और अत्यधिक उपयोग किया था। मिट्टी परीक्षण और उपयोग पैटर्न की समीक्षा के बाद विभाग ने पाया कि उर्वरकों का उपयोग आवश्यकता से अधिक हो रहा है। इसी के मद्देनज़र इस वर्ष वितरण पर कुछ नियंत्रण रखे गए हैं।
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे केवल यूरिया पर निर्भर न रहें, क्योंकि यह मुख्यतः नाइट्रोजन की पूर्ति करता है — जो पौधों के लिए आवश्यक मैक्रो-न्यूट्रिएंट्स में से केवल एक है। फसलों की अच्छी सेहत और उत्पादकता के लिए फॉस्फोरस, पोटैशियम और अन्य मैक्रो-न्यूट्रिएंट्स भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
बायो-फर्टिलाइजर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का समावेश
कृषि विभाग ने जिला प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों के सहयोग से पिछले कुछ दिनों में बायो-फर्टिलाइजर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी उपलब्ध कराए हैं। विभिन्न कैंप और जागरूकता अभियानों के दौरान किसानों को समय-समय पर बायो-फर्टिलाइजर वितरित किए जाते रहे हैं।
प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान
विभाग ने किसानों को कृषि कार्यालय बुलाकर संतुलित उर्वरक उपयोग पर आधारित खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया है। इन सत्रों के दौरान माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का वितरण भी किया गया। अधिकारी सुथियानलाल ने किसानों से अनुरोध किया कि वे स्टॉक आवंटन और आपूर्ति में आने वाली प्रशासनिक कठिनाइयों को समझें और विभाग के साथ सहयोग करें।
आगे की राह
चुराचांदपुर कृषि विभाग का यह कदम मणिपुर में टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। विभाग के अनुसार, आने वाले समय में भी इस तरह के कैंप और प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रहेंगे ताकि किसान वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर सकें और मिट्टी की उर्वरता बनाए रख सकें।