राजस्थान निकाय चुनाव: कांग्रेस ने क्रॉस-वोटिंग जांच के लिए 9 सदस्यीय समिति बनाई, 7 दिन में रिपोर्ट तलब
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) ने राजस्थान के हालिया शहरी निकाय चुनावों में क्रॉस-वोटिंग और संगठनात्मक खामियों के आरोपों की आंतरिक जांच शुरू कर दी है। पार्टी ने कई नगर निकायों में मिली हार के कारणों की पड़ताल के लिए नौ सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है, जिसे सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
समिति का गठन और जिम्मेदारी
इस जांच समिति की अध्यक्षता राजस्थान विधानसभा के पूर्व स्पीकर डॉ. सी.पी. जोशी को सौंपी गई है। समिति में रामसिंह कस्वां, मुरारीलाल मीणा, कुलदीप इंदौरा, प्रमोद जैन भाया, शकुंतला रावत, हाकम अली, गणेश घोगरा और रघुवीर सिंह राठौड़ शामिल हैं। समिति मेयर व चेयरमैन चुनावों के दौरान पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ वोट करने के आरोपी पार्षदों की पहचान करेगी और फ्लोर मैनेजमेंट की खामियों की भी जांच करेगी।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) ने विभिन्न जिलों से संदिग्ध पार्षदों के बारे में रिपोर्ट जमा की है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, क्रॉस-वोटिंग के लिए दोषी पाए जाने वाले पार्षदों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। कथित तौर पर जांच के दायरे में आने वाले पार्षदों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है, हालांकि अंतिम आंकड़ा जांच और व्यक्तिगत मामलों की पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होगा।
बीकानेर का चौंकाने वाला मामला
इस पूरे विवाद का सबसे स्पष्ट उदाहरण बीकानेर से सामने आया है। यहां कांग्रेस के पास 41 पार्षद थे, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पास केवल 27। इसके बावजूद भाजपा के उम्मीदवार ने डिप्टी मेयर का चुनाव 40-38 के मतों से जीत लिया। यह अंकगणित सीधे तौर पर क्रॉस-वोटिंग की ओर इशारा करता है और पार्टी के भीतर गहरी बेचैनी का कारण बना है।
गौरतलब है कि यह इकलौता मामला नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व ने अजमेर, कोटा और पाली सहित अन्य नगर निगमों और स्थानीय निकायों में भी पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की है।
भीलवाड़ा विवाद: संगठनात्मक चूक का बड़ा उदाहरण
क्रॉस-वोटिंग के अलावा कांग्रेस का एक और संगठनात्मक संकट भीलवाड़ा से उजागर हुआ। जरूरी अथॉरिटी लेटर समय पर जमा न होने के कारण कांग्रेस के 17 उम्मीदवार पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव नहीं लड़ पाए। यह मामला पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचा, और बाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने प्रभावित उम्मीदवारों की याचिकाएं खारिज कर दीं, जिससे केवल कांग्रेस द्वारा अधिकृत 53 उम्मीदवार ही चुनाव में शामिल रह सके।
हाल ही में जिला कांग्रेस कार्यालय के बाहर पीसीसी सदस्य मनोज पालीवाल के विरोध-प्रदर्शन ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया। स्थानीय वरिष्ठ नेताओं धीरज गुर्जर और रामलाल जाट की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
दबाव और प्रलोभन के आरोप
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि चुनाव के बाद की प्रक्रिया के दौरान उसके पार्षदों पर दबाव डाला गया और उन्हें प्रलोभन देकर वोट प्रभावित करने की कोशिश की गई। इन आरोपों के मद्देनज़र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने प्रशासन और पुलिस से जुड़े इन मामलों की राज्य चुनाव आयोग से जांच कराने की मांग की है।
आगे क्या होगा
जांच समिति अपनी रिपोर्ट सात दिनों में पार्टी नेतृत्व को सौंपेगी। रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान में सत्तारूढ़ BJP के सामने विपक्ष को अपनी पंक्तियां दुरुस्त रखनी हैं — अंदरूनी कलह कांग्रेस की राज्य में पुनरुत्थान की रणनीति को कमजोर कर सकती है।