दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी स्कूल सत्र शुरू होने से पहले बिना DOE मंजूरी बढ़ा सकते हैं फीस
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 मई 2025 को राजधानी के निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ये स्कूल नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में शिक्षा निदेशालय (DOE) की पूर्व अनुमति के बिना फीस बढ़ा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सत्र-प्रारंभ पर की जाने वाली ऐसी फीस वृद्धि के लिए स्कूलों को केवल निदेशालय को सूचित करना होगा — अनुमति लेना अनिवार्य नहीं होगा।
फैसले के मुख्य बिंदु
हाईकोर्ट ने दो-स्तरीय व्यवस्था तय की है। यदि कोई स्कूल शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाता है, तो उसे केवल DOE को सूचना देनी होगी। वहीं, यदि स्कूल सत्र के बीच में फीस संशोधित करना चाहे, तो शिक्षा निदेशालय की पूर्व मंजूरी अनिवार्य रहेगी। यह व्यवस्था स्कूलों की वित्तीय स्वायत्तता और अभिभावकों के हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
अभिभावकों को राहत: पुराना बकाया नहीं वसूला जाएगा
अदालत ने अभिभावकों को महत्वपूर्ण राहत देते हुए आदेश दिया कि स्कूल 2016-17 या उससे पुराने शैक्षणिक सत्रों की बढ़ी हुई फीस का कोई भी बकाया अब वसूल नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, स्कूलों की सबसे हालिया प्रस्तावित फीस वृद्धि अब अप्रैल 2027 से ही लागू होगी — इससे पहले नहीं।
DOE के आदेश और पेंडिंग प्रस्ताव रद्द
हाईकोर्ट ने शिक्षा निदेशालय के उन सभी आदेशों को निरस्त कर दिया, जिनके तहत सत्र-प्रारंभ पर फीस बढ़ाने के स्कूलों के प्रस्तावों को अस्वीकार किया गया था। साथ ही, निदेशालय के पास लंबित सभी फीस-वृद्धि प्रस्तावों को भी बंद कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निदेशालय की अनुमति-शक्ति का दायरा कानून और नियमों की सीमाओं के भीतर ही रहेगा।
'लैंड क्लॉज' आधारित भेदभाव खारिज
फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने DOE द्वारा 'लैंड क्लॉज' (भूमि आवंटन शर्त) के आधार पर स्कूलों के बीच किए गए भेद को अमान्य ठहरा दिया। अदालत ने कहा कि आवंटन पत्र में दर्ज यह शर्त निदेशालय की कानूनी शक्तियों का विस्तार नहीं कर सकती — वह एक्ट और नियमों के दायरे में ही बाध्यकारी है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला दिल्ली के कई निजी स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया। इन स्कूलों ने आरोप लगाया था कि शिक्षा निदेशालय बार-बार उनकी फीस-वृद्धि की माँग ठुकरा रहा था, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और संचालन क्षमता प्रभावित हो रही थी। गौरतलब है कि दिल्ली में निजी स्कूलों की फीस-नियमन को लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा है, और यह फैसला इस दिशा में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। आने वाले शैक्षणिक सत्रों में इस आदेश के व्यावहारिक प्रभाव स्पष्ट होंगे।