यूएनडीपी रिपोर्ट: 2026 में वैश्विक ऊर्जा सब्सिडी $1 ट्रिलियन के पार, 13 करोड़ लोगों को गरीबी से बचाया
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की 2 अक्टूबर 2026 को जारी एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में वैश्विक ऊर्जा सब्सिडी $1 ट्रिलियन (लगभग ₹83 लाख करोड़) से अधिक पहुँच सकती है। पश्चिम एशिया में जारी सशस्त्र संघर्ष, तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच दुनिया भर की सरकारें उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए भारी वित्तीय बोझ उठा रही हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह दबाव 2027 की शुरुआत तक अपने चरम पर पहुँच सकता है।
रिपोर्ट की मुख्य बातें
यूएनडीपी की यह रिपोर्ट विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के आँकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारें ईंधन और खाद्य कीमतों में वृद्धि के प्रभाव को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण (प्राइस कैप) और कर रियायतों जैसे उपायों का सहारा ले रही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच राहत उपाय अपनाने वाले देशों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई।
कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के करीब पहुँचने से कई देशों की सार्वजनिक वित्त व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। बढ़ती ब्याज दरों, महँगे कर्ज और मौसम संबंधी जोखिमों के कारण इन उपायों को दीर्घकाल तक बनाए रखना कठिनतर होता जा रहा है।
13 करोड़ लोगों को गरीबी से बचाया
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि सरकारी सहायता कार्यक्रमों ने इस वर्ष अनुमानित 13 करोड़ लोगों को प्रतिदिन $6.85 की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे जाने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह आँकड़ा सब्सिडी की सामाजिक अनिवार्यता को रेखांकित करता है, भले ही इसके लिए सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ रहा हो। गौरतलब है कि यह वही वर्ग है जो किसी भी कीमत वृद्धि का सबसे पहला और सबसे गहरा असर झेलता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
यूएनडीपी के मुख्य अर्थशास्त्री जॉर्ज ग्रे मोलिना ने कहा कि 'अगले कुछ सप्ताह और महीने अनिश्चितता से भरे रह सकते हैं, क्योंकि दुनिया एक साथ कई संकटों का सामना कर रही है।' उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान स्थिति से बाहर निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है। यूएनडीपी का अनुमान है कि भू-राजनीतिक तनाव, कड़े वैश्विक वित्तीय हालात और जलवायु संबंधी झटकों का संयुक्त प्रभाव 2027 की शुरुआत तक अपने चरम पर पहुँच सकता है।
एल नीनो और सामाजिक अशांति का जोखिम
रिपोर्ट में एल नीनो के प्रभाव को भी एक बड़ा जोखिम बताया गया है। एल नीनो के कारण कई क्षेत्रों में बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसम घटनाएँ बढ़ सकती हैं, जिससे खाद्य उत्पादन प्रभावित होने और खाद्य असुरक्षा बढ़ने की आशंका है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का सामाजिक प्रभाव पहले से ही दिखने लगा है — रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 के दौरान बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण कम से कम 10 देशों में विरोध प्रदर्शन और सामाजिक अशांति की घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें सीरिया, ग्वाटेमाला, फिलीपींस, फ्रांस और पुर्तगाल शामिल हैं।
आगे की राह
यूएनडीपी की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब कई विकासशील देश पहले से ही ऋण संकट और मुद्रास्फीति की दोहरी मार झेल रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अंधाधुंध सब्सिडी दीर्घकालिक समाधान नहीं है और इससे राजकोषीय असंतुलन का खतरा बढ़ता है। वैश्विक नीति-निर्माताओं के सामने अब असली चुनौती यह है कि कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा करते हुए सार्वजनिक वित्त को भी टिकाऊ बनाए रखा जाए।