फतेहगढ़ साहिब में 'रेल रोको' आंदोलन: बंदी सिंहों की रिहाई की मांग पर अंबाला-लुधियाना ट्रैक जाम
सारांश
मुख्य बातें
कौमी इंसाफ मोर्चा ने शनिवार, 4 जुलाई को फतेहगढ़ साहिब के माधोपुर में अंबाला-लुधियाना रेलवे ट्रैक पर 'रेल रोको' आंदोलन शुरू किया, जिसका मुख्य उद्देश्य दशकों से जेलों में बंद बंदी सिंहों की शीघ्र रिहाई की माँग करना है। पंथक, सामाजिक और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों सहित बड़ी संख्या में समर्थक गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब में एकत्र हुए और इसके बाद माधोपुर चौक की ओर मार्च निकाला।
आंदोलन का घटनाक्रम
सुबह से ही प्रदर्शनकारी गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब में जुटने लगे। एकत्र होने के बाद सभी ने माधोपुर चौक तक मार्च किया और अंबाला-लुधियाना रेलवे ट्रैक पर पहुँचकर धरना शुरू कर दिया। प्रदर्शन सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक निर्धारित था, जिसके कारण रेल यातायात प्रभावित होने की संभावना बनी रही।
प्रमुख माँगें
मोर्चे के नेताओं ने बताया कि उनकी माँगों में जगतार सिंह हवारा, बलवंत सिंह राजोआणा, जगतार सिंह तारा, परमजीत सिंह भियोरा और सांसद अमृतपाल सिंह की रिहाई शामिल है। इसके साथ ही काली सूची में दर्ज करीब 20 हज़ार सिखों के नाम उस सूची से हटाने की भी माँग की गई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इनमें से कई कैदी कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अपनी सजा पूरी कर चुके हैं, फिर भी उन्हें जेलों में रखा जाना न्यायसंगत नहीं है।
सरकार पर आरोप
पत्रकारों से बातचीत में मोर्चे के नेताओं ने आरोप लगाया कि बंदी सिंहों की रिहाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार और पंजाब सरकार दोनों लगातार उदासीन रवैया अपना रही हैं। उन्होंने कहा कि इस कारण सिख समुदाय में लंबे समय से रोष और निराशा का माहौल बना हुआ है। नेताओं ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी एक संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि न्याय की माँग करने वाले सभी वर्गों का सामूहिक प्रयास है।
आम जनता और रेल यातायात पर असर
आंदोलन के चलते अंबाला-लुधियाना रेलवे ट्रैक पर यात्री रेल सेवाएँ प्रभावित होने की आशंका रही। यह ट्रैक पंजाब के प्रमुख रेल मार्गों में से एक है और इस पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्री आवाजाही करते हैं। रेलवे अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
आगे की राह
मोर्चे के नेताओं ने केंद्र और पंजाब सरकार से इस मामले में ठोस कदम उठाने की अपील की है। यह ऐसे समय में आया है जब बंदी सिंहों का मुद्दा पंजाब की राजनीति में बार-बार उठता रहा है और विभिन्न सिख संगठन समय-समय पर इसके लिए आवाज़ उठाते रहे हैं। यदि सरकार की ओर से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला, तो आंदोलन को और तेज़ करने की चेतावनी भी दी गई है।